Friday, May 8, 2009

*** मध्यकाल: भारतीय और यूरोपीय ढाँचा

वैसे तो अधिकतर मध्यकाल का यूरोपीय ढाँचा ही भारत के संदर्भ में लागू किया गया है, फिर भी भारत के मध्यकाल और यूरोपीय मध्यकाल के स्वरूप में बुनियादी फर्क है। इस तथ्य को अब लगभग सभी इतिहासकार और बुद्धिजीवी स्वीकार करते हैं। यूरोप का मध्यकाल ‘अंधकार युग’ माना जाता है, लेकिन भारत के मध्यकाल को इन्हीं शब्दों में व्याख्यायित नहीं किया जा सकता। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने विस्तार से इस तथ्य को रेखांकित करते हुए लिखा है-‘‘वस्तुतः यूरोप के इतिहास में जिस समय मध्ययुग का प्रारंभ हुआ उस समय भारतीय इतिहास में नवीन उत्साह और नवीन जोश का उदय हुआ था। संस्कृत भाषा ने नयी शक्ति प्राप्त की और समूचे देश में एक नए ढंग की राष्ट्रीयता की लहर दौड़ गयी। इस काल में राज-काज से लेकर साहित्य, धर्म और सामाजिक विधि-व्यवस्था तक में एक विचित्र प्रकार की क्रांति का पता लगता है।......आज के भारतीय धर्म, समाज, आचार-विचार, क्रिया-कांड सभी विषयों पर इस युग की अमिट छाप है।..... जो पुराण और स्मृतियाँ आजकल असंदिग्ध रूप में प्रामाणिक मानी जाती है, उनका सम्पादन अंतिम रूप से इस काल में ही हुआ था। जो काव्य, नाटक, कथा, आख्यायिकाएँ उन दिनों लिखी गई, वे आज तक सम्मान और श्रद्धा पा रही है। जो शास्त्र उन दिनों प्रतिष्ठित हुए वे सैकड़ों वर्ष बाद आज भी भारतीय मनीषा को प्रेरणा दे रहे हैं। इस काल को, भारतीय उन्नति के स्तब्ध हो जाने का काल नहीं कहा जा सकता।’’23 द्विवेदीजी का कहना है, ‘‘इस काल को और चाहे जो कहा जाए, पतनोन्मुखी और ज़बदी हुई मनोवृत्ति का काल नहीं कहा जा सकता।’’24 स्पष्ट है कि भारत के मध्यकाल को ‘मध्यकाल’ के यूरोपीय परिभाषिकी और कालक्षेत्र के मानदंडों पर परखने से भ्रामक परिणाम निकलेंगे। ‘परिभाषिकी’ से दूर तक टकराना सम्भवतः मुश्किल हो सकता है, पर काल-सीमा तो निश्चित रूप से ही भिन्न है।

प्राचीनता और मध्यकालीनता के अंतर को पहचानते हुए भारतीय मध्यकाल का आरंभ निर्धारित करना बहुत दुष्कर कार्य है। प्रो. रामशरण शर्मा का तो कहना है कि इन दो युगों के अंतर को किसी निश्चित तिथि के माध्यम से नहीं पहचाना जा सकता है।25 इतिहासकारों में इसकी तिथि को लेकर मतभेद है। विभिन्न इतिहासकार अलग-अलग तिथियों से मध्यकाल का आरंभ मानते हैं। इस क्रम में सन् 646, 712, 916, 985, 1174, 1206 और 1325 जैसी तिथियों को प्रस्तावित किया गया। लेकिन प्रो. रामशरण शर्मा का कथन है कि ‘इनमें से कोई भी तिथि ऐसी नहीं है जो इस युग के राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में आधारभूत परिवर्तन को रेखांकित करती हो।’26

तुर्कों के शासन के स्थापित होने के साथ भारत में प्राचीन काल के अंत, मध्यकाल के आरंभ होने की बात भी कही जाती है। इन्हीं मान्यताओं के साथ आर. डी. बैनर्जी, आर. सी. मजूमदार, के. ए. निलकांत शास्त्री, आर. एस. त्रिपाठी जैसे कुछ विद्वान सन् 1206 को वह बिन्दु मानते हैं जब प्राचीन काल समाप्त और मध्यकाल शुरू होता है।27 यह मान्यता मूलतः भारतीय इतिहास के काल विभाजन की ब्रिटिश प्रणाली पर आधारित है, जो हिन्दू, मुस्लिम और ब्रिटिश काल के रूप में दौर निर्धारित करती है। औपनिवेशिक निहितार्थों से युक्त यह मान्यता ख़तरनाक और भ्रामक निष्कर्षों को जन्म दे सकती है, जिसके आधार पर प्राचीन भारत को हिन्दू भारत और मध्यकालीन भारत को मुस्लिम भारत के रूप में देखा जा सकता है। प्रो. आर. एस. शर्मा का कहना है कि यदि इस स्थापना को मान लें तो तुर्की, इजिप्ट, इराक, ईरान, पाकिस्तान और इंडोनेशिया जैसे देश स्थायी रूप से मध्यकाल में और हिन्दू नेपाल प्राचीन काल में गिने जायेंगे। और फिर उन देशों के मध्यकाल को कैसे निर्धारित करेंगे जहाँ इस्लामिक शक्तियों से कोई टकराव ही नहीं हुआ?28 स्पष्ट है कि मुस्लिम शासन के काल के रूप में मध्यकाल को नहीं व्याख्यायित कर सकते।

पश्चिमी यूरोप में मध्यकालीनता को सामान्यतः सामंतयुगीन प्रवृत्ति से जोड़कर देखा जाता है और इसी आधार पर सन् 500 से सन् 1500 (लगभग) तक के काल को मध्यकाल कहा जाता है। इसी प्रकार भारत में भी इतिहासकारों ने सामंतवाद के अभ्युदय और विकास से ही मध्यकाल का संबंध स्थापित करने की कोशिश की। सैयद नूरूल हसन ने मध्यकालीन भारत को स्पष्टतः सामंती कहा है।29 लेकिन गैर-यूरोपीय देशों में सामंतवाद का न तो स्वरूप ही वैसा रहा है और न ही काल। स्वरूप पर हम यथास्थान विचार करेंगे। काल के संदर्भ में रामशरण शर्मा ने 300 और 1200 ई॰ के बीच के दौर को सामंती कहा है, जब उनकी राय में यूरोपीय फ्यूडलिज़्म की तमाम विशेषतायें यहाँ विकसित हो चुकी थी।30 इरफान हबीब 11वीं सदी में प्राविधिक विकास से मध्यकाल का संबंध जोड़ते हैं, तो रोमिला थापर 800-1200ई॰ यानि नवीं से तेरहवीं शताब्दी तक सामंतवाद का काल मध्यकाल मानते हैं।31 चूँकि विभिन्न इतिहासकारों के लिए सामंतवाद के विभिन्न अर्थ हैं, इसीलिए इतिहास का वह काल भी जिसे सामंती चरित्र का बताया जाता है इतिहासकारों की सामंतवाद सम्बन्धी समझ के मुताबिक अलग-अलग है।

के. दामोदरन का कहना है कि ‘‘गुप्त सम्राट के काल (ई॰ 320 से) में ही भारत में भूमि सम्पत्ति पर सामंती आधिपत्य के प्रथम तत्व, अपने प्रारंभिक रूप में प्रकट हुए।.....गुप्त सम्राज्य के पतन (ईसवी सन् लगभग 500) के बाद इसका और विकास हुआ। सातवीं शताब्दी में भारत में सत्तर से अधिक स्वतन्त्र सामंतवादी राज्य स्थापित हो चुके थे।’’32 ऐसे में जब आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी आठवीं सदी से मध्यकाल की शुरूआत प्रस्तावित करते हैं तो अधिक तर्क संगत लगता है। डा. रामविलास शर्मा भी इनसे सहमत ही दिखलाई पड़ते हैं जब वे कहते हैं कि ‘‘शुक्लजी का आदिकाल वास्तविक मध्यकाल है, हिेन्दी जनपदों के इतिहास का सामंतकाल है।’’33 गौरतलब है कि शुक्लजी का आदिकाल ‘संवत् 1050 (सन् 993) से लेकर संवत् 1375 (सन् 1318) तक’ माना जाता है।34 साथ ही उनका यह भी कहना है कि ‘‘यद्यपि जनश्रुति इस काल का आरंभ और पीछे ले जाती है....संवत् 770 (ई॰ सन् 713) में....।’’35 कुल मिलाकर आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी और डा. रामविलास शर्मा का काल-निर्धारण आस-पास ही है।

इतना तो स्पष्ट है कि भारत में सामंतवाद की स्थिति को विद्वानों ने स्वीकार किया है। लेकिन प्रश्न उठता है कि क्या भारत में सामंतवाद का वही चरित्र रहा है जैसा कि यूरोप में था? इस सिलसिले में सामंतवाद सम्बन्धी मान्यताओं पर दृष्टिपात करना ज़रूरी है।


23. हजारीप्रसाद द्विवेदी, मध्यकालीन बोध का स्वरूप, पृ॰ 22.
24. वही.
25. आर. एस. शर्मा, अर्ली मेडियेवल इन्डियन सोसाइटी-ए स्टडी इन फ्यूडलाइजेशन, पेज 18.
26. वही.
27. वही, पेज 17.
28. वही.
29. हरबंस मुखिया, मध्यकालीन भारत: नए आयाम, पृ॰ 114 से उद्धृत.
30. रामशरण शर्मा, भारतीय सामंतवाद, पृ॰ 1,2,7,16.
31. रोमिला थापर, भारत का इतिहास, पृ॰ 218.
32. के. दामोदरन, भारतीय चिंतन परम्परा, पृ॰ 207.
33. रामविलास शर्मा, हिन्दी जाति का साहित्य, पृ॰ 122.
34. आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृ॰ 3.
35. वही.



क्रमश:

अगले अंक में सामंतवाद

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