Tuesday, May 12, 2009

*** भारतीय सामंतवाद

भारत की स्थिति थोड़ी भिन्न है। यहाँ सामंतवाद के स्वरूप के संदर्भ में ही नहीं बल्कि उसके होने (Existance) तक पर प्रश्न चिह्न लगाया गया। इसके पीछे कई कारण हैं। पहला, सामंतवाद इतिहास चक्र में दास-युग के बाद की व्यवस्था को कहा गया है, लेकिन भारत कभी भी दास-युग से नहीं गुज़रा। हालाँकि यहाँ दासप्रथा के प्रचलन को कई इतिहासकारों ने रेखांकित किया है; कई प्राचीन ग्रन्थों में इसका उल्लेख और ठोस साक्ष्य उपलब्ध है। यहाँ तक कि ऋग्वेद में भी इसका उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद के बालखिल्व सूक्तों में आये पृषध ऋषि की इस उक्ति में सहज ही दृष्टव्य है-‘‘शतं में गर्दभानां शतमुपवितीनां। शतं दासाः अति सृजः।’’48 यहाँ दासों को गधों और भेड़ों के समान बताया गया है। फिर भी के॰ दामोदरन का कहना है, ‘‘भारत में दास प्रथा का संकट इतना गहरा और उसका विघटन इतना वेगपूर्ण नहीं था जितना यूरोप में था।’’49 यह ठीक भी है क्योंकि अपने तमाम विवादों के बावजूद किसी भी पूरे युग को भारत में दास-युग की पारिभाषिकी में नहीं पहचाना गया है।

दूसरे, ‘कृषक दासता’ की स्थिति भी भारत के संदर्भ में नहीं देखी जा सकती। के॰ दामोदरन ने लिखा, ‘‘भारत में बेगारी और श्रम मज़ूरी के साथ दासता सामाजिक संबंधों का मुख्य अंग कभी नहीं रही।’’ साथ ही उन्होंने लिखा-‘‘ यह सही है कि सामंतवाद के अंतिम चरणों में ऐसी मिसालें देखने को आयीं जब जमींदार अपने दासों को खेतों में बेगार के लिए विवश कर देते थे।’’50 फिर भी पश्चिम की तरह कृषक दासता न होने का कारण है यहाँ की आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था। प्रो. रोमिला थापर ने लिखा-‘‘अर्थतंत्र की दृष्टि से ग्राम आत्मनिर्भर होते थे, जहाँ उत्पादन स्थानीय ज़रूरतों के अनुरूप होता था, व्यापार और विनिमय के लिए कुछ भी फालतू उत्पादन की कोशिश नहीं होती थी।’’51 भूमि अनुदान की प्रथा भी शुरू हो गयी थी, लेकिन यह भी पश्चिम की तरह संप्रभुओं के द्वारा अपने भृत्यों को दिये जाने वाले अनुदान के जैसा नहीं था।

प्रो. हरबंस मुखिया का कहना है- यूरोपीय फ्यूडलिज़्म के साथ भारतीय फ्यूडलिज़्म की किसी प्रकार की समानता नहीं है। इसके दो मूल कारण हैं, एक तो यह कि सैद्धांतिक रूप से फ्यूडलिज़्म कभी भी विश्वव्यवस्था नहीं बन सकता था, वह हमेशा ही एक आंचलिक या क्षेत्रीय व्यवस्था होता था। अर्थात् सभी क्षेत्रों में सामंतवाद का चरित्र एक जैसा हो ही नहीं सकता, बल्कि समानता की कोई गुंजाइश ही नहीं है। यह बात दूसरे ढंग से प्रो. नामवर सिंह ने एक व्याख्यान में कही-‘‘भारतीय सामंतवाद यूरोपीय सामंतवाद से भिन्न है। यूरोप में भी स्वयं जर्मन सामंतवाद, फ्रांसीसी सामंतवाद से भिन्न है। फ्रांसीसी सामंतवाद ब्रिटिश सामंतवाद से भिन्न है। इटैलियन सामंतवाद इन सबसे भिन्न है।’’52 ये भिन्नता क्यों है और किस तरह है, इसके विवरण में नामवर सिंह नहीं गए। खैर....दूसरा कारण स्पष्ट करते हुए प्रो. मुखिया ने कहा कि यूरोप की भौगोलिक एवं पर्यावरण संबंधी स्थिति, उत्पादन तकनीक एवं श्रम संगठन प्रक्रिया हमेशा ही भारत से भिन्न रही है।53 भारतीय सामंतवाद और यूरोपीय सामंतवाद में समानता है या नहीं, है तो कितनी? भिन्नता है तो कितनी? यह अलग बहस का विषय है और इतिहासकारों के बीच यह बहस जारी भी है। लेकिन यह स्पष्ट है कि इसे अब लगभग सबने स्वीकारा है कि भारतीय सामंतवाद की अपनी कुछ ख़ास विशेषतायें हैं, जो गैर-एशियाई व गैर-भारतीय सामंती व्यवस्थाओं में नहीं मिलती हैं, बल्कि भारत में ही अलग-अलग क्षेत्रों में सामंती संबंधों के रूप अलग-अलग थे। तय है कि कुछ समानतायें भी थीं।

भिन्न-भिन्न देशों में और भिन्न-भिन्न कालों में अपने रूपों की समस्त विविधता के बावजूद सामंतवाद की मूल अभिलाक्षणिकता एक-सी रही है। मार्क ब्लाख के अनुसार-‘‘समय और स्थान के द्वारा पृथ्क इन सभी समाजों ने ‘सामंती’ नाम केवल इसलिए प्राप्त किया है कि उनमें पश्चिमी सामंतवाद के कुछ वास्तविक अथवा अनुमानित सदृश्ताएँ हैं।’’54 ये सदृश्ताएँ हैं - उत्पादन के मुख्य साधनों, जमीन पर सामंतों के शासक वर्ग (जो कभी-कभी पूरी तरह राज्य सत्ता के साथ विलीन हो जाता है) का एकाधिकारपूर्ण स्वामित्व का रहना, जबकि अर्थव्यवस्था का संचालन छोटे-छोटे उत्पादक, किसान अपने तकनीकी साधनों के ज़रिये करते रहे। सामंतवाद का मुख्य आर्थिक संबंध सामंती लगान में यानी ऐसे देशी उत्पाद में प्रकट होता है, जिसे सामंत (या राज्य) श्रम, मुद्रा या जिंस मंे अदायगी के रूप में उत्पादकों से हासिल करते हैं।55 प्रो. हरबंस मुखिया का कहना है-‘‘ये परिभाषायें इतनी व्यापक हैं कि सभी प्राक्-पूँजीवादी व्यवस्थाओं को एक ही बार में समेट लेती हैं, क्योंकि मुख्यतः कृषि उत्पादन, सम्पत्ति का बँटवारा और शासक वर्ग के द्वारा गैर-आर्थिक बल-प्रयोग के ज़रिए किसान की अतिरिक्त उपज को विभिन्न रूपों में - जैसे भाड़ा (श्रम, नकद या जिंस के रूप में) या राजस्व अथवा दासता या बंधुआ श्रम के रूप में - हड़प लेने की विशेषतायें सभी प्राक्-पूँजीवादी व्यवस्थाओं में मिलती हैं। फ्यूडल शब्द के ऐसे व्यापक इस्तेमाल से सामाजिक आर्थिक संगठन की उन विशेषताओं का पता नहीं चलता जो उसे यूरोप के प्राक्-फ्यूडल तथा गैर-यूरोपीय मध्यकालीन सामाजिक-आर्थिक व्यवस्थाओं से अलगाती है। इसलिए इनसे फ्यूडल की पर्याप्त व्याख्या नहीं होती।’’56 इसमें कोई दो राय नहीं कि हर क्षेत्र का फ्यूडल चरित्र उस क्षेत्र के ठोस परिस्थितियों में ही विश्लेषित किया जा सकता है। लेकिन विभिन्न देश-काल की ऐतिहासिक समानताओं को नज़रअंदाज़ कर विभिन्नताओं पर ज़रूरत से अधिक बल देना ऐतिहासिकता के विरूद्ध भी हो सकता है। प्रो. रामशरण शर्मा ने प्रो. हरबंस मुखिया के तर्कों का जवाब देते हुए लिखा-‘‘जनजातीय कबिलाई युग (Tribalism), प्रस्तर युग, धातु युग और भोज्य उत्पादक अर्थव्यवस्था का आगमन ये ‘यूनिवर्सल फेनोमेना’ है। जो परिवर्तन की प्रक्रिया और प्रणाली के किन्हीं नियमों और स्थितियों का संकेत करते हैं।’’57 स्पष्ट है कि परिवर्तन और विकास के इन सार्वभौमिक नियमों की उपेक्षा कर इतिहास की व्याख्या संभव नहीं है।

यूरोपीय सामंतवाद के स्वरूप का निषेध कर भारतीय सामंतवाद को न विश्व-व्यवस्था के अंग के रूप में समझा जा सकता है, न ही उसकी विशिष्टता में। भारत में सामंतवाद के मूल लक्षण अन्य देशों में सामंतवाद के मूल लक्षणों से बहुत भिन्न नहीं थे। प्रथम सहस्राब्दी ई॰ के मध्य के आसपास बाज़ार में भेजे जानेवाले माल के उत्पादन में कमी आई और शहरी केन्द्रों तथा विदेश व्यापार का ह्रास हुआ, जिससे आत्मकेन्द्रित अर्थव्यवस्था का विकास हुआ। जिसमें धातु के सिक्के दुर्लभ हो गए और इसीलिए सारा भुगतान (चाहे पुरोहितों को हो या सरकारी अमलों को) या तो भूमिदान के द्वारा अथवा राजस्व-दान के ज़रिए करना ज़रूरी हो गया।58 यहीं से सामंतवाद सुदृढ़ होता है।

दामोदर धर्मानंद कोसंबी ने भारतीय सामंतवाद को द्विचरणीय विकास के रूप में देखा है, और इसे ‘ऊपर से विकसित होने वाला सामंतवाद’ और ‘नीचे से विकसित होेने वाला सामंतवाद’ जैसे पदों में विश्लेषित किया है। कोसंबी का मानना है कि ईसवी सन् के प्रारंभिक सदियों के दौरान जब राजा भूमि पर अपने राजस्विक तथा प्रशासनिक अधिकारों का परिहार अपने अधीनस्थ सरदारों के हक़ में करने लगे और इस तरह इन सरदारों का किसानों से सीधा संबंध कायम हो गया तो गाँव की बंद कृषि अर्थव्यवस्था में खलल पड़ा। इसी प्रक्रिया को वे ‘ऊपर से विकसित होने वाला सामंतवाद’ कहते हैं। गुप्त राजाओं और हर्ष के काल में यह प्रक्रिया परवान चढ़ी। कोसंबी का कहना है कि आगे चलकर ‘गाँव के अंदर राज्य और किसानों के बीच भूस्वामियों का एक वर्ग विकसित हुआ जिसने अपनी सेना और शस्त्रों के बल पर धीरे-धीरे स्थानीय आबादी पर सत्ता स्थापित कर ली।’ इस प्रक्रिया को कोसंबी ‘नीचे से विकसित होने वाला सामंतवाद’ कहते हैं।59

के. दामोदरन ने उन लक्षणों की चर्चा की है जिनसे भारतीय सामंतवाद का स्वरूप विशिष्ट हो जाता है। ऐसे लक्षणों में युगों पुराने ग्राम समुदाय, कृषि और दस्तकारी का एक दूसरे में घुले-मिले होना, बिरादरी के कबीली संबंधों का जारी रहना, जातिप्रथा और अस्पृश्यता का विकास, और इन सबके साथ-साथ दास-प्रथा के अवशेषों और यहाँ तक कि आदिम साम्यवाद के अवशेषों का भी जारी रहना, मुख्य हैं। उनका कहना है-‘‘भारत में सामंतवाद के तत्व वर्णाश्रम व्यवस्था के ढाँचे के अंदर ही उसे पूर्णतः नष्ट किये बिना विकसित हुए और एक लम्बे अरसे तक वे दास-प्रथा पर आधारित संबंधों से सम्बद्ध रहे।’’60 भारतीय सामंतवाद का एक ख़ास लक्षण दामोदरन ने यह बताया कि भूमि कभी-कभी मंदिरों को दान कर दी जाती थी। इन मंदिरों की देखभाल प्रायः ब्राह्मण पुजारी ही करते थे और ये पुजारी इस ज़मीन को अपने उपयोग के लिए हड़प लेते थे। चीनी यात्री फाहियान (ईसवी सन् चैथी शताब्दी) ने बताया है कि उन दिनों मठों को खेत, बगीचे और चैपाये दान में दिए जाते थे, और इनकी देखभाल के लिए खेतिहर भी दिए जाते थे। व्यक्तियों तथा धार्मिक संस्थाओं को दिये जाने वाले इस तरह के दान, जो गुप्त शासन काल में छोटे पैमाने पर शुरू हुए थे, सामंतवाद की बाद की मंज़िलों में बहुत बढ़ गए। इस प्रकार के दानों का अर्थ यह नहीं था कि स्वामिŸव भी दे दिया गया है। इसका अर्थ केवल यह था कि उन्हें इस सम्पत्ति को अपने कब्जे़ में रखने और उसका इस्तेमाल करने तथा राजस्व वसूल करने का अधिकार है। किन्तु इससे एक नए पुरोहित वर्ग के उदय का मार्ग प्रशस्त हुआ, जो ईश्वर और धर्म के नाम पर विराट भू-क्षेत्रों पर सामंती अधिकारों का प्रयोग करता था।61

भारतीय सामंतवाद का ढाँचा अत्यंत जटिल था, जिसमें कितनी ही प्रकार की संबंध व्यवस्थायें शामिल थीं। सबसे ऊपर राजा था, उसके दरबारों और सामंती ज़ागीरदार और उनके बाद ज़मींदार। सबसे नीचे के स्तर पर ज़मीन को जोतने वाले किसान थे। के. दामोदरन के अनुसार ‘‘सामंती ग्राम समुदाय में चार सामाजिक समूह थे। पहला समूह था- शोषण करने वाले उच्च वर्गों का, जिसमें सरकारी अधिकारी, पुरोहित और ग्राम-शासक शामिल थे। इनके पास सबसे अच्छी ज़मीनें होती थी। दूसरा समूह स्वतंत्र किसान समुदायों या संयुक्त परिवारों का था। इनके पास भी ज़मीन होती थी। इनके नीचे, ज़मीन के असली जोतने-बोने वालों का समूह था। अंतिम दोनों समूह सर्वाधिक शोषित थे। सामन्ती ज़ागीरदारों के साथ मिलकर उच्च वर्ग के लोग अपनी सामाजिक स्थिति और प्रभाव को, परम्परागत व्यवस्था को कायम रखने के लिए इस्तेमाल करते थे।’’62 इस तरह सामाजिक स्थितियों की सोपानबद्धता (Hierarchy) नये रूपों में उभरी। भारतीय समाज में श्रेणी-विन्यास (Hierarchy) का प्रारंभ वर्णों के उदय के साथ हुआ। प्राक् सामंती श्रेणी-विन्यास वैश्यों से दान-दक्षिणा और कर-नज़राने की उगाही तथा शूद्रों से बलात् श्रम-सेवा लेने के आधार पर कायम था। इस असमानता को कर्मकाण्डी व्यवस्थाओं द्वारा वैध रूप दिया जाता था। लेकिन सामंती श्रेणी-विन्यास का अपना चरित्र था, क्योंकि उसका आधार भूमि का असमान वितरण था, और चूँकि उसके साथ-साथ जातिप्रथा का भी संयोग था। इसलिए उसमें उन्नति की कोई गुंजाइश नहीं थी। यह श्रेणी-विन्यास लोगों के मानस पर इस प्रकार छाया हुआ था कि समानता या लोकतंत्र के लिए कोई गुंजाइश ही नहीं रह गई थी।63

सामंती युग के श्रेणी-विन्यास का उस युग के अर्थव्यवस्था और जाति-प्रथा से जो संबंध था उसके स्वरूप का विश्लेषण डा. रामविलास शर्मा के सरल शब्दों में इस तरह किया जा सकता है - ‘‘सामंती व्यवस्था में खाने-पहनने की चीज़ें मशीनों से नहीं, हाथ से, बड़े पैमाने पर नहीं छोटे पैमाने पर, कारखानों में नहीं खेत, घर या दुकान पर तैयार की जाती है। हल-माची की खेती से लेकर चरखे-करघे की कताई-बुनाई तक के उद्योग में पूरा कुटुम्ब शामिल होता था। जो पेशा बाप का वही बेटे का। इस तरह पेशे के हिसाब से जातियाँ बनती हैं; पेशे का आधार होता है कुटुम्ब; इसीलिए जो जाति बाप की होती है वही बेटे की होती है। समाज में जो हाथ से खाने-पीने की चीज़े पैदा नहीं करता, वह ऊँचा समझा जाता है, जो हल चलाता है कपड़े बनाता है, जूते गाँठता है वह नीच समझा जाता है।’’ आगे उन्होंने लिखा, ‘‘जिस देश में सामंती व्यवस्था ज़्यादा दिन तक रही उसमें जाति प्रथा भी ज़्यादा दिन टिकाऊ हुई, उसकी संकीर्णता भी अन्य देशों को देखते हुए बहुत ही घृणित रूपों में प्रकट हुई, जैसे भारत में।’’64

उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि भारतीय सामंतवाद और यूरोपीय सामंतवाद के स्वरूपों में समानतायें भी हैं और भिन्नतायें भी। समानतायंे सामाजिक विकास के नियम के धरातल पर दिखती हैं तो भिन्नतायें सामाजिक विकास के रूप के धरातल पर। क्योंकि नियम सार्वभौम होते हैं, घटनायें स्थानीय। क्योंकि नियमों में एकता होती है, स्थितियों में विविधता। ये समानतायें और भिन्नतायें मध्यकालीनता की अवधारणा के भारतीय और यूरोपीय स्वरूपों के निर्धारण में भी अपनी भूमिका अदा करते हैं।

यूरोपीय सामंतवाद ने ईसाई धर्म के अलावा पुरानी सभ्यता, पुराने दर्शन, पुरानी राजनीति तथा विधिशास्त्र को बिल्कुल साफ कर दिया था। फलतः पादरियों को बौद्धिक इज़ारेदारी प्राप्त हो गयी, जो धर्म और चर्च के वर्चस्व की आधार भूमि सिद्ध हुई। यूरोपीय मध्यकालीनता इसी धार्मिक वर्चस्व से उत्पन्न सांस्कृतिक जड़ता की अभिव्यक्ति है। जन-जीवन पर धर्म का लगभग इसी तरह का बोलबाला भारतीय मध्ययुगीन समाज में भी देखने को मिलता है। पुरोहितों-पण्डितों-आचार्यों के मठ-गढ़-पीठ-अखाड़े हुआ करते थे। इनका समाज पर व्यापक दबदबा था और एक दबाव-समूह की तरह शासन अथवा सत्ता को प्रभावित भी करते थे। राजकाज में पुरोहितों का मत दरबार में महत्त्व भी पाता था। लेकिन भारत में यूरोप के चर्च की तरह किसी धार्मिक संस्था का शासन पर पूर्ण नियंत्रण नहीं था। इसीलिए राज्य सत्ता धर्म का पिछलग्गू कभी नही बन पाया।

इस्लामी शासन के दौरान भी यही स्थिति बनी रही। हालाँकि मुसलमान, विशेष रूप से मुस्लिम शासक अपनी धार्मिक कट्टरता के लिए अधिक विख्यात हैं। यह गलत भी नहीं है, क्योंकि बाहरी तौर से निःसंदेह वे इस्लाम के कट्टर अनुयायी होने का दिखावा करते थे। लेकिन वास्तविकता कुछ और ही थी। सल्तनत ने स्वयं अपने नियम कानून बना लिए थे, जो इस्लाम के नियम कानून से भिन्न थे। सल्तनत के नियमों की परिभाषा एक वाक्य में इस तरह की जा सकती है- सुल्तान की मर्जी।65 स्पष्ट है कि धर्म को राज्यसत्ता पर मुसलमान शासकों ने भी नहीं हावी होने दिया। रोमिला थापर का यह कथन बिल्कुल सही लगता है कि ‘‘धर्म को तब कोई महत्त्व नहीं दिया जाता था, जबतक कि वह किसी निश्चित राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति नहीं करता था। लेकिन जहाँ भी यह राजनैतिक उद्देश्य पूरे कर सकता था, इसका जमकर प्रयोग किया जाता था।’’66 धर्म और धर्मशास्त्र का शासन तंत्र से यह विशिष्ट संबंध था जो यूरोपीय ढाँचे से बिल्कुल अलग था। इसका परिणाम यह हुआ कि सामाजिक-आर्थिक क्षेत्रों में उन हलचलों को काफी स्थान मिला जिसने व्यापारिक पूँजीवाद के विकास में सहयोग किया। जिससे सामंती ढाँचे में समय-समय पर दरार उत्पन्न हुए, जिनमें मानववादी विचारों का स्फुरण हुआ। भक्ति आंदोलन के संदर्भ में इसे सहज ही देखा जा सकता है।

धर्म और धार्मिक संस्थाएँ यूरोपीय ढंग का वर्चस्व भारत में स्थापित क्यों नहीं कर सकीं? इसके अनेक कारण हो सकते हैं। मुख्यतः इसका मूल भारतीय सामंतवाद के विशिष्ट चरित्र में है। यूरोपीय सामंतवाद का प्रादुर्भाव जैसा कि कहा जा चुका है पुरानी दर्शन, पुरानी राजनीति, पुरानी सभ्यता, पुराने विधिशास्त्र आदि सभी को नष्ट करते हुए हुआ। केवल ईसाई धर्म को उसने बनाये रखा। ऐसे में ईसाई धर्म को बौद्धिक इज़ारेदारी के रूप में अपनी शक्ति अर्जित करने के लिए पर्याप्त स्थान मिल गया। भारतीय सामंतवाद का प्राचीन सभ्यता से इस तरह का सीधा टकराव नहीं हुआ। पुराने ग्राम समुदाय बने रहे, बिरादरी के कबीलाई संबंध जारी रहे, दास-प्रथा और आदिम साम्यवाद के अवशेष भी बचे रहे, साथ ही इसने वर्णाश्रम व्यवस्था को भी बने रहने दिया। नतीजा वर्ण व्यवस्थागत श्रेणी-विन्यास बने रहे, अस्पृश्यता जारी रही। दूसरी तरफ सामंती संरचना में विकसित होने वाले नए संबंधों ने स्वयं को उसमें घुला दिया।

सामंती संरचना प्रभुत्वशाली भूस्वामी वर्ग तथा पराधीन कृषक वर्ग की बुनियाद पर खड़ी होती है। इन दोनों वर्गों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति समान नहीं होती थी। शीर्ष पर राजा होता था लेकिन सत्ता मुख्य रूप से भूस्वामी वर्ग पर अवलंबित होता था। भूस्वामी मोटे तौर पर ब्राह्मण तथा क्षत्रिय अर्थात् उच्च वर्ण के होते थे। अधिकतर कृषक शुद्र अर्थात् निम्नवर्ण के माने जाते थे। दूसरी ओर, चूँकि भूस्वामी ऊँची जातियों के थे और कृषक निचली जातियों के, इसलिए भूस्वामियों के लिए किसानों पर हुक्म चलाना आसान हो जाता था। कहने की ज़रूरत नहीं है कि वर्ण व्यवस्थागत श्रेणी-विन्यास और सामंती संबंधों की सोपानबद्धता दोनों मध्ययुग में 
मिलकर सामाजिक सोपानिकता की जड़ता को और अधिक सुदृढ़, निरंकुश और आत्तायी बना दिया।

इस्लामिक शासन के दौरान पहलीबार एक शक्तिशाली मध्ययुगीन राज्य का निर्माण हुआ। फिर भी स्थिति में कोई खास परिवर्तन नहीं आया। क्योंकि मुस्लिम शासक अपने साथ कोई नयी उत्पादन प्रणाली नहीं लाए। नतीजा सामंती आधार को नहीं बदल सके। हालाँकि शुरूआती दौर में मुसलमानों ने अप्रीतिकर जातिप्रथा, मूर्तिपूजा व अन्य हिन्दू मान्यताओं व कर्मकांडों को भय अथवा घृणा की दृष्टि से देखा होगा। किन्तु गहरी जड़ें जमाये इस प्रकार की जीवन-पद्धति को हटाना असंभव था। परवर्ती दौर में जब इस्लाम ने अपने आप को भारतीय परिवेश के अनुकूल बनाया तब जाति भेदों को दूर करने के बजाए भारतीय मुसलमान ‘शरीफजातों’ अथवा उच्च जातियों और ‘अजलाफजातों’ अथवा नीच जातियों में विभाजित हो गए। सामंती सरदार और अमीर उमरा ही नहीं बल्कि मज़हबी नेता -मुल्ला और उलमा- प्रायः सैयदों या शेखों की ऊँची जाति के होते थे। श्रमिक लोग -जुलाहे, भिश्ती, तेली, लकड़हारे, खेतों पर काम करनेवाले और मुसलमानों के अन्य धन्धे पेशेवाले समूह- नीची जाति के लोग समझे जाते थे। उन्हें तुच्छ माना जाता था और ऐसे ही पेशों के हिन्दुओं से उनकी स्थिति भिन्न नहीं थी। इस्लाम के आध्यात्मिक नेता जिन्होंने सामंती वर्गों के संबंध जोड़े रखा था, आमतौर से इस स्थिति का समर्थन करते थे। हिन्दू पुरोहितों की तरह मुसलमान मुल्ला भी, समाज में जातिभेदों और वर्ग विभाजनों को सुदृढ़ करने में मदद करते थे।67

इसके बावजूद जाति संबंधी नियम हिन्दुओं की तरह कड़े नहीं थे, थोड़ा लचीलापन था। नमाज़ या इबादत के वक़्त जातिभेद और वर्गभेद को दरकिनार कर दिया जाता था। आर्थिक परिस्थितियों में परिवर्तन होने पर उन्हें अपनी जाति को बिना अधिक कठिनाई के बदल देने में सहायता मिलती थी। उन दिनों एक कहावत प्रचलित था जिसका सार यह है कि ‘‘पिछले साल में जुलाहा था, इस साल शेख हूँ, और अगले साल फसल अच्छी हुई तो सैयद हो जाऊँगा।’’68 किसी व्यवहारतः किसी दलित मज़दूर के लिए शेख की पदवी पर पहुँचना आसान काम नहीं था। जो भी हो, यह तो स्पष्ट है कि समाज में श्रेणी-विन्यास बना रहा, और यह भेदभाव कर्म, विचार अथवा व्यवहार पर आधारित न होकर जन्मगत था। जन्म से ही उसकी न केवल सामाजिक स्थिति तय हो जाती थी, बल्कि उसका पेशा-धंधा भी तय हो जाता था। छोटे स्तर का उत्पादन होने के कारण पूरा परिवार एक ही पेशे से जुड़ जाता था। जहाँ बाप का पेशा बेटा अपनाता था और यह नियम कट्टरता से चलता था। इसे धर्म का समर्थन भी मिल जाता था। यही वह मूल आधार है जिससे वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था सुदृढ़ होती है। यही मध्यकालीनता है।

तात्पर्य यह कि भारत में मध्ययुग में राज्यसत्ता के साथ धर्म का संबंध एक विशिष्ट संबंध था, जिसमें कभी राजकाज पर धर्म और कभी धर्म पर राजकाज हावी रहता था। अतः भारतीय मध्ययुग को जैसा कि कहा जा चुका है अंधकार युग नहीं कहा जा सकता। इसलिए भारतीय मध्यकालीनता पूरे युग की मानसिकता की अभिव्यक्ति नहीं है। फिर भी, ऊपर विवेचित सोपानिकता, जातिगत और वर्णगत भेदभाव जो कि मध्यकालीनता का मूल है, यह सर्वाधिक विकसित रूप में सामंतवाद के विकास के साथ मध्यकाल में दिखाई देता है। ऐसे में ऐसी प्रवृत्तियों व मानसिकताओं को ‘मध्यकालीनता’ कहना ही उपयुक्त है। यह भी सही है कि ऐसी प्रवृत्तियाँ ने केवल पूर्व-मध्यकाल बल्कि आधुनिक युग में भी दिखायी दे जाती है। इसीलिए मध्यकालीनता अवधारणात्मक प्रवृत्ति के रूप में काल का अतिक्रमण करती है।


48. ऋग्वेद, 8/8/3.
49. के. दामोदरन, भारतीय चिंतन परम्परा, पृ॰ 209.
50. वही, पृ॰ 208.
51. रोमिला थापर, भारत का इतिहास, पृ॰ 221.
52. ‘आत्मसंभवा’, सम्पा. डा. मोहन, अंक-1, जुलाई-सितंबर 2001, पृ॰ 7.
53. हरबंस मुखिया, मध्यकालीन भारत: नए आयाम, पृ॰ 87.
54. मार्क ब्लाख, समांती समाज, भाग-2, पृ॰ 219.
55. दर्शन कोश, पृ॰ 702.
56. हरबंस मुखिया, मध्यकालीन भारत: नए आयाम, पृ॰ 89.
57. आर. एस. शर्मा, अर्ली मेडियेवल इन्डियन सोसाइटी-ए स्टडी इन फ्यूडलाइजेशन, पेज 77.
58. भारतीय सामंतवाद, राज्य, समाज और विचारधारा, सम्पा. डी. एन. झा, पृ॰ 4.
59. डी. डी. कोशाम्बी, एन इंट्रोडक्सन टू द स्टडी आफॅ इंडियन हिस्ट्र, पेज 275-276.
60. के. दामोदरन, भारतीय चिंतन परम्परा, पृ॰ 209.
61. वही, पृ॰ 211-212.
62. वही, पृ॰ 214.
63. आर. एस. शर्मा, अर्ली मेडियेवल इन्डियन सोसाइटी-ए स्टडी इन फ्यूडलाइजेशन, पेज 267.
64. रामविलास शर्मा, निराला की साहित्य साधना, भाग-2, पृ॰ 27-28.
65. के. दामोदरन, भारतीय चिंतन परम्परा, पृ॰ 303.
66. रोमिला थापर, भारत का इतिहास, पृ॰ 281.
67. के. दामोदरन, भारतीय चिंतन परम्परा, पृ॰ 305-306.
68. वही, पृ॰ 305.


क्रमश:

अगले अंक में मध्यकालीनता

2 comments

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi May 12, 2009 at 11:14 PM

इस आलेख को तो प्रिंट कर के ही पढ़ना पड़ेगा। इस के तीन टुकड़े कर देते तो ठीक रहता।

Udai Singh May 16, 2009 at 12:03 AM

बहुत बढिया लेख है!!!