Wednesday, May 20, 2009

आधुनिकीकारण

आज आधुनिकीकरण का अर्थ साधारणतः आर्थिक प्रगति, औद्योगिक उन्नति व तकनीकी विकास माना जाता है, और इसे पश्चिमीकरण से जोड़ दिया जाता है। इन अर्थों में आधुनिकीकरण को समझना उसे सीमित कर देना है। यहाँ तक कि 19वीं सदी के आरंभ में आधुनिकीकरण धर्मनिरपेक्षता और बौद्धिकता के विकास के रूप में स्वीकार किया जाता था और उसका संबंध उस प्रगति से था जो मनुष्य ने निरंकुशता और अंधविश्वासों से मुक्ति के रूप में पायी थी। कहा जा सकता है कि आधुनिकीकरण का तात्पर्य केवल आर्थिक उन्नति, सामाजिक समृद्धि और सुधार या क्रांति ही नहीं, बल्कि पूरे समाज, उसकी मनोवृत्ति और उसकी संस्थाओं का सम्पूर्ण रूपांतरण है।82

आधुनिकीकरण के अर्थ भिन्न-भिन्न संदर्भों में भिन्न हो जाते हैं, लेकिन वे सब मिलकर विकास और परिवर्तन की एक दिशा स्थिति को मूर्त करते हैं। अर्थशास्त्रियों के लिए आधुनिकीकरण का अर्थ है: मनुष्य द्वारा तकनीकी ज्ञान का प्रयोग। ‘हाथ के स्थान पर मशीन द्वारा वह प्राकृतिक साधनों का उपयोग कर उत्पादन में उल्लेखनीय प्रगति करता है।’83 समाजशास्त्रियों या सामाजिक नृतत्वशास्त्रियों के लिए आधुनिकीकरण अवकलन की प्रक्रिया -प्रोसेस आव डिफ्रेन्शियेशन- है जो आधुनिक समाज का लक्षण कहा जाता है। उन्होंने उन पद्धतियों की खोज की जो नयी सामाजिक संरचना के उदय और नयी ज़िम्मेदारियों को वहन कर सकने में सक्रिय होती है। नये पेशों और धन्धों के उदय नयी और संश्लिष्ट शिक्षा द्वारा सामाजिक संरचना में अवकलन या नये समाज के उदय की प्रक्रिया को ही वे आधुनिकीकरण की प्रक्रिया कहते हैं। राजनीतिशास्त्रि आधुनिकीकरण की चर्चा करते हुए उन प्रणालियों का ज़िक्र करते हैं जिनके द्वारा शासन, परिवर्तन और नवीनीकरण की अपनी सामर्थ्य में वृद्धि करता है ताकि उसकी नीतियाँ, सामाजिक कल्याण के हित में हो। इस प्रसंग में प्रजातंत्र को आधुनिक शासन प्रणाली कहा जाता है।84

अक्सर आधुनिकीकरण को स्तरीय शिक्षा, प्रजातंत्र व धर्मनिरपेक्षता जैसे विचारादर्श, राष्ट्रवाद, कुशल नेतृत्व और नियामक शासन से जोड़कर देखा जाता है और माना जाता है कि वृत्यात्मक तब्दीली और मूल्य-पद्धति में परिवर्तन आधुनिक समाज, अर्थव्यवस्था और राज्य के निर्माण की पूर्व शर्त है। यहाँ यह ध्यान रखने की ज़रूरत है कि चेतना आर्थिक और भौतिक परिवर्तनों का नियमन नहीं है, वरन् भौतिक परिवर्तन आर्थिक संघर्षों से ही चेतना का नियमन होता है। बाह्य परिस्थितियों में परिवर्तन से चेतना और मूल्य-दृष्टि में परिवर्तन का गहरा संबंध है। कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था की समाज व्यवस्था, मूल्य-व्यवस्था और जीवन-दर्शन विशेष प्रकार की थी, जिसे हम मध्यकालीनता के विश्लेषण के संदर्भ में देख चुके हैं। औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप औद्योगिकरण के साथ ही इस अर्थव्यवस्था में परिवर्तन होता है, परिणामस्वरूप समाज व्यवस्था बदलती है और उसके समानान्तर मूल्य व्यवस्था और जीवन-दर्शन में संक्रांति आ जाती है। तात्कालिक और ऊपरी दृष्टि से यह केवल एक आर्थिक प्रक्रिया नज़र आती है, लेकिन अपने गहन एवं संश्लिष्ट अर्थों में यह जीवन की अंतर्बाह्य संरचना के परिवर्तन की प्रक्रिया है। गाँवों का शहरीकरण या गाँव का शहर में स्थानांतरण सिर्फ ऊपरी रहन-सहन का नहीं, वरन् सारे आचार-विचार, दृष्टि और अनुभूति का परिवर्तन हो जाता है। इस दृष्टि से शहरीकरण, औद्योगिकरण और आधुनिकीकरण अन्योन्याश्रित माने गए हैं।85 औद्योगिकरण के साथ आधुनिकता को अन्योन्याश्रित मानने से यह सवाल पैदा हो सकता है कि क्या आधुनिकता कोई ऐसी वस्तु है कि जो इधर चिमनी का धुँआ उठा, उधर आधुनिकता प्रकट हुई? और यह जीवन-पद्धति या जीवन-मूल्य है तो क्या एकाएक पैदा होते हैं?

इसमें संदेह नहीं कि आधुनिक विश्वबोध निर्णायक रूप से औद्योगिक क्रांति के साथ स्थापित हो गया, और इसमें भी कोई संदेह नहीं कि आधुनिकीकरण तबतक सफल नहीं हो सकता जब तक कि उत्पादन पद्धतियों और संबंधों में परिवर्तन नहीं होता, लेकिन ऐसा नहीं है कि औद्योगिक क्रांति से पहले आधुनिकता के लक्षण अदृश्य थे। दरअसल आधुनिकता का संबंध पूँजीवाद से है न कि केवल उसके औद्योगिक रूप से। औद्योगिक पूँजीवाद से पहले भी पूँजीवाद की कई मंजिलें हैं। ‘‘पूँजीवाद की शुरूआत सूदखोरी से हुई थी।’’86 जिसे प्रेमचंद ने ‘महाजनी सभ्यता’ के रूप में विश्लेषित किया। फिर व्यापारिक पूँजीवाद का दौर आया। इस समय विश्वव्यापी मंडियों की खोज हुई, और बड़े-बड़े बाज़ार स्थापित हुए। इस पृष्ठभूमि के बिना औद्योगिक पूँजीवाद का अस्तित्व संभव ही नहीं था। पहले बाज़ार की माँग तब उत्पादन और तकनीक।

जिस अनुपात में व्यापार की उन्नति होती है, उसी अनुपात में सामंती ढाँचा शिथिल होता है, और उसी अनुपात में नयी गतिशीलता प्रकट होती है। धर्म को क्रमशः अपदस्थ करके विज्ञान का विकास और अंधशक्तियों के भय से मुक्त होकर मनुष्य के सजग कर्तृत्व का विकास एक उलझन भरी प्रक्रिया में होता है। यह परिवर्तन जिन ठोस सामाजिक परिस्थितियों में होता है, वे व्यापार की उन्नति पर आधारित हैं। बड़े पैमाने के विनिमय से नगरीकरण की प्रक्रिया तेज होती है, और उत्पादन का कुटुम्बगत आधार टूटता है, संयुक्त परिवार से अलग ‘व्यक्ति’ के उदय की प्रक्रिया आरंभ होती है। पहले के सामाजिक संबंधों में इस दरार से प्रचलित और मान्य वास्तविकताओं और विश्वासों में संदेह उत्पन्न होता है। व्यक्तिगत अनुभव का महत्त्व और उसे प्रमाण बनाने का आग्रह उभरता है। ‘हौं कहता आँखन देखी’- शास्त्र की मान्यताओं के नये बोध और नये ज्ञान के आधार पर चुनौती देने का साहस केवल व्यक्तिगत प्रतिभा का चमत्कार नहीं है, इस नयी चेतना और नयी आकांक्षा का उदय व्यापार की उन्नति से संबद्ध है। ऐंगेल्स ने यूरोपीय जागरण की चर्चा करते हुए बताया था कि व्यापार की उन्नति से सामंती बंधन ढीले हुए तथा किसानों और कारीगरों को करवट बदलने का मौका मिला। यही करवट नयी चेतना बनकर अभिव्यक्त हुई। इसे ही ‘पुनर्जागरण’ और ‘लोकजागरण’ की संज्ञा दी गई।


82. धनन्जय वर्मा, आधुनिकता के बारे में तीन अध्याय, पृ॰ 180.
83. इंसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका, वोल्यूम-24, पेज 80.
84. धनन्जय वर्मा, आधुनिकता के बारे में तीन अध्याय, पृ॰ 181.
85. वही, पृ॰ 184.
86. रामविलास शर्मा, आस्था और सौंदर्य, पृ॰ 249.

क्रमश:................

1 comments

Krrish

Good