Wednesday, May 27, 2009

भारतीय आधुनिकता

आधुनिकता के मूल तत्व आधुनिकता के सभी संस्करणों पर लागू किये जा सकते हैं, लेकिन आधुनिकता जब अलग-अलग समाज, संस्कृतियों, सभ्यताओं में प्रकट होती है तब अनेक आधुनिकताओं के रूप में दिखायी पड़ती है। आधुनिकता निर्गुण रूप है जबकि आधुनिकताऐं सगुण हैं।97 ऐसा इसलिए होता है क्योंकि आधुनिकीकरण की प्रक्रिया अलग-अलग होती है। ऐतिहासिक विकासक्रम की उपलब्धियाँ देश या प्रदेश की आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक अनिवार्यतायें आधुनिकीकरण और उसके लक्ष्यों का नियमन करती है। हालाँकि अक्सर यह समझ लिया जाता है कि आधुनिकता अर्जित करने के लिए अनिवार्यतः पश्चिमीकरण की प्रक्रिया से गुज़रता होगा। ‘‘पश्चिमीकरण से तात्पर्य उन समस्त सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और व्यापक रूप से मानव-मूल्यों, प्रतिमानों तथा उसी प्रकार की संस्थाओं और विधानों को अपना लेना है जिनसे पश्चिम और खासकर यूरोप गुज़रा है।’’98 यदि यह मान भी लिया जाए कि बोध को राष्ट्रीय सीमाओं में संकुचित नहीं किया जाना चाहिए, तो भी राजनैतिक, धार्मिक, बौद्धिक, नैतिक, सामाजिक, आर्थिक और जातीय दृष्टि से एशिया की विशेषतायें भिन्न हैं। ऐसे में उसका मूल्याँकन और उसके इतिहास की व्याख्या यूरोपीय दृष्टि से करना उचित नहीं होगा। यूँ तो विकसित देशों के आधुनिकीकरण से विकासशील देशों और अविकसित राष्ट्रों का आधुनिकीकरण निश्चित रूप से भिन्न होगा। इसी संदर्भ में भारतीय आधुनिकीकरण पर विचार करना चाहिए।

यूरोप में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया दो चरणों में पूरी हुई। पहला चरण 15वीं-16वीं शताब्दी का पुनर्जागरण था, दूसरा चरण 18वीं शताब्दी का ज्ञानोदय। पहले चरण में यूरोप ईसाइयत की छाँव में हजार साल की नींद से अंगड़ाई लेता हुआ जाग रहा था, और दूसरे चरण में विश्वविजेता बनकर औपनिवेशिक साम्राज्य स्थापित कर रहा था।99 भारत की स्थिति अलग थी। भारत न तो हजार साल की धर्म निद्रा में सोया था, न विश्वविजय पर निकला था। यह जगत् गुरू भले रहा हो, विश्वविजेता नहीं रहा। भारतीय इतिहास अंधकार युग में नहीं सोया। वह आक्रमण, प्रतिरोध, निर्माण और पराजय के उथल-पुथल से बनता-बिगड़ता रहा है। लेकिन यहाँ भी आधुनिकता की प्रक्रिया के दो चरण देखे जा सकते हैं। पहला 15-16वीं शताब्दी का जागरण, जिसे डा. रामविलास शर्मा ‘लोकजागरण’ कहते हैं, और दूसरा 19वीं सदी का जागरण जिसे डाॅ. शर्मा ही ‘नवजागरण’ कहते हैं। 15-16वीं शताब्दी का जागरण सोये हुए समाज का जागरण नहीं था, बल्कि किसानों, कारीगरों, व्यापारियों की सामाजिक शक्ति का जागरण था, और 19वीं सदी का जागरण एक पराधीन औपनिवेशिक राष्ट्र के ‘स्वत्व’ का जागरण था। यूरोपीय आधुनिकीकरण की प्रक्रिया के दोनों चरण जहाँ एक-दूसरे से जुड़ी, विकास की निरंतरता में घटित हुआ, वहीं भारतीय आधुनिकीकरण की प्रक्रिया के दोनों चरण एक-दूसरे से विच्छिन्न और स्वतंत्र रहे। दूसरे शब्दों में नवजागरण, लोकजागरण का विकास नहीं है। इसका कारण है अंग्रेजी राज। ‘‘भारत अपनी समस्त आर्थिक और सामाजिक संरचना के साथ विकास की जिस स्वभाविक दिशा में अग्रसर था, उसे अंग्रेजी शासन और पाश्चात्य प्रभाव ने बलात् मोड़ दिया।’’100 19वीं सदी की साहित्यकारों की टिप्पणियों और 20वीं सदी के इतिहासकारों के निष्कर्षों की तुलना करें तो अंग्रेजी लूट-खसोट का पूरा परिदृश्य साफ हो जाएगा। उद्योगों के तबाह होने पर भारत कैसे ‘कृषि प्रधान देश’ बना इसका स्पष्टीकरण एक ही तथ्य से हो जाएगा। तीन दशकों में भारत से कपास के निर्यात का आँकड़ा इस प्रकार है: 1813 में 19 लाख पौंड, 1833 मं 3 करोड़ 20 लाख पौंड, 1844 में 8 करोड़ 80 लाख पौंड।101 प्राचीन काल से दुनियाँ को सूती कपड़ा पहनाने वाला देश इंग्लैंड की औद्योगिक क्रांति के साथ 19वीं सदी के पूर्वार्द्ध में कच्चे माल का निर्यातक बन गया। एक तरफ ये लूट, दूसरी तरफ अकाल से मरने वालों की संख्या बढ़ रही थी। 19वीं सदी के पूर्वार्द्ध में सात बार अकाल पड़े, जिनमें 14 लाख लोग मरे, उत्तरार्द्ध में 24 बार अकाल पड़े, जिनमें 3 करोड़ से अधिक लोग मरे। 1851 से 1875 के छः अकालों में 50 लाख और 1876 से 1900 के 18 अकालों में ढाई करोड़।102 स्पष्ट है कि लोकजागरण से जुड़े आधुनिकीकरण की सहज विकासशील प्रक्रिया को अंग्रेजी राज ने नष्ट कर दिया। ऐसे में औपनिवेशिक सत्ता से संघर्ष के साथ नवजागरण की नई चेतना पैदा हुई। भारत में आधुनिकता यह नयी शुरूआत थी।

यूरोपीय आधुनिकता का संघर्ष सीधे मध्ययुगीन मान्यताओं और मूल्यों से था और अमरीकी आधुनिकता का सीधे ब्रिटिश साम्राज्यवाद से। लेकिन भारतीय आधुनिकता को एक साथ अनेक स्तरों और दिशाओं में संघर्ष करना पड़ा। यह संघर्ष जहाँ एक ओर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के आर्थिक-राजनैतिक मोर्चे पर था, वहीं दूसरी ओर धार्मिक और सांस्कृतिक मोर्चे पर भी और इन सबके बीच शामिल था भारतीय कमजोर पूँजीपतिवर्ग, संकटग्रस्त सामंतवर्ग और उनके मूल्य, नई शिक्षा और पश्चिम के अनुकरण की कशमकश।

भारत ठग, संन्यासी, जुआरी, जादूगर, सपेरे आदि का देश है, यह बौद्धिक जाल अंग्रेजों ने भारतीय समाज के बारे में पूरी दुनियाँ में फैला दिया था। इस काल में उनकी मदद की तुलनात्मक समाजशास्त्र और नृ-विज्ञान ने, जिसका प्रादुर्भाव 19वीं सदी में ही हुआ था। दरअसल औपनिवेशिक युग के साथ-साथ अनेक आधुनिक शास्त्रों की भी शुरूआत होती है। डार्विन, फ्रायड, दुर्खिम, माक्र्स आदि इन शास्त्रों के प्रणेता थे। तुलनात्मक समाजशास्त्र इन में से एक है। यह समाज के भीतर स्थित वैज्ञानिक नियमों की खोज करता है, इसीलिए इसे ‘समाज का प्राकृतिक विज्ञान’ कहा गया। डार्विन के विकासवाद ने इस मध्ययुगीन विश्वास को तोड़ा कि ईश्वर ने मनुष्य को बनाया है। लेकिन समाज के प्राकृतिक विज्ञान से नस्लवाद चला और इस आधार पर सामाजिक अंतर को खोजने की कोशिश की गयी। इसीलिए विद्वानों ने रेखांकित किया कि ‘‘अंग्रेजी शिक्षा का भारत में मुख्य उद्देश्य अंधविश्वासों और रूढ़ियों को समाप्त करना नहीं था, वे हमें सभ्यता का वरदान देने नहीं, वरन् बड़े अप्रत्यक्ष ढंग से भारतीय मानस में यह अहसास जगाने आए थे कि दर्शन, विचारादर्श और सांस्कृतिक स्तर पर हमारे पास कुछ नहीं था या है।’’103 इस तरह वेे यूरोपीय समाज जो श्वेत होने के नाते नस्लीय दृष्टि से भी श्रेष्ठ मानी जाती थी- को सर्वश्रेष्ठ साबित कर अपने उपनिवेशवादी विस्तार को उचित ठहरा रहे थे। इसकी प्रतिक्रिया होनी स्वभाविक थी और इसी प्रतिक्रिया स्वरूप भारतीय अतीत व परम्परा का उत्खनन हुआ, और भारतीय संदर्भों में आधुनिकता की खोज और चेष्टा शुरू हुई।

एक चेष्टा, पाश्चात्य प्रभाव व अनुकरण को आधुनिक मानने से इंकार करती थी और उसका विरोध कर उसे राष्ट्रीय संदर्भ में प्रस्तुत करना चाहती थी। इसका प्रतिनिधित्व किया आर्य समाज ने, जिसकी कोशिश भारतीय संस्कृति के स्रोतों से भारत को आधुनिक बनाने की थी। इसके विपरीत कुछ लोग ऐसे भी थे जो पश्चिमी प्रारूप में भारतीय चेतना और संस्कृति को आरोपित करके विविधता में एकता स्थापित करना चाहते थे। इसके प्रतिनिधि थे राजा राममोहन राय और ब्रह्मसमाज। एक ओर ऐसी दृष्टि थी जो राष्ट्रीय संस्कारों और संस्थाओं का पुनर्गठन करके आधुनिक और समसामयिक समस्याओं का स्वजातीय समाधान चाहती थी। लेकिन दूसरी ओर एक दृष्टिकोण और था जो पाश्चात्य चिंतन और प्रतिमानों का कायल था।

अगर पश्चिम का अंधानुकरण सामाजिक परिवर्तन का विवेकपूर्ण रास्ता नहीं था तो भारतीय रूढ़िवाद भी पश्चिम का विकल्प नहीं था, क्योंकि एक ‘‘अधिक समर्थ शक्ति के आगे अतीत हमारी रक्षा नहीं कर सकता था।’’104 भविष्य कैसा हो इसका निर्णय ठोस सामाजिक शक्तियों के हाथ में था - अंग्रेजों, ज़मींदारों और कमजोर पूँजीपतियों के हाथ में या प्रशासन तंत्र के हाथ में, जिसे अंग्रेज अफसर और अंग्रेज परस्त नया भारतीय मध्यवर्ग मिलकर चलाते थे। ये वही मध्यवर्ग है जिसके बारे में बी. बी. मिश्र ने लिखा कि ‘‘ब्रिटिश राज के परवर्ती काल में जो मध्यवर्ग संवर्धित हुआ वह उद्योग के विकास की देन न होकर माध्यमिक तथा उच्चतर शिक्षा की वृद्धि की उपज था।’’105 और जो मध्यवर्ग भारत में यूरोपीय उद्योगों की उपज था वह भी अपने शहरी सम्पर्क के कारण अंग्रेजी रंग-ढंग में रंगा, साहब ग्रंथी का शिकार और मानसिक रूप से गुलाम था। इस उलझन भरी परिस्थितियों में आधुनिकता के भारतीय साँचे की खोज कम दुविधापूर्ण नहीं है।

यूरोप में जहाँ आधुनिकता धर्म और विज्ञान के प्रखरतम संघर्ष की परिणति थी, वहीं भारत में धर्म और विज्ञान का कोई वास्तविक द्वन्द्व नहीं उभरा। वैज्ञानिक चेतना का अधिकतर आयात ही हुआ और धर्म की भूमिका निर्णायक बनी रही। राष्ट्रीय जागरण की अभिव्यक्ति धार्मिक जागरण के प्रतिबिम्ब के रूप में हुई। प्रारंभिक अवस्थाओं में स्वयं धार्मिक चेतना राष्ट्रीय चेतना का प्रतिबिम्ब थी। सामाजिक तथा राजनीतिक धारणाऐं, जनतांत्रिक तथा देश-भक्तिपूर्ण आकांक्षायें, एक श्रेष्ठतर जीवन के लिए आशायें- ये सब धार्मिक रूपों में प्रकट हुई थी। इस प्रकार 19वीं शताब्दी के समाज सुधारकेां ने जिस भारतीय नवजागरण का सूत्रपात किया, उसका लक्ष्य धर्म से पूर्णतः सम्बन्ध विच्छेद कर लेना नहीं था। यह नवजागरण एक ओर पूराने धार्मिक रीति-रिवाजों और कर्मकाण्डों का विरोध करने और दूसरी ओर, नयी परिस्थितियों के अनुरूप धर्म की नयी व्याख्या करने पर आधारित था। इस प्रकार भारत में पूँजीवाद और आधुनिक सभ्यता के विकास के लिए संघर्ष अभिन्न रूप से धर्म के प्रति दृष्टिकोण से जुड़ा हुआ है।106

स्पष्ट है, भारतीय आधुनिकता पश्चिमी आधुनिकता का भारतीय संस्करण नहीं है। पश्चिमी की आधुनिकता उपनिवेशवाद में ढलती है (भले ही यह पूँजीवाद विकास का परिणाम ही क्यों न हो) तो भारतीय आधुनिकता उपनिवेशवाद से संघर्ष करते हुए रूप लेती है। ऐसे में उपनिवेशवादी मूल्य भारतीय आधुनिकता के मूल्य नहीं हो सकते। तय है, आधुनिकता की दो परम्परायें हैं - साम्राज्यवादी आधुनिकता और प्रतिरोधी आधुनिकता। जिस सीमा तक उसकी अंतर्वस्तु वर्चस्व और प्रतिरोध की परस्पर विरोधी शक्तियों से बनी है, उस हदतक उनमें भिन्नता है। जिस हद तक वे आधुनिक परिवेश और विश्वबोध से निर्मित हुई है, उस हदतक उनमें समानता है। पूरी आधुनिकता को ‘संदिग्ध’ और ‘समस्याग्रस्त’ बना देने वाला उत्तर-आधुनिक विमर्श इस द्वन्द्वात्मकता को नज़रअंदाज करता है। यहाँ यह दोहराना ज़रूरी है कि आधुनिक पूँजीवाद ने अंतर्राष्ट्रीय उपनिवेश कायम किये, सिकंदर के विश्व विजय के अधूरे सपने को पूरा किया, आधुनिकीकरण और पश्चिमीकरण को एक बनाया, लेकिन इससे औपनिवेशिक परियोजना और आधुनिक चेतना एक नहीं हो जाती।107 ज़ाहिर है कि औपनिवेशिक आधुनिकता के विकल्प के प्रयत्नों को ‘प्रति आधुनिकता’ न कहा जाए (रावर्ट सी. यंग ने पहले गाँधी की कार्य प्रणाली को, फिर एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमरीका में ‘औपनिवेशिक आधुनिकता’ के विरोध की रणनीति को ‘प्रति आधुनिकता’ (counter modernity) की संज्ञा दी है।108) तो आधुनिकता की एक अलग अवधारणा बनेगी- साम्राज्यवाद विरोधी आधुनिकता। दोनों आधुनिकताओं का फर्क साधन से ज़्यादा मूल्यों में निहित है।

औपनिवेशिक आधुनिकता ‘शक्ति’ का विमर्श है। शक्ति का आधार है सेना, पूँजी, प्रौद्योगिकी और उसका उद्देश्य है वर्चस्व और शोषण; तथा परिणाम है हिंसा और दासता। औपनिवेशिक आधुनिकता का विकल्प उलझन भरा हो सकता है, लेकिन यह प्रतिरोधी आधुनिकता श्रेष्ठता और अलगाव में यकीन करके नहीं चल सकती। उसके प्रतिरोध के मूल्य होंगे; वर्चस्व नहीं संघर्ष, शक्ति नहीं ज्ञान, हिंसा नहीं अहिंसा, उत्पीड़न नहीं सद्भाव, विषमता नहीं बंधुत्व और दासता नहीं स्वतंत्रता।109 स्वयं गाँधीजी ने अपने संघर्ष में जिस प्रतिरोधी आधुनिकता का विकास किया, उसमें सामाजिक आवश्यकता और व्यक्तिगत नैतिकता का अटूट संतुलन था। जनता की चेतना को समझकर उन्होंने सिद्धान्त और आंदोलन की रणनीति में सामंजस्य स्थापित किया। उनके तीन बड़े आंदोलनों के संदर्भ में (सत्याग्रह, असहयोग और भारत छोड़ो) हुमायूँ कबीर ने विचारणीय बात कही है कि गाँधीजी ने जनता को एक-एक कदम शिक्षित करते हुए क्रमशः आगे बढ़ाया - पहले जेल का भय दूर किया, फिर सम्पत्ति खोने का भय दूर किया और अंत में प्राण का भय दूर किया - ‘करो या मरो’।110 एक ओर दुनियाँ का सबसे उन्नत पूँजीवाद, दूसरी ओर गुलामी के अंधेरे में भटकती जनता, गाँधीजी के राजनीतिक दर्शन में भारत की विशेष परिस्थितियों और आवश्यकताओं के फलस्वरूप परम्परा और आधुनिकता के अनेक पहलू इस तरह गुँथे हुए हैं कि उन्हें अलगाया नहीं जा सकता। धर्म की आस्था और विज्ञान का विवेक, प्राचीनता का पुनर्जागरण और इतिहास का सीख, जनता से तादात्म्य और ट्रस्टीशिप का आश्वासन, सत्याग्रह की शक्ति और अहिंसावाद का हठ, पंचायती राज का जनतंत्र और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की माँग।111 इसीलिए कहा जाता है कि ‘‘भारत में नयी शक्तियाँ सदा अतीत से उग्र विच्छेद के बिना ही आत्मसात् होती रही है। निरंतरता की भावना इतनी गहरी अन्यत्र कहीं नहीं बनी रह सकी हैं जितनी भारत में।’’112 इन्हीं दुविधाओं के बीच भारतीय आधुनिकता और आधुनिकीकरण की प्रक्रिया का विकास होता है।


97. ‘संधान’, अंक-3, अक्टू.-दिसं.-2001, सम्पा. सुभाष गाताडे, पृ॰ 20.
98. धनन्जय वर्मा, आधुनिकता के बारे में तीन अध्याय, पृ॰ 187.
99. ‘तद्भव’, अंक-11, वर्ष-2004, सम्पा. अखिलेश, पृ॰ 32.
100. ‘समकालीन सृजन’, सम्पा. शंभुनाथ, अंक-21, वर्ष-2002, पृ॰ 80.
101. रजनीपाम दत्ता, आज का भारत, पृ॰ 147.
102. वी. ब्रोदोव, इंडियन फिलासफी इन माडर्न टाइम, पेज 160.
103. धनन्जय वर्मा, आधुनिकता के बारे में तीन अध्याय, पृ॰ 207.
104. ‘तद्भव’, अंक-11, वर्ष-2004, सम्पा. अखिलेश, पृ॰ 33.
105. धनन्जय वर्मा, आधुनिकता के बारे में तीन अध्याय, पृ॰ 193 से उद्धृत.
106. के. दामोदरन, भारतीय चिंतन परम्परा, पृ॰ 361.
107. ‘तद्भव’, अंक-11, वर्ष-2004, सम्पा. अखिलेश, पृ॰ 36.
108. राबर्ट ई. जे. यूंग, पोस्ट कानियलिज़्म: एन हिस्टोरिकल इंट्रोडक्शन, पेज 383.
109. ‘तद्भव’, अंक-11, वर्ष-2004, सम्पा. अखिलेश, पृ॰ 35.
110. हुमायूँ कबीर, विज्ञान, जनतंत्र और इस्लाम, पृ॰ 132-133.
111. ‘तद्भव’, अंक-11, वर्ष-2004, सम्पा. अखिलेश, पृ॰ 35.
112. विश्वनाथ नरवणे, आधुनिक भारतीय चिंतन, पृ॰ 9.


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