Saturday, May 23, 2009

आधुनिकता का परिप्रेक्ष्य

आधुनिकता को जिस प्रक्रिया से जोड़कर देखा जाता है उसमें पुनर्जागरणकालीन चेतना का निषेध संभव नहीं है। पुनर्जागरण के फलस्वरूप ही कई शताब्दियों का लम्बा अंधकार-काल समाप्त हुआ और हम देखते हैं कि कुछ ही वर्षों के अंदर इटली, फ्रांस और इंग्लैंड के नेतृत्व में एक ऐसी नयी संस्कृति, नये साहित्य और कला का निर्माण हुआ जो मात्रा और गुण दोनों ही में मध्यकालीन वातावरण से बिल्कुल भिन्न हैं। इस नये प्रकाश का वाहक था उठता हुआ मध्यवर्ग जिसने सामंतयुग का विनाश किया, राष्ट्रीयता को जन्म दिया और पूँजीवाद की स्थापना की। इस नये मध्यवर्ग ने विश्व-दर्शन, सांस्कृतिक मूल्यों और साहित्य तथा कला क्षेत्र में ऐसी उथल-पुथल मचायी कि पुरानी परम्पराओं और मान्यताओं का सारा महल ढह गया।87
आधुनिकता को इंग्लैंड और फ्रांस की क्रांतियों की देन से भी जोड़ा जाता है, व्यापारिक पूँजीवाद यहाँ भी सक्रिय है। डा. रामविलास शर्मा ने लिखा-‘‘17वीं सदी के इंग्लैंड में, 18वीं सदी के फ्रांस में जो क्रांतियाँ हुई, वे व्यापारिक पूँजीवाद की परिस्थितियों से हुई।’’88 इतना ही नहीं आर्नल्ड टायनबी (Arnold Toynbee) ने 1760 से 1840 के इंग्लैंड के आर्थिक प्रगति के जिस दौर को औद्योगिक क्रांति के रूप में व्याख्यायित किया,89 उसी दौर में इमैनुअल कांट (Immanuel Kant) जर्मनी में ‘प्रबोधन क्या है?’ (1784) पर बहस छेड़ चुके थे और इसी दौरान फ्रांसीसी राज्य-क्रांति (1787-1799) होती है।90 जिसने स्वाधीनता, समानता और बंधुत्व का नारा दिया। जिसके बारे में डा. रामविलास शर्मा का कहना है, ‘‘फ्रांस की राज्य-क्रांति रूढ़ियों और अंधविश्वासों के बीच विवेक की मशाल की तरह थी।’’91
यूरोप के शरीर में ये सारे परिवर्तन अचानक घटित नहीं हुए, इसकी पृष्ठभूमि में व्यापारिक पूँजीवाद की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। यहाँ इस बात का उल्लेख भी ज़रूरी है कि ‘‘17वीं सदी के इंग्लैंड में, 18वीं सदी अमरीका और फ्रांस में जो क्रांतियाँ हुई, उनमें नेतृत्त्व पूँजीपतियों का था।’’92 अतः आधुनिकता जिसका निर्धारण पुनर्जागरण, प्रबोधन, इंग्लैंड, अमरीका और फ्रांस की क्रांतियों के सम्मिलित परिणाम से किया जाता है, उसका संबंध पूँजीवाद से अटूट है।
सवाल यह है कि आधुनिकता का आगमन सबसे पहले यूरोप में ही क्यों हुआ? पूँजीवाद के उद्भव के बारे में भी ऐसे ही प्रश्न हैं, जिनके उत्तर ढूँढने के प्रयास होते रहे हैं। ‘प्रोटेस्टेंट एथिक’ में पूँजीवाद के जन्म का कारण देखने वाली मैक्स बेबर की व्याख्या विश्व प्रसिद्ध है, उतनी ही प्रसिद्ध है कार्ल मार्क्स ही व्याख्या भी। लेकिन बहस थमी नहीं है। आश्चर्य यह है कि आधुनिकता मध्यकालीन यूरोप में जन्मी। अनेक सभ्यताएँ उसी काल में यूरोप की तुलना में अधिक उन्नत थी। मिंग चीन, तोकुगावा जापान और मुगल हिन्दुस्तान के बारे में तो यह बात निश्चित सही थी। आधुनिकता का यूरोप में जन्म संभवतः इतिहास की ऐसी पहेलियों में से है जिनके बारे में छानबीन और अंदाज़ लगाने का काम तो हमेशा चलता रहेगा, लेकिन पूरा समाधान शायद ही मिल पाये।
विदित है कि रिनेसांस-रिफार्मेशन-एनलाइटेन्मेंट-इंडस्ट्रियलाइजेशन की कड़ी में चैदहवीं से उन्नीसवीं शताब्दी तक के पाँच सौ वर्षों के दौरान आधुनिकता का यूरोप में सूत्रपात हुआ। ये सारे परिवर्तन यूरोप के सामाजिक-सांस्कृतिक शरीर मंड फलीभूत हुए। अतः यह प्रतीत होना स्वभाविक है कि आधुनिकता अपने मौलिक रूप में यूरोपीय या पाश्चात्य है। लेकिन यह प्रतीति केवल परिघटना या वर्णन के स्तर पर है। यूरोपीय बनावट के अंदर आधुनिकता के वे मूल तत्व देखे जा सकते हैं जो अन्य सामाजिक-सांस्कृतिक बनावटों में भी कार्यरत हैं, और जिन्होंने आधुनिकता के गैर-पश्चिमी संस्करणों की रचना में भी केन्द्रीय भूमिका निभाई है।93 इन मूल तत्वों को कई प्रकार से गिना जा सकता है।

1. विज्ञान:-
पाश्चात्य दृष्टि से देखने पर इटैलियन रिनेसांस में आधुनिकता के बीज पहली बार दिखायी पड़ते हैं। मगर जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, रिनेसांस अर्थात् पुनर्जागरण मध्ययुगीन यूरोप के अंधेरे में प्राचीन ग्रीक दर्शन और ज्ञान के दीप जलाकर कुछ रौशनी करने का प्रयास था, ताकि आगे की राह तलाशी जा सके। यह आगे की राह आधुनिक विज्ञान के उद्भव से शुरू होती है। कोपरनिकस, केपलर, गैलीलियो और न्यूटन इस नयी शुरूआत के महानायक हैं। विज्ञान को प्रायः तकनीकी विकास और उत्पादकता के वृद्धि के रूप में पहचाना जाता है। यह आंशिक समझ है जिससे मूल तत्व छूट जाता है। आधुनिकता की संरचना में विज्ञान कम से कम चार कारणों से अत्यंत महत्त्व का घटक बनता है:-
पहला है विज्ञान का दार्शनिक महत्व। विज्ञान यथार्थ की प्रकृति और वस्तुगत ज्ञान की संभावना पर जैसी रौशनी डालता है वह पहले संभव नहीं थी। न केवल यह प्रकृति का ज्ञान संभव बनाता है, बल्कि ज्ञान-मीमांसा (epistomology) में क्रांतिकारी परिवर्तन लाता है और समूचे मानव ज्ञान के लिए एक प्रतिमान प्रस्तुत करता है।
दूसरा है आधुनिकता की संरचना में विज्ञान से निर्मित प्रणालीशास्त्र (methodology) का महत्व। विज्ञान ज्ञान प्राप्त करने की एक निश्चित प्रणाली निर्धारित करता है, जिसमें प्रेक्षण (observation), प्रयोग (experimentation), सिद्धांत-निर्माण (theory building), निगमन (deduction), पूर्वानुमान (predication) और जाँच (text) का व्यवस्थित इस्तेमाल किया जाता है। वैज्ञानिक प्रणाली वस्तुगत ज्ञान का निश्चित साधन बनती है और यथार्थ की प्रकृति के निर्धारण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। प्राकृतिक विज्ञान से पैदा हुई यह प्रणाली कुछ संशोधनों और नये तत्वों के साथ सामाजिक विज्ञान की प्रणाली का भी आधार बनती है।
तीसरा महत्त्व इस बात में है कि विज्ञान, मानव समाज की प्रकृति के साथ अंतर्क्रिया से पैदा होता है। बाकी सभी सामाजिक क्रियायें-प्रक्रियायें मानव समाज की अंदरूनी क्रियायें-प्रक्रियायें हैं। इनमें समाज ही कर्ता (subject) और समाज ही वस्तु (object) है। प्राकृतिक विज्ञान में प्रकृति वस्तु है। मानव समाज इस वस्तु पर कार्य करता है, जिससे वस्तुगत ज्ञान का सुनिश्चित माॅडल बनता है और प्रकृति पर नियंत्रण और उसके योजनाबद्ध इस्तेमाल की परिस्थिति पैदा होती है।
चौथा महत्त्व तीसरे से जुड़ा है। यह है विज्ञान से तकनीक का विकास तथा प्रकृति पर नियंत्रण और उसके इस्तेमाल की क्षमता से वृद्धि। यह पहलू विज्ञान के बारे में आम जानकारी का प्रमुख हिस्सा है। औद्योगिक क्रांति को संभव बनाने में इसकी केन्द्रीय भूमिका थी।

2. तर्कबुद्धि:-
यह आधुनिकता के दर्शन, ज्ञानशास्त्र और आचार व्यवहार का केन्द्रीय तत्व है। तर्कबुद्धि (reason) प्रबोधन काल का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण दिशा-निर्देशक सिद्धांत था, जो मूलतः कर्त्ता-केन्द्रित था। ‘तर्कबुद्धि मनुष्य को मिला एक ऐसा महत्त्वपूर्ण उपकरण था जिसने उसे अपने पूर्वाग्रहों से मुक्त होने में, विश्व को बदलने में और विज्ञान के माध्यम से प्रकृति पर विजय प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त किया।’94 यूँ तो बुद्धिवादी दर्शन की व्यवस्थित शुरूआत देकार्त (1596-1650) के साथ हो चुकी थी। ‘मैं सोचता हूँ इसलिए मैं हूँ।’ वाले देकार्त का दर्शन शुद्ध आदर्शवादी था, जिसमें ज्ञान का एकमात्र संशयरहित आधार व्यक्ति की अंतर्दृष्टि और उसके शुद्ध विचार थे जिसमें अनुभव और संस्कृति की कोई मिलावट न की गई हो। दूसरी धारा ब्रिटिश अनुभववादियों की थी जिनमें जाॅन लाॅक (1632-1704) का महत्त्वपूर्ण स्थान है। यह धारा प्राकृतिक विज्ञान से और विशेषतः उसके वस्तुनिष्ठ स्वरूप और प्रायोगिक प्रणाली से प्रभावित थी। फ्रांस के दार्शनिक जैसे वाल्तेयर, मान्तेस्क्यू, दिदेरो, रूसो इत्यादि में बुद्धिवादी और अनुभववादी दोनों धाराओं का मेल हुआ और तर्कबुद्धि की अधिक संतुलित तस्वीर उभरी जिसमें अनुभव से स्वतंत्र अंतर्जात (innate) विचारों की जगह अनुभव से सम्पन्न और प्रयोगों से सत्यापित विचार-बुद्धि का केन्द्रीय स्थान था। प्रबोधन काल की तर्कबुद्धि, विज्ञानबुद्धि से संचालित होने लगी। इसका अधिक दार्शनिक रूप इमैनुअल कांट (1748-1804) के विचारों और सिद्धांतों में प्रकट हुआ।
प्रबोधन जिसे अंग्रेजी में Enlightenment के नाम से जाना जाता है, अपनी दार्शनिक शब्दावली में दृश्य-बिम्बों का इस्तेमाल करता है। इस बिम्ब-विधान में तर्कबुद्धि प्रकाश (light) की तरह है जो वस्तुगत पर पड़ती है तो उसे आलोकित करती है, और तब हम उसे देख समझ पाते हैं। फ़र्क सिर्फ इतना ही है कि इस प्रकाश का स्तोत्र स्वयं मानव है। अनुभव और ज्ञान के विकास के साथ इस प्रकाश स्रोत की शक्ति बढ़ती जाती है और वह वस्तुगत के बड़े से बड़े क्षेत्र को और अंदर से अंदर की तहों को आलोकित करने में उत्तरोत्तर सक्षम होती जाती है। लेकिन स्रोत रहता वही है-मनुष्य की प्रज्ञा-शक्ति। बाद के समय में इसके अनेक सीमाओं की चर्चा हुई है।

3. प्रगति की अवधारणा:-
विज्ञान और तर्कबुद्धि से लैस आधुनिकता मानव जाति के उज्ज्वल भविष्य के प्रति आशा और उत्साह से भरी हुई थी। प्रकृति पर नियंत्रण और उसके इस्तेमाल के ज़रिए जीवन-स्तर निरंतर ऊपर उठाया जा सकता है, और तर्कबुद्धि के ज़रिए सामाजिक जीवन रूप में लगातार विकास होता रह सकता है। आधुनिकता की परियोजना ऐसे विश्वास पर आधारित है और इस लक्ष्य की ओर अग्रसर है। प्रगति की अवधारणा की भी आलोचनायें हुई है। उत्तर-आधुनिक दृष्टिकोण के मुताबिक यह एक ‘महा-आख्यान’ है जो पूर्वाग्रह और प्रभुत्ववाद पर आधारित है। पर्यावरण चिंतकों ने प्रकृति के अतिदोहन और विकास की प्राकृतिक सीमाओं (sustainibility) के प्रश्न उठाये हैं। मार्क्सवादी आलोचना पूँजीवादी आधुनिकता की आलोचना है, जिसमें प्रगति की अवधारणा को पूँजी के हित से बाँध देने का विरोध है। नारीवादी आलोचना प्रगति के अबतक के स्वरूप के पितृसत्तात्मक मूल्यों-संरचनाओं से बँधे होने और पुरूष-केन्द्रित होने पर प्रश्न खड़े करती है। कुल मिलाकर देखा जाए तो प्रबोधनकालीन आशावाद और औद्योगिक क्रांति की निर्बाध विजययात्रा पर प्रश्न अवश्य खड़े हुए हैं। आधुनिकता का शुरूआती स्वरूप इन प्रश्नों के दबाव में बदलता रहा है। इससे प्रगति की, और सामान्य तौर पर आधुनिकता की अवधारणा यांत्रिकता, पक्षपात, अन्याय, अदूरदर्शिता आदि की कमज़ोरियों से लड़ते हुए आगे ही बढ़ रही है।

4. मानवीय कर्तृत्व का महत्त्व:-
सभी पूर्व-आधुनिक व्यवस्थायें और विचारधारायें मानव समाज के बाहर की किसी नियामक सत्ता के दर्शन पर आधारित थी। ऐसी सामाजिक व्यवस्थायें शाश्वत् नियमों और श्रेणीगत विभाजनों की व्यवस्थायें थी। यहाँ मानवीय कर्तृत्व (Human Agency) के लिए कोई जगह नहीं बचती थी। मनुष्य के कर्ता होने और प्रकृति तथा समाज की नियमबद्धता के बावजूद उनमें हस्तक्षेप संभव होने के व्यवस्थित दर्शन की शुरूआत आधुनिकता के साथ होती है। इससे इतिहास बनाने की संभाविता भी निकलती है और मानव की स्वाधीनता और मुक्ति का दर्शन तथा इसके लिए मनुष्य की ज़िम्मेदारी का सिद्धांत भी सामने आता है। मानवीय कर्तव्य के स्वरूप और उसकी सीमाओं पर बहस ज़रूरी है। यूरोपीय और पूँजीवादी आधुनिकता में व्यक्तिवाद पर अधिक ज़ोर रहा है। व्यक्ति की कर्तव्य शक्ति और उसकी स्वाधीनता का लक्ष्य सर्वोपरि माना गया है। माक्र्सवादी धारा कर्तव्य का दूसरा स्वरूप प्रस्तावित करती है। उत्पादक वर्गों के द्वारा इतिहास बनाने को और उनकी मुक्ति के रास्ते मानवजाति की मुक्ति तक पहुँचाने को यहाँ प्रमुखता दी जाती है।

5. आत्मप्रश्नेयता:-
आधुनिकता की संरचना में और विशेषकर प्रबोधन की परियोजना में आत्मप्रश्नेयता का गुण गहरे रचा बसा है। विज्ञान और तर्कबुद्धि दोनों की प्रकृति अपने आप को हमेशा कटघरों में खड़े रखने की है। विज्ञान अपने आप को गलत सिद्ध करने के प्रयास में आगे बढ़ता है, और अधिक व्यापक और अधिक गहरे सिद्धांतों तक पहुँचता है। तर्कबुद्धि भी अपने आप से सवाल पूछती रहती है, और इस प्रक्रिया में अपना परिष्कार करती जाती है। विज्ञान और तर्कबुद्धि आधुनिकता के मूल संघटक हैं, और इनके चलते सारी सीमाओं और व्यवधानों के बावजूद, आधुनिकता में आत्मप्रश्नेयता का गुण समाहित है।

6. धर्मनिरपेक्षता:-
धर्मनिरपेक्षता को आधुनिकता की बुनियादी शर्त माना जाता है।95 धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है, राज्य और धर्म का सम्पूर्ण विच्छेद। ‘सर्व धर्म समभाव’ इत्यादि के रूप में धर्मनिरपेक्षता की जैसी व्याख्या भारतीय राजनीति और बुद्धिजीवी हलकों में की जाती है, वे गलत व्याख्यायें हैं। धर्मनिरपेक्षता की धारणा आधुनिकता के यूरोपीय संस्करण की विशिष्टता नहीं है। राज्य और चर्च के बीच का लम्बा संघर्ष यूरोपीय इतिहास की विशिष्टता के कारण नहीं चला था। उसकी जड़ें आधुनिकता की प्रकृति में थी। ऐसा नहीं है कि आधुनिकता व्यक्ति की आस्था का अधिकार नहीं देती। व्यक्ति का आस्थावान होना उसकी बनावट पर निर्भर है। लेकिन राज्य के स्वरूप में धर्म का कोई स्थान नहीं होना चाहिए।

7. निजी और सार्वजनिक का भेद:-
सार्वजनिक परिक्षेत्र (Public Sphere) का जीवन के निजी आयामों से पृथक्करण आधुनिक युग की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है। ऐसा नहीं है कि पूर्व-आधुनिक समाजों में ऐसा कोई विभाजन नहीं होता, लेकिन आधुनिक समाज व्यवस्थायें इस विभाजन को विधिक और औपचारिक रूप देती है। निजी और सार्वजनिक का भेद व्यक्ति की निजता का और उसपर आधारित अधिकारों का राजनैतिक विधान रचने के लिए आवश्यक होता है। सार्वजनिक का स्वरूप इस तरह निर्धारित होता है कि निजी परिक्षेत्र की रक्षा हो सके। आधुनिकता के पाश्चात्य और पूँजीवादी संस्करण के ही प्रधान उदाहरण के रूप में दिखाई देने के चलते इस विभाजन का बुर्जुआ चरित्र अधिक उभरकर सामने आया है। इसमें व्यक्तिवाद और व्यक्तिगत सम्पत्ति की पवित्रता पर अधिक ज़ोर है।

8. न्याय, स्वाधीनता और मुक्ति:-
ये आधुनिकता के मूल्य-विधान के मुख्य लक्ष्य हैं। निश्चय ही आधुनिकता की अबतक की ऐतिहासिक यात्रा इन लक्ष्यों तक सीधे पहुँचने की यात्रा नहीं रही। लेकिन आधुनिकता के न्याय, स्वाधीनता और मुक्ति के दावे पूर्व-आधुनिक समाज के संदर्भ में प्रभावी थे और इनके चलते यूरोप में राजनैतिक और सांस्कृतिक उर्जा का विस्फोट हुआ था।
आधुनिकता की लाक्षणिक विशेषताओं की इस सूची में जो अनुपस्थिति सबसे स्पष्ट दिखायी पड़ती है वह राष्ट्र-राज्य की अवधारणा है। संभवतः इसे इस सूची में शामिल किया जाना चाहिए था। न शामिल करने के पक्ष में तर्क ये थे कि राष्ट्र-राज्य की उत्पत्ति के लिए पूँजीवादी विकास क्रम आधुनिकता ही हिस्सा था। लेकिन आधुनिकता की मूल संरचना में राष्ट्र-राज्यों की अनिवार्यता संदिग्ध है। इसे इस तरह समझा जा सकता है कि राष्ट्र-राज्य के इतिहास से आगे, जब पूँजीवादी भूमंडलीकरण, सर्वहारा अंतर्राष्ट्रीयकरण या भविष्य की किसी ऐसी प्रक्रिया के चलते राष्ट्र-राज्य की महत्ता क्षीण हो जाए या उसका विलोप हो जाए, तब भी आधुनिकता की यात्रा जारी रहेगी, आधुनिकता जो ऊपर गिनाये आठ तत्वों से निर्मित और संचरित है।96



87. विजयदेवनारायण साही, छठवाँ दशक, पृ॰ 9.
88. रामविलास शर्मा, आस्था और सौंदर्य, पृ॰ 249.
89. इंसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका, वोल्यूम-12, पेज 210.
90. इंसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका, वोल्यूम-9, पेज 909.
91. रामविलास शर्मा, आस्था और सौंदर्य, पृ॰ 253.
92. वही, पृ॰ 247.
93. ‘संधान’, अंक-3, अक्टू.-दिसं.-2001, सम्पा. सुभाष गाताडे, पृ॰ 15.
94. इंटरनेशनल इंसाईक्लोपिडिया आॅफ द सोशल एण्ड बीहेवियरल साइन्स, वोल्यूम-7, पेज 4535.
95. इंसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका, वोल्यूम-24, पेज 90-91.
96. ‘संधान’, अंक-3, अक्टू.-दिसं.-2001, सम्पा. सुभाष गाताडे, पृ॰ 15-20.



क्रमश: ...........................

आगे देखिए भारतीय आधुनिकता

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