Wednesday, June 3, 2009

भारतीय आधुनिकता के दो दौर

भारतीय आधुनिकता के भी दो दौर हैं - एक औपनिवेशिक दौर, दूसरा उत्तर-औपनिवेशिक दौर। स्वतंत्रता से पहले आधुनिकता और आधुनिकीकरण का मतलब यदि पश्चिमी और पश्चिमीकरण रहा है तो उसके बाद वह अमरीका और अमरीकीकरण भी हो गया है। औपनिवेशिक भारत में पहले दौर की आधुनिकता समाज की निर्धनता, सांस्कृतिक जागरण और मध्यवर्ग के पश्चिमीकरण से परिभाषित होती है। पूँजीवादी भारत में नये दौर की आधुनिकता, सामाजिक विषमता और विदेशी कर्ज़ से परिभाषित होती है। स्वभावतः आधुनिकता, चाहे समाज में देखें या अवधारणा में, एक अंतर्विरोधपूर्ण घटना है। इस अंतर्विरोध की पृष्ठिभूमि में ठेलते हुए उत्तर-आधुनिक विचारक उसे समस्याग्रस्त घटना बताते हैं। दोनों में फर्क यह है कि अंतर्विरोध विकास का स्रोत है और समस्याग्रस्ता विकास की सम्भावना से शून्य है।113

उत्तर-औपनिवेशिक आधुनिकता का सफर आधुनिकता, आधुनिकतावाद से उत्तर-आधुनिकता की स्थापना आधुनिकता के अंत तक होती है। भारत के स्वाधीन राज्य का उदय साम्राज्यवाद की ‘आधुनिकता’ परियोजना और साम्प्रदायिक रणनीति के दबाव में हुआ। ‘पूरबवादी’ धारणाओं को अपनी योजना के माध्यम से सुदृढ़ करने की कार्यनीति का परिणाम है, भारत का विभाजन। स्वाधीन भारत की बहुत-सी उलझनें इसी विरासत पर आधारित है। सुनील खिलनानी के अनुसार ‘‘भारत छोड़कर जा रहे अंग्रेजों को वैसे तो यकीन था कि उपमहाद्वीप अपने धार्मिक जज़्बात में पिछड़ा हुआ और अंध-विश्वासी है लेकिन इसके बावजूद उन्होंने धर्म को ही सिद्धांत बनाकर उसके आधार पर दो आधुनिक राष्ट्र बना डाले।’’114 भारतीय उपमहाद्वीप को धार्मिक जज़्बात में ‘पिछड़ा हुआ अंधविश्वासी’ मानना पूरबवादी धारणा का उदाहरण है, धर्म के आधार पर दो ‘आधुनिक राष्टों’ का निर्माण पूरबवाद को कार्यरूप देने का उदाहरण है।

दूसरी तरफ स्वतंत्र भारतीय राज्य ने पूँजीवाद और समाजवाद की ‘मिश्रित अर्थव्यवस्था’ को अपनाया। उसी तरह साम्प्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता के बारे में भी मिश्रित रूख़ अपनाया। इसका उदाहरण है ‘सर्वधर्मसमभाव’ के रूप में धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा। धीरे-धीरे राज्य के समाजवादी उद्देश्यों को तिलांजलि दे दी गयी। परिणाम यह हुआ कि पूँजीवाद और सम्प्रदायवाद दोनों को एकसाथ बढ़ावा मिला। जैसे-जैसे पूँजीवादी विकास के संकट गहरे हुए और जन असंतोष तेज हुआ, भारतीय राज्य का जनतंत्र विरोधी चरित्र भी उभरा और धर्मप्राण आस्था भी उभरी। एक तरफ आर्थिक विषमता, शोषण और जीवन स्तर में भारी असंतुलन, दूसरी तरफ हिन्दू और मुस्लिम दोनों प्रकार के कट्टरपंथियों का साम्प्रदायिक उभार; दोनों ने आधुनिकता की चूलें हिला दी। समाज की अग्रगामी चिंताओं और शक्तियों को गहरा आघात लगा, बदले में धार्मिक राजनीति और बाज़ारवाद का नया गठबंधन सामने आया। ऐसे में आधुनिकता के विश्लेषकों ने ज्ञानोदय के प्रोजेक्ट को संकटग्रस्त पाया। ल्योतार ने ज्ञानोदय से सभी ‘तार्किक और समग्रतावादी’ महावृत्तांतों को संदेहास्पद करार दिया।115 ज्ञानोदय को एक ऐसे आदर्शवादी महाख्यान के रूप में देखा गया, जहाँ तक पहुँचना अब इस भूमंडलीकृत विश्वबाज़ार व्यवस्था वाले दौर में असंभव था। प्रबोधन या ज्ञानोदय की यह आलोचना मूलतः आधुनिकता और पूँजीवाद को पर्यायवाची मानने का परिणाम है, जिसमें सामाजिक अंतर्विरोध ओझल हो गए और पूँजीपति वर्ग की दग़ाबाजियों के लिए उनके ‘आदर्श’ ज़िम्मेदार बन गए। ‘भारत में आधुनिकता की परियोजना कई पश्चिमी चिंतकों की धारणा की तरह सभ्यताओं के संघर्ष से नहीं जुड़ी है, बल्कि उसका लक्ष्य दुनियाँ की तमाम सभ्यताओं के उच्चसार से अपनी सभ्यता को और अधिक समृद्ध करना रहा है।’116

दरअसल आधुनिकता की ये समस्याऐं पूँजीवादी विकास की अंतर्विरोधपूर्ण प्रक्रिया से जन्म लेती है। आधुनिकता का आगमन जैसा कि कहा जा चुका है बाज़ार, जनतांत्रिक मूल्यों और वैज्ञानिक चेतना की संश्लिष्ट भूमिका से सम्बद्ध है। लेकिन आधुनिकता पूँजीवादी व्यवस्था लेकर आयी, इसलिए बाज़ार की सत्ता क्रमशः स्वतंत्र कारीगर को, जनतंत्र और विज्ञान को अपने मातहत करती गई। आधुनिकता अगर तर्कवाद, मानववाद और आर्थिक प्राविधिक विकास के मूल्यों से परिभाषित होती है तो श्रमिकों की दासता, प्रकृति के दोहन और पूँजी के अंतर्राष्ट्रीयकरण से भी परिभाषित होती है। वह अगर स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व से परिभाषित होती है तो विषमता, परतंत्रता और उत्पीड़न से भी परिभाषित होती है। उसने ज्ञान, अनुशासन, मानवाधिकार ही नहीं दिये, साम्राज्यवादी उपनिवेश भी दिए। ऐसे में यह कहना कि ‘आधुनिकता या तो पूँजीवादी परियोजना थी या फिर सत्ताधारी वर्ग ने उसे हड़प लिया।’117 ठीक नहीं है। यहाँ यह देखना भी ज़रूरी है कि एकरूपता, वर्चस्व, शक्ति जैसे सभी पद आधुनिकता से ज़्यादा साम्राज्यवाद और उसके नये रूप में द्योतक हैं। हमारा युग और समाज केवल इन्हीं विशेषताओं से नहीं बल्कि विविधता, भिन्नता, प्रतिरोध से भी अभिव्यक्त होता है। यूरोप की आधुनिकता भी केवल पूँजीवादी राज्य-सत्ताओं और साम्राज्यवादी शक्तियों के अभ्युदय से ही नहीं जुड़ी है, वह श्रमिक संघर्षों और क्रांतिकारी आंदोलनों से भी जुड़ी है। सबसे बढ़कर आधुनिकता के पुरस्कर्ता स्वयं पूँजीपति वर्ग के सदस्य नहीं थे, आधुनिक पूँजीवादी शासन के संस्थापक स्वयं पूँजीवादी सीमाओं से मुक्त थे।118 वे श्रम विभाजन की दासता से बंधे ‘विशेषज्ञ’ नहीं थे, वे योद्धा, कलाकार, वैज्ञानिक साथ-साथ थे।

विडम्बना यह है कि आधुनिकता का ध्वजवाहक पूँजीपति वर्ग ‘वृद्ध’ होकर उसी आधुनिकता के विरूद्ध खड़ा हो गया। वास्तविकता यह है कि पूँजीवाद ने अब नवसाम्राज्यवाद का रूप ले लिया है। परिणाम यह हुआ कि आधुनिक पश्चिम से एकीकरण की ‘उदारवादी’ प्रक्रिया और अतीतजीवी धार्मिक पुनरूत्थान की संकीर्णतावादी प्रवृत्तियाँ, दोनों परस्पर विरोधी घटनायें भारत में साथ-साथ विकसित हो रही है। ऐसे में समसामयिक आधुनिकता की पहचान नवसाम्राज्यवादी विचारधारा से संघर्ष करते हुए प्रतिरोधी आधुनिकता की निरंतरता के रूप में की जा सकती है। देश-काल की ठोस ज़रूरतों के अनुसार इसके प्रतिमान बदल सकते हैं।



113. ‘तद्भव’, अंक-11, वर्ष-2004, सम्पा. अखिलेश, पृ॰ 45.
114. सुनील खिलनानी, भारतनामा, पृ॰ 212.
115. पोस्ट-माडर्न कंडिशन्स: ए रिपोर्ट आन नालेज़, पेज xxiv-
116. शंभुनाथ, दुस्समय में साहित्य: परम्परा का पुनर्मूल्यांकन, पृ॰ 12.
117. सुधीश पचौरी, आलोचना से आगे, पृ॰ 13-23.
118. मार्क्स/ऐंगेल्स, साहित्य तथा कला, पृ॰ 290.


1 comments

रंजना June 3, 2009 at 6:49 PM

इस महत विचारोत्तेजक आलेख हेतु आभार...