Saturday, June 6, 2009

*** हिन्दी-भाषी चिंतक और आधुनिकता

हिन्दी-भाषी चिंतकों में भी आधुनिकता पर सैद्धांतिक बहस काफी मुखर रही है। धनन्जय वर्मा का कहना है-‘‘हिन्दी चिंतन में आधुनिकता संबंधी अधिकांश विचार व्यक्तिनिष्ठ रहे हैं। उसकी व्याख्याएँ व धारणायें अतिवादी छोरों के बीच संतरित होती रही है।’’119 धनन्जय वर्मा का कहना कितना ठीक है इसकी परख कुछ हिन्दी चिंतकों के आधुनिकता संबंधी विचारों को देखकर ही मिलेगा।

हिन्दी में आधुनिकता शब्द का संभवतः पहले पहल प्रयोग आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने किया। उन्होंने हिन्दी साहित्य के आधुनिक काल का आरंभ सन् 1833 ई. से माना है। लेकिन शुक्लजी ने आधुनिकता का सैद्धांतिक विवेचन नहीं किया। यहाँ यह कह देना भी ज़रूरी है कि हिन्दी साहित्य के आधुनिक काल का आरंभ 19वीं शताब्दी से (1850 के इर्द-गिर्द) लगभग सभी विद्वानों ने माना है। केवल डा. रामविलास शर्मा इसे पीछे भक्तिकाल में ले जाते हैं।

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी आधुनिकता को ‘कालवाचक’ नहीं ‘मनोभाववाचक’ शब्द कहते हैं। उनके अनुसार-‘‘आधुनिकता के तीन लक्षण बहुत स्पष्ट हैं। ऐतिहासिक दृष्टि इसी दुनियाँ में मनुष्य को सब प्रकार की भीतियों और पराधीनता से मुक्त करके सुखी बनाने का आग्रह और व्यक्ति मानव के स्थान पर समष्टि मानव या सम्पूर्ण मानव समाज की कल्याण कामना।’’ उन्होंने आधुनिकता को एक गतिशील प्रक्रिया मानते हुए कहा-‘‘आधुनिकता अपने आप में कोई मूल्य नहीं है। मनुष्यों ने अनुभवों द्वारा जिन महनीय मूल्यों को उपलब्ध किया है उन्हें नये संदर्भ में देखने की दृष्टि आधुनिकता है।’’120

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का कथन है कि ‘‘जिसे हम आधुनिकता कहते हैं वह एक प्रक्रिया का नाम है। यह प्रक्रिया अंधविश्वासों से बाहर निकलने की प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया नैतिकता में उदारता बरतने की प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया बुद्धिवादी बनने की प्रक्रिया है। आधुनिकता वह है जो मनुष्य की ऊँचाई उसकी जाति या गोत्र नहीं, बल्कि उसके कर्म से नापता है। आधुनिक वह है जो मनुष्य-मनुष्य को समान समझे।’’121

कुबेरनाथ राय की दृष्टि में-‘‘आधुनिकता एक दृष्टिक्रम है, एक बोध-प्रक्रिया है, एक संस्कार प्रवाह है या सीधी शब्दावली में एक खास तरह का स्वभाव है और इस स्वभाव की उपलब्धि के लिए आत्मान्वेषण की यंत्रणा भोगनी पड़ती है। प्रश्नाकुलता, संशयशीलता, जीवन के आस्वाद में विश्वास, मात्र तात्कालिक या शुद्ध ऐन्द्रिय अनुभूति में ही विश्वास, अतिमा या परम्परा से निरपेक्ष होकर मूल्यों का अन्वेषण, अन्वेषण की तीव्र यंत्रणा का बोध, चरम क्षणों -यथा जन्म समय का क्षण या मृत्यु के समय का क्षण जब हम नितांत अकेले रहते हैं- को पकड़ने और उनके माध्यम से जिज्ञासा और सिसृक्षा को तुष्ट करने का प्रयास आदि। इन सारे संस्कारों से सम्पृक्त मन को आधुनिक मन कहते हैं।’’122

डा. रामविलास शर्मा हिन्दी में आधुनिकता या आधुनिक काल की शुरूआत भक्तिकाल से मानते हैं। अर्थात् जब सामंती समाज में आधुनिक जातियों का निर्माण होने लगे और साहित्य में जनपदीय भाषाओं अथवा आधुनिक जातीय भाषाओं की प्रतिष्ठा होने लगे तो समाज और साहित्य में आधुनिकता य आधुनिक काल शुरू हो जाता है। उनके अनुसार-‘‘सामंती अंधविश्वासों से बाहर निकलकर जो साहित्य ज्ञान-विज्ञान और कलात्मक सौंदर्य की ओर अग्रसर होता है, वह आधुनिक है।’’123

अमृतराय की मान्यता है कि ‘‘आधुनिकता बाह्याचार में नहीं मन के संस्कार में होती है।....मन के संस्कार से आशय है मन की वह वृत्ति जो मध्ययुगीन रूढ़ियों और अंधविश्वासों से नाता तोड़कर आधुनिकतम ज्ञान के आलोक में, तर्क और विवेचना की कसौटी पर जीवन के हर व्यापार को परखती है और स्वयं अपने विवेक से किसी निष्कर्ष पर पहुँचती है।’’ उनके अनुसार-‘‘हर चीज जो समसामयिक या वर्तमानकालीन है आधुनिक नहीं है.....और जो चीज समसामयिक या वर्तमानकालीन नहीं है वह भी आधुनिक हो सकती है- इसका प्रमाण है ऋग्वेद की अनेक ऋचाएँ, प्राचीन यूनान के नाटककार ईस्किलस, यूरिपिडीज, सोफोक्लीज़ और उनसे भी पचीसो हजार बरस पहले स्पेन और फ्रांस की गुफाओं में आंके गए भित्ति-चित्र, बाइबिल की कहानियाँ, कबीर की साखियाँ, जातक कथाऐं और भी न जाने क्या-क्या जो काल का इतना सब व्यवधान होते हुए आज भी इतना आधुनिक जान पड़ता है।’’124

लक्ष्मीकांत वर्मा आधुनिकता को जहाँ समसामयिकता का पर्याय मानते हैं125 वहीं धर्मवीर भारती इसे ‘संकटबोध से अभिन्न’ कहते हैं।126 डा. विपिनकुमार अग्रवाल कला क्षेत्र में इसकी परख करते हुए बताते हैं कि ‘‘आधुनिकता की प्रकृति सूक्ष्म है। इसकी कोई स्थूल, पूर्व निश्चित और अपरिवर्तनीय दिशा नहीं है, जिसे व्यापक ऐतिहासिक दृष्टि से खोजा जा सके।....आधुनिकता मूलतः एक खंडित घटना है जिसका बीती हुई घटनाओं से बहुत दूर का ही संबंध है।’’127

निर्मल वर्मा के शब्दों में कहें तो-‘‘आधुनिकता, यदि वह सिर्फ एक खाली शब्द नहीं, आस-पास की हर चीज़ को ऐसे अंदाज से देखने और परखने की क्रिया है, जो हमसे पहले किसी भी पीढ़ी के पास नहीं था-सिर्फ, ‘देखना-परखना’ ही काफी नहीं, उसके लिए एक बिल्कुल नये सिरे से जीना ज़रूरी है-एक ऐसे स्तर पर, जहाँ हर निगाह एक खोज है और हर खोज अपने में एक छोटी-सी ‘साहसिकता’।’’128

कुँवरनारायण को उद्धृत करें तो उनके अनुसार-‘‘आधुनिकता एक मूल्य नहीं, मूल्य के प्रति एक दृष्टि है। ये मूल्य समकालीन भी हो सकते हैं, पारम्परिक भी और अतीत के भी। कभी-कभी अतीत का कोई मूल्य हमारे लिए आज के किसी मूल्य से भी अधिक आवश्यक हो सकता है और तब आधुनिकता एक विवेक हो सकती है जो उसका सही मूल्यांकन कर सके।’’129


निष्कर्षतः -
उपर्युक्त उदाहरणों के बाद इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता कि हिन्दी के चिंतकों में आधुनिकता की सैद्धांतिकी का विवेचन अधिकतर अमूर्तन का शिकार हुआ है। परस्पर विरोधी बातें करते हुए भी खण्ड-खण्ड स्थिति को सभी ने संस्पर्श किया है। वैसे भी आधुनिकता विवेचन कभी-भी सम्पूर्ण नहीं हो सकता। लेकिन इस टुकड़े-टुकड़े की विवेचना से भी आधुनिकता की तस्वीर काफ़ी हद तक साफ हो जाती है। इतना ज़रूर है कि, ल्योतार जिस ‘मनुष्यता’ और ‘मानवता’ के बारे में ज्ञानोदय के समग्रीकृत महावृत्तांतों का सार्वभौमिवाद कहता है और जिससे निष्पन्न विश्व-दृष्टि को जर्मन आदर्शवाद के रूप में देखता है130 उसका भरपूर असर हिंदी चिंतकों में है। यहाँ मुक्ति के महाख्यान अभी भी मौजूद हैं।

वस्तुतः आधुनिकता की अवधारणा स्वीकार और निषेध के व्यतिरेक (contrast) के बीच रूपाकार लेती है।131 इस धरातल पर आधुनिकता की सीधी टक्कर मध्यकालीनता से होती है, और इसी धरातल पर आधुनिकता न केवल अपने निर्गुण रूप में सार्वभौम हो जाती है, बल्कि देश-काल की सीमाओं को भी तोड़ती है। प्रो. नित्यानंद तिवारी के शब्दों में कहें तो आधुनिकता मुख्यतः ‘धर्म समर्थित समाज व्यवस्था’ और ‘धर्म-दर्शन द्वारा रूपायित पद्धति से परिचालित जीवन’ को अस्वीकार करती है।132 वह मूल्यों का स्रोत किसी आप्त वाक्य अथवा शास्त्रोक्ति की मानने के लिए तैयार नहीं है। वह मूल्यों का स्रोत मनुष्य को ही मानता है। प्रो. तिवारी के अनुसार-‘सभी मूल्यों का स्रोत ईश्वर या धर्म में न होकर मनुष्य में केन्द्रित हो गया, जिससे व्यक्तिगत अनुभूति अपेक्षाकृत अधिक महत्त्वपूर्ण बन बैठी, इसलिए आज कोई भी व्यक्ति इतना महत्त्वपूर्ण या ऊपर से लदा हुआ नहीं लग सकता जितना मध्ययुग तक का, क्योंकि अब प्रत्येक व्यक्ति अपनी शक्ति और सृजनात्मकता के लिए अपना रास्ता निकाल लेने में अपेक्षाकृत अधिक सचेत हो गया है।’133 आधुनिक व्यक्ति अपने जीवन की सार्थकता स्वयं सृजित करता है। आधुनिक व्यक्ति अच्छाई-बुराई या नैतिकता-अनैतिकता के मूलभूत प्रश्नों को नये सिरे से उठाता है और ऐसे स्तर पर प्रतिफलित होता है जहाँ उसकी अच्छाई-बुराई अपनाने पर वायवीय स्थितियों की अपेक्षा ठोस स्थितियों का महत्त्व अधिक होता है, जिसमें तात्कालिक अनुभूति को प्राथमिकता मिलती है।

मध्यकालीन मनुष्य ‘जीव’ होता था जो कि एक जैविक और आध्यात्मिक ईकाई मात्र था। आधुनिकता मनुष्य की इस धारणा का निषेध करती है और उसे भौगोलिक, सामाजिक ‘व्यक्ति’ बनाती है, जो अपने अस्तित्व को ऐतिहासिकता में अर्जित करता है। आधुनिकता सामान्यतया पारलौकिक विचारों और पराप्राकृतिक शक्तियों का निषेध करती है जिसके अनुसार प्रकृति की शक्ति के ऊपर कुछ है जो सबका नियामक है। आधुनिकता प्रकृति और प्रकृति की निरंतरता में विश्वास करती है और चिंतन को पराभौतिक शक्तियों के वायवीय वाग्जाल से बाहर निकालकर मनुष्य पर केन्द्रित करती है। आधुनिकता परम्परा का अस्वीकार नहीं करती, लेकिन धार्मिक कर्मकाण्डों और शास्त्रानुमोदित सोपानिकता का विरोध करती है। इसके मूल में इहलौकिक बौद्धिकता सक्रिय रहती है।

प्रकृति और वस्तु का आधारभूत लक्षण परिवर्तन है, लेकिन पुराना मानस बड़ी-बड़ी घटनाओं का तटस्थ द्रष्टा होता था, घटनाओं और परिस्थितियों को बदलने में उसकी भूमिका नहीं होती थी। वह केवल व्याख्या कर सकता था। लेकिन जैसा कि कार्ल मार्क्स ने कहा- सवाल समाज को समझने का नहीं बदलने का है।134 आधुनिक मानस मनुष्य को स्वभाव का सहभागी बनाता है। पूर्व आधुनिक मानस के अनुसार सत्य बना बनाया होता है, सत्य को सिर्फ खोजा जा सकता है, उत्पन्न नहीं किया जा सकता। जबकि आधुनिकता के अनुसार चीज़ों के साथ क्रिया-प्रक्रिया करते हुए जो प्रश्न उठाये जाते हैं उससे सत्य बनता है, अतः सत्य की कोई आत्यंतिक परिभाषा नहीं होती। आधुनिक मानस ज्ञान के लिए आप्त वाक्यों का मोहताज नहीं है, वह चीज़ों के साथ गहरी क्रिया-प्रतिक्रिया से उसे अर्जित करता है। अतः आधुनिकता ज्ञान को अंतिम रूप से निरपेक्ष नहीं मानती, न ही उसे व्यवहार और अनुभव से परे रखता है। आधुनिकता एक विशेष प्रकार की जीवन-पद्धति होती है, जिसका विकास इतिहास की विभिन्न शक्तियों के दबाव के कारण होता है।

संक्षेप में कहा जा सकता है कि इहलौकिक विचार, मनुष्य की भूमिका का विश्वास, लोकवाणी में अभिव्यक्ति, इतिहास की विकासवादी धारणा, ज्ञान की विकासमानता और भविष्य की चेतना आधुनिक है। साथ ही तर्क आधुनिक मूल्य है तो विज्ञान आधुनिक संस्था, असंतोष आधुनिक भाव है तो व्यवहार आधुनिक जीवन-पद्धति, परिस्थितिबोध आधुनिक चेतना है तो मानववाद आधुनिक आश्रय, व्यक्ति आधुनिक संस्था है तो वर्ग आधुनिक संबंध।


119. धनन्जय वर्मा, आधुनिकता के बारे में तीन अध्याय, पृ॰ 210.
120. हजारीप्रसाद द्विवेदी, हजारीप्रसाद द्विवेदी ग्रन्थावली, भाग-9, पृ॰ 359-362.
121. रामधारी सिंह ‘दिनकर’, आधुनिक बोध, पृ॰ 24.
122. ‘समकालीन सृजन’, अंक-21, वर्ष-2002, पृ॰ 27 से उद्धृत.
123. रामविलास शर्मा, हिन्दी जाति का साहित्य, पृ॰ 32.
124. अमृतराय, सहचिंतन, पृ॰ 31.
125. धनन्जय वर्मा, आधुनिकता के बारे में तीन अध्याय, पृ॰ 221 से उद्धृत.
126. धर्मवीर भारती, धर्मवीर भारती ग्रन्थावली, भाग-4, पृ॰ 477.
127. विपिनकुमार अग्रवाल, आधुनिकता के पहलू, पृ॰ 18.
128. निर्मल वर्मा, चीड़ों पर चांदनी, पृ॰ 87.
129. कुँवरनारायण, आज और आज से पहले, पृ॰ 48.
130. ‘आलोचना’, जुलाई-दिसम्बर, 2002, पृ॰ 14-15.
131. माडर्निटी: ए क्रीटिकल कान्सेप्ट, एडिटर-माल्कम वाटर, पेज 79.
132. नित्यानंद तिवारी, आधुनिक साहित्य और इतिहास-बोध, पृ॰ 31-33.
133. वही, पृ॰ 32.
134. मार्क्स/ऐंगेल्स, कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणा पत्र



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2 comments

Nirmla Kapila June 6, 2009 at 3:07 PM

bबहुत ही ग्यान्वर्द्ध्क विवेकपरक अलेख है धन्य्वद्

जितेन्द़ भगत June 6, 2009 at 3:54 PM

उपयोगी जानकारी के लि‍ए आभार।