Monday, June 22, 2009

अश्लीलता शब्द में नहीं भाव में होती है

रंगमंच में नैतिकता को लेकर न तो कभी बहस हुई. न ही इस तरह की बहस की कभी कोई ज़रूरत महसूस हुई. मुझे लगता है कि रंगमंच ही नहीं सभी कलाओं के क्षेत्र में ऐसी किसी बहस की गुंजाइश नहीं है क्योंकि फिर हम जाएंगे कि सारा मामला ही बकवास है. मैंने खुद इस्मत चुगताई की विवादास्पद कहानी ‘लिहाफ़’ का मंचन किया. सैक्स और स्त्री-पुरुष आकर्षण तो स्वाभाविक है, उसे छिपाना क्यों? अभी इसी भारत रंग महोत्सव में विभा मिश्र (भोपाल) ने अपने नाटक में बेड सीन दिखाया था. राजेंद्र गुप्ता ने ‘सूर्य की अंतिम किरण से सूर्य की पहली किरण तक’ में बेड सीन दिखाया था या मैंने खुद अभी वेश्चनर के ‘फोर सीजन’ में स्त्री-पुरुष के शारीरिक मिलन को दिखाया है जिसमें नायिका दर्शकों की ओर पीठ करके अपनी शर्ट उतारने का अभिनय करती है जबकि नायक भी ऐसा ही करता है. इस नाटक में दृश्य तो यह कहता है कि स्त्री और पुरुष दोनों मंच पर निर्वस्त्रा हो जाते हैं. सवाल यह है कि क्या कलाकार इसके लिए तैयार हैं? यदि वे तैयार भी हों तो उन्हें निर्वस्त्रा दिखाकर आप क्या हासिल कर लेंगे? मैंने दोनों को सिर्फ़ कमीज उतारते हुए दिखाया, आभास दे दिया और दर्शकों को बात समझ में आ गई. यहां प्रश्न नैतिकता का नहीं है. प्रश्न यह है कि आप रंगमंच जैसी कला में यथार्थवाद की किस सीमा तक जा सकते हैं? कोई सीमा तो होगी? पर मैं फिर कहूंगा कि वह सीमा निर्देशक ही तय करेगा, रंगकर्मी खुद तय करेंगे. यह सीमा किसी बाहरी ‘कोड आफ कंडक्ट’ के आधार पर नहीं हो सकती. बहुत सारे निदेशक इन सीमाओं को तोड़कर देख चुके हैं, नतीजा कुछ नहीं निकला. उन्हें दर्शकों ने पूरी तरह नकार दिया. मैं मानता हूं कि रंगमंच में ऐसे दृश्यों को थोड़ा दिखाएं, ज़्यादा छुपाएं, दर्शकों की कल्पनाशीलता के लिए ज़्यादा से ज़्यादा स्पेस छोड़ें. जहां तक शाब्दिक हिंसा या अश्लील संवाद के इस्तेमाल का प्रश्न है, जैसा विजय तेंदुलकर के सखाराम बाइंडर, गिद्ध तथा मच्छिंद मोरे के जानेमन के बारे में कहा जाता है, तो हमें देखना पड़ेगा कि संदर्भ क्या है? इसे स्पष्ट करने के लिए एक मज़ेदार घटना का जिक्र करना चाहूंगा. मुंबई में सत्यदेव दुबे के एक नाटक में गालियों के प्रयोग पर सेंसर बोर्ड ने आपत्ति की. दुबे ने इसका तरीक़ा यह ढॅ। एक दूसरा मुद्दा है रंगकर्मियों के बीच स्त्री-पुरुष संबंधों का जैसा सत्यदेव दुबे के नाटक इंशा अल्लाह या सुरेंद्र वर्मा के शकुंतला की अंगूठी में दिखाया गया है कि नायिका अपने निर्देशक से ही गर्भवती हो जाती है. रंगमंच की दुनिया और काम की प्रवृत्ति ही ऐसी है कि इसमें स्त्री-पुरुष संबंधों की कोई परिभाषा नहीं हो सकती कि कब, कौन किसके साथ क्या संबंध बनाता है? जब तक एक स्त्राी और एक पुरुष के बीच आपसी सहमति है, किसी को कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए. मेरा कहना यह है कि इसमें खुलापन और ईमानदारी इस हद तक होनी चाहिए कि दोनों में किसी के भी संबंध किसी और से भी हो तो दोनों को इसकी जानकारी रहनी चाहिए. यह न हो कि आप किसी ऐसे क्षण में अपने झूठ और पाखंड के साथ पकड़े जाएं. रंगमंच माध्यम ही ऐसा है कि इसमें इस तरह के संबंध की ज़्यादा गुंजाइश और स्पेस होता है. इसीलिए समाज में रंगमंच को मुश्किल से स्वीकृति मिलती है. चाणक्य विष्णुगुप्त ने अपनी प्रख्यात पुस्तक अर्थशास्त्रा में साफ़-साफ़ कहा है कि रंगकर्मियों को नगर की सीमा से बाहर खदेड़ देना चाहिए. यदि एक अभिनेता और अभिनेत्री मंच पर बार-बार आलिंगन, चुंबन आदि करते हैं तो स्वाभाविक है कि वे इस रिश्ते को मंच से बाहर भी विकसित कर सकते हैं. इसीलिए इन मामलों में रंगमंच की दुनिया थोड़ी उदार है. होता यह है कि यदि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में चाय की दुकान पर एक स्त्री और एक पुरुष लगातार बैठे दिखते हैं तो कितना भी उदार व्यक्ति क्यों न हो उसके मन में और कुछ नहीं आ सकता सिवाय इसके कि कुछ चक्कर है. मेरा मनना है कि इस मामले को मानवीय दृष्टि से देखा जाना चाहिए.
रंगमंच के दुनिया में परस्त्री या परपुरुष संबंध को कोई नहीं रोक सकता. रंगमंच ही क्यों समाज में भी कोई नहीं रोक सकता. नैतिकता यही है कि यदि हम ऐसा संबंध बनाते हैं तो उसे ‘फेस’ करें, स्वीकार करें. दिल्ली में ही एक रंगमंडल प्रमुख का अपनी ही अभिनेत्री से संबंध बन गया. चलिए कोई बात नहीं. पर जब उसकी पत्नी आ धमकी तो वह रंगमंडल ही छोड़कर भाग गया. जब उस अभिनेत्री की शादी हो गई तो वह निदेशक अपने पत्नी के पास वापस पहुंच गया. यह एक स्वनिर्धारित नैतिकता है कि हम फेस करें. यह नैतिकता समाज द्वारा निर्धारित नैतिकता से मेल नहीं खाती. मैं एक और उदाहरण देता हूं. मान लें कि मेरा संबंध एक अभिनेत्राी से है. बाद में उस अभिनेत्री के संबंध किसी दूसरे बड़े निर्देशक से हो गया पर उसने मुझे कुछ नहीं बताया. जब मैंने दोनों को पकड़ लिया तो भी उन्हें स्वीकार करना चाहिए कि ‘हां हमने किया.’ पर वे करते क्या हैं कि वे मुझसे लगातार झूठ पर झूठ बोलते जाते हैं. मैं तत्काल उस अभिनेत्री से अपने संबंध तोड़ लेता हूं. हालांकि बाद में हम तीनों अच्छे दोस्त बने रहते हैं. मेरा कहना है कि जो आप करें उसे साहस के साथ स्वीकार करें. पर आप रंगमंच को समाज से अलग करके नहीं देख सकते. समाज में कौन स्वीकार करता है? क्या क्लिंटन ने मोनिका के साथ अपने संबंधों को स्वीकार किया? यदि हममें स्वीकार करने की हिम्मत आ जाए तो सारी समस्या ही हल हो जाए.
पश्चिमी देशों और अमेरिका में अनेक नाटक ऐसे हैं जिसमें लोग अपने संबंधों को छिपाते हैं. बर्नाड स्लेड का नाटक सेम टाइम नेक्स्ट इयर इसका उदाहरण है. पर वहां इतनी नैतिकता ज़रूर बची हुई है कि ऐसे संबंधों का पता चलते ही स्त्री-पुरुष या पति-पत्नी झट से अलग हो जाते हैं. नसीरुद्दीन शाह ने प्रख्यात अंग्रेज़ी नाटककार जार्ज बर्नाड शाॅ और क्लियोपेट्रा कैम्पबेल के विवाहेतर संबंधों पर डियर लायर और प्रसन्ना ने भारतेंदु हरिश्चंद्र और मल्लिका के प्रेम प्रसंग पर सीमा पार जैसा नाटक किया है. पर जैसा कि मैंने अपने नाटक फोर सीजन में बताने की कोशिश की है कि ऐसे संबंधों का कोई भविष्य नहीं होता. जब आप एक संबंध की नहीं निभा पाए तो क्या गारंटी है कि दूसरे या तीसरे संबंध को निभा पाएंगे? रंगमंच में नैतिकता का सवाल इसलिए भी नहीं उठता क्योंकि नाटकों के कथ्य ही ऐसे होते हैं जो एक ओर सामाजिक पाखंड को चुनौती देते हैं तो दूसरी ओर राजनैतिक सत्ता को. दुनिया का कोई नाटक यथास्थितिवादी नहीं हो सकता. सोफोक्लीज के नाटक इडीपस में नायक अपनी मां के साथ विवाह कर संतान पैदा करता है. पूरन भगत की कहानी पर ‘लूना’ नाटक में सौतेली मां अपने बेटे पर आशिक हो जाती है. रामेश्वर प्रेम के नाटक अंतरंग में सम्राट अशोक की पत्नी तिष्यरक्षिता और सम्राट के बेटे कुणाल में संबंध दिखाया गया है. गिरीश कर्नाड के नाटक ययाति और अग्नि और बरखा में श्वसुर अपनी बहू को भोगता है. नंद किशोर आचार्य के नाटक देहांतर में भी यही द्वंद्व-दृश्य है. यदि आप रंगमंच में नैतिकता का एकल और स्थूल अर्थ लेंगे तो न सिर्फ़ ऐसे सारे नाटकों को बल्कि सारे मिथकों, धर्मग्रंथों और इतिहास को भी खारिज करना पड़ेगा.
स्त्री और पुरुष दो ऐसी शक्तियां हैं जिनमें आकर्षण स्वाभाविक है. ये आपस में टकराएंगे ही. ऐसे क्षणों में आपको अपने विवेक से अपनी नैतिकता एवं जवाबदेही खुद ही तय करनी पड़ेगी. कोई तीसरा या बाहरी पक्ष यह नैतिकता नहीं तय करेगा. यदि आप परपुरुष या परस्त्री संबंधों को जायज ठहराते हैं तो ज़रूर ऐसा कीजिए, पर बाद में एक-दूसरे पर न तो दोषारोपण कीजिए न कीचड़ उछालिए. यदि आप यह रिश्ता झूठ की बुनियाद पर बनाते हैं तो कभी न कभी झूठ पकड़ में आ जाएगा. तो उस स्थिति का सामना करने के लिए भी तैयार रहिए. यही आपकी नैतिकता है.



लेखक - देवेंद्रराज अंकुर, हंस पत्रिका से साभार

4 comments

डॉ .अनुराग June 22, 2009 at 2:09 PM

विचारणीय लेख है ...अब भी सोचता हूँ इस्मत चुगताई ने उस दौर में कैसे लिहाफ लिखा होगा ...काबिले तारीफ़ ....साहित्य या कोई भी विधा हो....उसे अपने तरीके से सच को तो दिखाने की जिम्मेवारी निभानी ही होगी

अशोक कुमार पाण्डेय June 24, 2009 at 8:49 PM

बिल्कुल सही दृष्टि है
अश्लीलता तभी होती है जब इन चीज़ों को बाज़ार के लिये बना दिया जाता है।

आपका स्वागत है आप ज़रूर योगदान करें…मिलजुलकर साथ चलने की ज़रूरत है

अशोक कुमार पाण्डेय June 24, 2009 at 8:52 PM

कृपया मेरे मेल आई डी

ashokk34@gmail.com
पर संपर्क करें।

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी June 25, 2009 at 9:30 PM

बहुत अच्छा लेख....

आप का ब्लाग अच्छा लगा...बहुत बहुत बधाई....