Sunday, July 4, 2010

आलोचना का स्वरूप

हिन्दी गद्य के विकास के साथ ही हिन्दी आलोचना का विकास हुआ। हिन्दी आलोचना की कहानी बहुत पुरानी नहीं है। 19वीं शताब्दी के अंत में जिसे भारतेन्दु युग के नाम से जाना जाता है, में हम साहित्य का एक नया रूप देखते हैं। अब साहित्य व्यक्ति-सत्ता से हटकर समाज-सत्ता की वस्तु हो गयी। प्रिंटिंग-प्रेस के आ जाने से पत्र-पत्रिकाओं का छपना शुरु हो गया। पत्र-पत्रिकाओं का पाठक राजदरवार का सहृदय रसिक न होकर मध्य-वर्ग का शिक्षित पाठक था। इस पाठक की रुचि भी राजदरवार के सहृदय रसिक से भिन्न थी। यही कारण है कि अब पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित साहित्य का विषय भी बदल गया। न सिर्फ साहित्य के विषय और उसकी संवेदना में बदलाव आया, अपितु उसकी भाषा, शिल्प और विधा में भी परिवर्तन हो गया।जब साहित्य के स्वरूप और उसकी संवेदना में परिवर्तन हो गया तब उस साहित्य को पढ़ने, उसे समझने और उसके मूल्यांकन की कसौटी में परिवर्तन होना स्वाभाविक था। रस, छंद, अलंकार आदि राजदरवार के सहृदय रसिकों के मूल्यांकन के आधार थे। यह शास्त्रीय आधार इस नए साहित्य को समझने के लिए नाकाफी था। समाज बदल गया। सामाजिक मूल्य बदल गये। इस सबके बावजूद साहित्य का मूल्य वही कैसे बना रह सकता था ? हिन्दी आलोचना का जन्म इसी बिन्दु पर हुआ। हिन्दी आलोचना तार्किक, वैज्ञानिक और ऐतिहासिक आधार पर काव्यशास्त्र से टकरा रहा था। आलोचना अब अपने मूल्य के लिए सिर्फ साहित्य की ओर न देखकर समाज की ओर देखने मे विश्वास करने लगा। इसे समझने के लिए आगे हम आलोचना और काव्यशास्त्र में अंतर को समझेंगे।

आलोचना और काव्यशास्त्र में अंतर

आलोचना का आधार आधुनिक बोध है, जबकि काव्यशास्त्र का आधार मघ्यकालीन बोध है। इसे थोड़ा विस्तार से समझने की कोशिश करेंगे। मध्यकालीन बोध के केन्द्र में ‘ आस्था ’ होती है, जबकि आधुनिक बोध के केन्द्र में ‘ तर्क ’। आध्यात्म के तौर पर ईश्वर, राजनीतिक तौर पर राजा, सामाजिक तौर पर वर्ण-व्यवस्था, जाति-व्यवस्था, ब्राह्मणवादी एवं पुरूषवादी व्यवस्था आदि – इन सबका अस्तित्व आस्था के मजबूत आधार पर ही टिका हुआ है। चेतना के धरातल पर आस्था और आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक धरातल पर सामंतवादी व्यवस्था मध्यकालीन बोध को बनाने का काम करती है। पूंजीवादी व्यवस्था को आगे बढ़ने के लिए सामंतवादी अवरोधों को हटाना होता है। इसलिए वह आस्था नामक अवरोध को आधुनिक बोध के तर्क से विस्थापित करती है। तार्किक और वैज्ञानिक ज्ञान ही आधुनिक बोध का आधार है। आलोचना का संबंध इसी तार्किक और वैज्ञानिक ज्ञान से है। इसके विपरीत काव्यशास्त्र का संबंध आस्था से है। रस सम्प्रदाय हो या अलंकार सम्प्रदाय, रीति सम्प्रदाय हो या वक्रोक्ति सम्प्रदाय- सभी आस्था के आधार पर ही टिके हुए हैं।

आलोचना का संबंध इतिहास बोध से है जबकि शास्त्र का संबंध सनातन से है। था, है और रहेगा – इस दृष्टि को शाश्वत या सनातन दृष्टि कहते हैं। इसमें इतिहास का हस्तक्षेप संभव नहीं है। अर्थात इस दृष्टि के अनुसार इतिहास में परिवर्तन का भाव, अनुभूति, संवेदना पर कोई प्रभाव नहीं होगा, क्योंकि यह सनातन है। इसे परिवर्तन विरोधी दृष्टि भी कह सकते हैं। इसके विपरीत आलोचना का संबंध इतिहास बोध से है। वह मानता है कि इतिहास में परिवर्तन का भाव, अनुभूति, संवेदना पर प्रभाव होगा। अर्थात भाव, अनुभूति, संवेदना शाश्वत और सनातन नहीं हैं, इनमें इतिहास के परिवर्तन से बदलाव आता है। आलोचना का कार्य इस परिवर्तित संवेदना की पहचान करने, उसका विश्लेषण करने, उस परिवर्तन के कारणों की पहचान करने और उसे अपने समाज और इतिहास से जोड़ने का है।

आलोचना सामाजिक विमर्श है जबकि काव्यशास्त्र शुद्ध साहित्यिक विमर्श है। इसलिए आलोचना के मूल्य सामाजिक मूल्य से संबंधित होते हैं जबकि काव्यशास्त्र के मूल्य शुद्व साहित्यिक होते हैं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लोकमंगल को अपना काव्य मूल्य बनाया। लोकमंगल का संबंध समाज से है। इसी तरह हम करुणा, आनन्द की सिद्धावस्था और आनन्द की साघनावस्था आदि को भी देख सकते हैं। ये सभी काव्यमूल्य सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भ रखते हैं। इसके विपरीत रस-सिद्धांत, ध्वनि-सिद्धांत, अलंकार, रीति, वक्रोक्ति आदि काव्यमूल्य शुद्ध साहित्यिक मूल्य हैं। इनका संबंध काव्यशास्त्र से है। आधुनिक आलोचना शुद्ध साहित्यिक मूल्य का विरोध करती है।

आधूनिकता का परिणाम राष्ट्र की अवधारणा है। राष्ट्र की अवधारणा एक राजनीतिक अवधारणा है। इसलिए साहित्य की आलोचना राष्ट्र की अवधारणा से अलग नहीं हो सकती। राष्ट्र की अवधारणा में समाज, इतिहास, राजनीति, धर्म, अर्थव्यवस्था ये सभी आ जाते हैं। इसलिए हम देखते हैं कि आधुनिक आलोचक समाज, इतिहास, राजनीति,अर्थव्यवस्था, धर्म आदि के प्रश्न से टकराता है। इस टकराहट से ही वह साहित्य के मूल्य भी निर्मित करता है।

आधुनिकता एक आर्जित सत्य है। मनुष्य ने वैज्ञानिक और तार्किक ज्ञान से इस सत्य को अर्जित किया है। इसलिए आधुनिक आलोचना आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के अन्य अनुशासनों की मदद लेता है। साहित्य का संबंध मानव मन से है। इसलिए आलोचना मानव मन के विज्ञान मनोविज्ञान का सहारा लेती है। इसतरह वह साहित्य के नए-नए अर्थ को प्रकाश में लाता है। इन नए अर्थ की पहचान हम काव्यशास्त्र के माध्यम से नहीं कर सकते थे।

कुलमिलाकर देखें तो आधुनिक आलोचना आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के आलोक में साहित्य के साथ रागात्मक संबंध स्थापित करने में, साहित्य के माध्यम से समाज को समझने में, समाज और इतिहास के अनुसार मूल्य निर्णय करने में हमारी मदद करता है। आलोचना वह तार्किक एवं बौद्धिक प्रविधि या प्रक्रिया देता है जिसके माध्यम से हम मूल्य तक पहुंचते हैं।



................राजीव कुमार कुंवर जी से साभार

2 comments:

Etips-Blog Team said...

बहुत खुब।
कृपया और विस्तार से जानकारी देँ

->सुप्रसिद्ध साहित्यकार और ब्लागर गिरीश पंकज जी का साक्षात्कार पढने के लिऐ यहाँ क्लिक करेँ

rubaroo said...

achhi jaankari hai