Saturday, February 5, 2011

*** ख़त्म नहीं होने वाला दु:ख

बोधिसत्व के कविता संग्रह ‘ख़त्म नहीं होती बात’ की समीक्षा


‘दुख तंत्र’ के बाद बोधिसत्व का यह चौथा कविता संग्रह है। पहला संग्रह 1991 में आया था तो इस तरह बोधिसत्व के कवि का लगभग उन्नीस वर्षों का लम्बा सफ़र है। ‘दुख तंत्र’ 2004 में प्रकाशित हुआ था और यह नया संग्रह ‘खत्म नहीं होती बात’ लगभग छः वर्षों के बाद आया है। स्वाभाविक है इस संग्रह में वे कविताएं हैं जो उन्होंने इन वर्षों के अंतराल में लिखीं हैं। बोधिसत्व हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि हैं और उन्होंने अपनी कविताओं में अपने समय को लेकर हमेशा ज़रूरी सवाल खड़े किये हैं। इन वर्षों में हमारा समय जितना बदला है उसकी चिंता यहाँ बहुत ही प्रमुख रूप में दिखाई देती है। हमने इस बदले समय में जिस तरह से अपनी पुरानी स्मृतियों को पोंछ डाला है बोधिसत्व के यहाँ वह चिंता का विषय है। कविता ‘कोई चिह्न नहीं है’ में पिता के मार्फ़त अपनी संस्कृति की ही चिंता है।
पिता
अब घर में कोई चिह्न नहीं है तुम्हारा
सब धीरे-धीरे मिट गया
कविता में आगे है
पर खोजता हूँ तो कुछ भी नहीं मिलता घर में कहीं
जैसे किसी साज़िश के तहत तुम्हारी चीज़ों को
मिटा दिया गया हो
घर से धरती से
कविता का एकरेखीय पाठ तो यह है कि यहाँ चिंता पिता की है लेकिन वास्तव में यह चिंता अपनी मिटती हुई संस्कृति की है। कवि जिस साजिश की तरफ इशारा कर रहे हैं वह निस्संदेह नव्य साम्राज्यवाद का गहराता संकट है। इस नव्य साम्राज्यवाद ने चकाचैंध की एक ऐसी दुनिया हमारे सामने फैला कर रख छोड़ी कि हम उनकी संस्कृति में फंसते चले गये और हमारा मूल नष्ट होता चला गया।

इस संग्रह में बोधिसत्व ने इस फैलते विशाल सांस्कृतिक संकट के सामने कवियों की उस सामान्य दुनिया को रखा है यहाँ बस मामूली लोग हैं लेकिन बहुत ही महत्वपूर्ण।
वे बड़े मामूली लोग थे
उनके तो नाम भी अजीब निरर्थक से थे
जिन्होंने बचाया मुझे डूबने से
खोने से
मरने से!
ये वे मामूली लोग हैं जिन्हें सत्ता और तंत्र के नियंताओं ने अपनी नीति से बाहर निकाल फेंका है। इस लोकतंत्र में इनकी अहमियत सिर्फ एक वोट की रह गई है। इस लोकतंत्र में इस ‘लोक’ को ध्यान में रख कर उनकी जिन्दगी उनकी समस्या को ध्यान में रख कर कोई विधि-विधान नहीं बनाया जाता। और यही कारण है कि
पांच साल का बच्चा
गुमसुम मलता है बासन
यह कैसी किसकी दिल्ली
और किसका कैसा शासन।
 याद आती है राजेश जोशी की महत्वपूर्ण कविता
बच्चे काम पर जा रहे हैं
हमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है यह।
यह मुक्त अर्थव्यवस्था, मुक्त बाज़ार के कारण है क्योंकि उनकी योजना के केन्द्र में है सिर्फ मुनाफा। अपनी विशाल प्रतिद्वन्दिता और मुनाफे की होड़ में इन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के यहाँ इन भूखे और बेबस लोंगों के लिए कोई जगह नहीं बना पाती।

बोधिसत्व जानते हैं हमारा समय कठिन इसलिए होता जा रहा है क्योंकि हमारी रफ़्तार बहुत अधिक है। और हमने अपनी इस रफ़्तार में अपनी संस्कृति, अपनी मौलिकता को ख़त्म कर दिया है।
जितना
पुराना पड़ता जाता है
नया बनता जा रहा उससे अधिक
बहुत अधिक
बोधिसत्व लिखते हैं
जितनी तेजी से नष्ट हो रही हैं चीजें
उससे बहुत अधिक तेजी से
संवर रही है दुनिया
दुनिया के इस तरह संवरते जाने में एक विडम्बना है। इस संवरती दुनिया में महज वे चंद लोग हैं जिन्होंने इन साम्राज्यवादी ताकतों के सामने घुटने टेक दिए। और जिनके कारण ही वे लोग जो हाशिये पर पड़े हैं बहुत ही दयनीय स्थिति में रहने को अभिशप्त हैं।

बोधिसत्व के यहाँ स्त्रियों के लिए एक खास कोना है और जो बहुत ही मुलायम हैं। इस संग्रह में स्त्रियों को ध्यान में रखकर लिखी गईं कई बेहतरीन कवितायेँ हैं। इस रफ्तार भरी सरपट भागती हुई ज़िन्दगी में स्त्रियाँ ही हैं जिन्होंने अपने यहाँ संस्कृति का कुछ अहम हिस्सा संभाल कर रखा है। जबकि सच यह है कि स्त्रियाँ हाशिये पर पड़ी हैं। लेकिन स्त्रियों की इस केन्द्र से बेदखली नई नहीं है, इसका एक पूरा एक इतिहास है। बोधिसत्व इतिहास से पात्र लेकर अपनी बात को इस समय में कहते हैं। ‘शांता’ कविता राजा दशरथ की बेटी शांता पर लिखी हुई है। शान्ता जिसे अयोध्या से इसलिए बेदखल किया गया था क्योंकि उसके पैदा होते ही अयोध्या में अकाल पड़ गया था। एक बार शान्ता बेदखल क्या हुई फिर वह राह ही देखती रह गई। पहले पिता की और फिर अपने भाइयों की। मर्यादा पुरुषोत्तम राम भी अपने राम राज्य में अकाल पड़ने के डर से उन्हें लाने की हिम्मत नहीं कर पाये। कविता इतिहास की इस घटना से अस्मितामूलक एक बड़े विमर्श को जन्म देती है। कविता पढ़ते हुए वह इतिहास से निकलकर हमारे समय में घुस जाती है जहाँ आज भी शांता बेदखल राह देख रही है। कवि के यहाँ यही शांता दीदी में तब्दील हो जाती है और वे लिखते हैं
दीदी बनारस में रहती है
पहले किसी पिंजरे में रहती थी
उसके पहले किसी घोंसले में रहती थी
बोधिसत्व अपने पिछले संग्रह की तरह ही इस संग्रह में भी अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए जद्दोज़हद करते दिखते हैं। उनकी बेचैनी उनके लेखन में दिखती है। बोधिसत्व अपनी कविताओं में उनकी चिंता करते तो दिखते ही हैं जिन्हें इस पूरी व्यवस्था में साजिश के तहत निकाल फेंका गया है लेकिन उनके यहाँ स्त्रियों के लिए अलग से दुख है। यह संग्रह बेहद पठनीय है और बोधिसत्व हमारे समय के एक जरूरी कवि हैं,  इस संग्रह से एक बार फिर यह पुष्ट होता दिखता है।

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रचनाकार :  उमाशंकर चौधरी    से साभार

 
---------------------------------------------------------------------------पुस्तकः- खत्म नहीं होती बात

कवि:- बोधिसत्व

प्रकाशकः- राजकमल प्रकाशन 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग,
नयी दिल्ली-110002

मूल्यः- 200/
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