Friday, March 18, 2011

*** कबीर के राम


डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी  
(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ० विश्वनाथ त्रिपाठी जी के 80वें जन्मवर्ष पर)


म कबीर और तुलसी दोनों के इष्ट हैं. इनके रामों की तुलना हुई है. असमानता की ज़्यादा हुई है, समानता की कम. निराकार निर्गुण मत वाले संतों का विश्व-बोध अलग है. वे जैसे सबकुछ छोड़ते जाते हुए सीधे परम सत्ता के पास पहुँचना चाहते हैं. बहुत निषेध के बाद उनकी विधेयात्मकता शुरू होती है। निषेध सगुण भक्तों के यहाँ भी है किन्तु अपेक्षाकृत कम है। कबीर में भक्ति के अलावा कुंडलिनी योग भी काफी है। उनके यहां भक्ति और कुंडलिनी योग का अनुपात क्या है - इस विषय में उल्लेखनीय बात यह ज़रूर है कि वे कुंडलिनी योग के प्रसंग में राम का उल्लेख नहीं करते हैं। कबीर अपने राम का निर्माण मौलिक रूप से विभिन्न घटकों के संयोजन में करते हैं।

कबीर के राम का निर्माण जिन घटकों से हुआ है उनमें सबसे प्रमुख काल है। काल पूरे भक्ति काव्य में समाहित है। तुलसीदास के राम का कोदंड काल है। किन्तु काल की जितनी निर्णायक एवं व्यापक भूमिका कबीर के यहाँ है किसी अन्य कवि के यहां नहीं। मेरा मतलब भक्त कवि के यहाँ। कबीर के काल पर बात करते हुए मुझे वाल्मीकि रामायण का एक प्रसंग उल्लेखनीय लगता है। राम के पास काल तापस वेष में आया। काल तापस अपने तेज से प्रज्जवलित होते और अपनी प्रखरों किरणों से दग्ध करते हुए से जान पड़ते थे।

ज्वलान्तमेव तेजोभिः प्रदहन्तमिवांशुभः
काल ने कहा - मैं पूर्वकाल में माया द्वारा आपसे उत्पन्न किया गया था। इसलिए आपका पुत्र हूँ। मैं सर्वसंहारिकारी काल हूँ।

मायासम्भावितो वीर काल सर्वसमाहरः
आप लोक में मनुष्य के पुत्र के रूप में आए हैं। आपकी आयु पूरी हो गई है, यह काल है। अब आप लौट चलिए।

भयंकर भावी भ्रातृवियोग के दृश्य को दृष्टिपथ में लेने वाले काल के उस वचन पर विचार करके श्रीराम के मन में बड़ा दुख हुआ। उनका मुंह नीचे को झुक गया और वे कुछ बोल न सके। तत्पश्चात् काल के वचनों पर बुद्धिपूर्वक सोच-विचार करके कहा यशस्वी राघव इस निर्णय पर पहुँचे कि अब यह सब कुछ भी न रहेगा और वे चुप हो गए।

ततो बुद्ध या विनिश्चित्य काल वाक्यानि राघवः

नैत दस्तीते निश्चित्य तृष्णीमासी न्यहायशाः
काल कबीर के राम द्वारा ही माया से उत्पन्न किया गया है वह सर्वसंहार कर है किन्तु बहु राम के पास ब्रह्मा का आदेश लेकर नहीं जा सकता। काल के आने पर मातृवियोग से कबीर के राम का मुंह नहीं लटक सकता। क्योंकि कबीर के राम किसी के पुत्र रूप में मनुष्य नहीं बने।

पवन जान्हिं आकास चाहिगें चंद जाहिगें स्कारारे

हम नाहीं तुम नाहीं रे भाई राम रहै भरपूरा रे।

राम के अलावा कहीं कोई बचाव नहीं।

जलने वाल भी मुआ मुआ जलावन हार

हा हा करता भी मुआ कासों करौं पुकार।

इस सर्वसंहारक के कारण संसार मिथ्या है, असत्या है, नश्वर है। यह सब नश्वरता भक्ति का बहुत बड़ा तर्क है। असत से सत की ओर जाने का। जो नहीं रह जाएगा उसको छोड़कर जो हमेशा बना रहेगा - उसी का हो जाने का रास्ता श्रेयस्कर है। काल माजीर है तो राम पिंजरा है जिसमें उनका पाला हुआ सुग्गा कबीर रहता है

जय मंजार कहा करै। तूं पिंजर हौ सुग्गा तोर।
कबीर की भक्ति में मृत्यु से कंभासक बिम्ब है। आप विचार करें - चलती चक्की के बिम्ब पर आकाश और पृथ्वी दो पाट हैं - ये अहर्निशि चलते रहते हैं। इनके बीच जो कुछ है सब नष्ट हो रहा है। इन नष्ट होने की प्रक्रिया पर कबीर का ध्यान केन्द्रित रहता है। वे घूम फिरकर मृत्यु की बात अक्सर करते हैं। धार्मिक, राजनीतिक, एकेडेमिक प्रतिष्ठानों का तिरस्कार ने काल के आधार पर करते हैं।

जौ पंडित तुम जोतिष जानौं विद्या व्याकरना

तंतः यंत सब ओसध जानौं अंत तक मरना।
ऐसा लगता है कि सांसारिक सफलता पर इतराने वाले सभी लोगों को कबीर काल-बोध से संतुलित करना चाहते हैं।

यह मरण-भय कबीर की साधना का, सदाचार का, उनकी एकता का, उनके सौन्दर्य बोध का भी महत्वपूर्ण घटक है और इन सबका कबीर के राम की निर्मिति में हाथ है, लेकिन इस विषय में एक और बात पर ध्यान जाता है जिसका संकेत पहले किया जा चुका है। आशय उनकी और निर्गुण संतों की बहुमुखी प्रवृत्तियों से है।

अलगाव का गहरा संबंध मृत्युबोध से है। रहना नाहि देस बिराना है, यहि नेहर दिन चारी अर्ज की भावना मूल रूप से अलगाव और अनिकेतन भी भावना है। यह भावना सगुण कवियों और भक्ति भाव में भी है लेकिन निगुर्ण संत कवियों में यह अधिक है। उसका कारण उनकी सामाजिक स्थिति है। वर्णाश्रम व्यवस्था में उनकी तिरस्कृत स्थिति उनमें अलगाव की भावना पैदा करती है। यह अलगाव उनके अंतिम या सीमांत अलगाव अनुरूप मृत्यु से जुड़ जाती है। करीब-करीब उनके समकक्ष कर देता है और फिर चूंकि मृत्यु का अलगाव सबके लिए है सिर्फ अवर्णों के लिए नहीं, इसलिए वह निर्गुण संत जुलाहे कबीर के लिए अमोघ अस्त्र बन जाता है। दरवाजे पर हाथी बंधा है। दुर्गम रास्तों पर हाथी से जाते हो लेकिन सबसे दुर्गम रास्ते पर तुम्हीं को जाना होगा। यह हाथी दरवाजे पर ही बंधा खड़ा रह जाएगा।

कहा भय दरि बांधे हाथी। आवत जात का संग संघाती।
कबीर का मृत्युबोध उनके अलगाव वादी सामाजिक स्थिति से सम्बद्ध है। तुलसी के यहां अलगाव तो है किन्तु मरण बोध अपेक्षाकृत कम है। अलगाव प्रायः प्रतिष्ठान विरोधी होता है। जब आपकी स्थिति प्रतिष्ठान की अनुकूलता या संगति में नहीं होती। जरूरी नहीं कि ऐसा अलगाव वर्णक्रम-व्यवस्था या सामाजिक स्थिति से ही पैदा हो। सीधे मृत्यु, जरा रोग क्या तीव्र सर्व संहार बोध भी यह सीमांत अलगाव पैदा कर सकती है जैसा सिद्धार्थ का,

निच्च पज्जलितेसन कोन हासी किमानन्दो।
कबीर के राम इस अलगाव और मृत्यु बोध से संदर्भित हैं। अलगाव की व्यथा ही कबीर के अद्वितीय प्रेम-व्यथा का आधार है। वे जो इतना उद्वेलित होकर इतना व्याकुल होकर - हमम है इश्क मस्ताना हमसे दुनिया में यारो क्या है - वे इसी कारण। विकलता, सकलता का विलोम है। जो आत्मीय है उससे अलग होने पर आप सकल नहीं सिर्फ विकल होंगे।

हो बिरहा की लाकड़ी समझ-समझ दुंध आहुं।
कबीर के राम इस अलगाव को दूर करते हैं, मृत्यु को दूर कर अमर पद दिलाते हैं और खोया सामाजिक प्रतिष्ठा प्रदान करते हैं या उसे अपदार्थ बना देते हैं।

जाति जुलाहा मति का धीर। सहज सहज गुण रमैं कबीर।
इस पंक्ति का ठीक अर्थ लगाने के लिए पंक्ति के आगे ‘यद्यपि’ लगाइए। यद्यपि जाति का जुलाहा है कबीर सहज भाव से राम के गुण में रमता है। यह अधिकार सिर्फ सवर्णों या तथाकथित उच्च वर्गीय को नहीं है।

कबीर दास के यहाँ द्वन्द्व मरण और अमरण का है। मरण को पछाड़ने की कबीर के यहां एक ही विधि है राम से प्रेम। उनके यहां भक्ति में राम से एकात्म हो जाने की आकांक्षा है। ऐसा एकात्म कि द्वैत का आनंद बना रहे - वही कवल में कुंआ में प्रेम रस पीवै बारम्बार वाली स्थिति। राम मृत्यु के बाद मिलेंगे इसलिए कहाँ कहीं मरण की वांछित है। कब भरि हों। कब देखिहों, पूरन परमानंद - एक और मरण वांछनीय है। जीवन-मृत्यु होना मृत्यु से पहले ही मृत्यु को अंगीकार करके मुक्ति पा लेना यही मरजीवा होना है। डूब कर मोती ले आना। साधना की सिद्धि है शरीर रहते भी शारीरिकता से मुक्त हो जाना।

तुम्हारे मिलन को बेली है पर पात नहीं।
बेली शरीर है और पात शारीरिकता। कबीर ने यह बात कई बार कही है - पिंड परै जिब जइहै जहां। पहलेई ही घर रक्खो तहां।

साधना के पक्ष में मरण और अमरता का खेल कबीर के यहाँ कई रूप धारण करता है। कबीर और तुलसी के रामों पर साथ-साथ विचार करना दोनों के रामों को अच्छी तरह समझने में सहायक है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इस पर विचार किया था। उनके सूत्रों के सहारे हम जान सकते हैं। कबीर और तुलसी दोनों मानवीय भावना के आश्रय हैं, आलम्बन तो हैं ही। अन्तर यह है कि कबीर के राम के पास केवल मानव हृदय है, तुलसी के राम के हृदय और शरीर दोनों हैं। कबीर के राम जननी हैं, भरतार हैं, पिता हैं और तो और उन्हें कुत्ते पालने का भी शौक है, लेकिन सब भाव रूप में लीला रूप में नहीं। कबीर और तुलसी के रामों का यह अंतर कबीर और तुलसी की संगति में है। कबीर के राम लोकनायक नहीं। कबीर के राम लोक में समाए जरूर हैं लेकिन निराकार हैं। वे मनुष्य नहीं हो सकते थे। मनुष्य होते भी तो क्या लोकनायक होते। हरगिज नहीं। वे मनुष्य होते भी तो जुलाहा होते या जूता गांढने वाले मोची, छीपी या दरजी या शाधन कसाई। और कबीर के युग की बात छोड़िए। भारतीय साहित्य की बात हम नहीं जानते। हिन्दी में प्रबंध साहित्य का प्रथम नायक प्रेमचंद के उपन्यास रंगभूमि का सूरदास है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ही काव्य नायक होते थे क्योंकि लोकनायक भी नहीं होते थे। इस लोक नायकत्व में लोक विशिष्ट है। भक्ति आंदोलन ने इस लोक को परिवर्तित करने का प्रयास किया था कुछ ऐतिहासिक स्थितियों के चलते।

अवर्ण निर्गुण संत प्रधानतः अलगाव की स्थिति में होने के कारण वर्णाश्रम व्यवस्था और धार्मिक-प्रशासनिक प्रतिष्ठान से पृथक या निर्वासित होने के कारण उसकी उपेक्षा या उसका तिरस्कार तो कर सकते थे किन्तु उसके नवगठित करने की बात नहीं सोच सकते थे। अनुमानतः वे उस प्रतिष्ठान तंत्र से परिचित भी नहीं थे। वे साधना प्रक्रिया में मनोजगत को ही पुनर्गठित कर सकते थे। घर के अंदर ही समूचा बाह्य- यानी समूचा लोक पा सकते थे।

यदि घट अंतर बाग बगीचा, जोई जोई पिंडे सोई ब्रह्मांडे
कबीर के राम उस अर्थ में सामाजिक - ऐतिहासिक व्यक्तित्व नहीं जिस अर्थ में तुलसी के राम। कबीर के रामराज्य के संस्थापक नहीं जहाँ बौद्धिक, दैहिक, भौतिक ताप न हो। सौभाग्यवश कबीर के यहां भी रामराज का स्वप्न देखने वाला एक दोहा मिलता है

मैं वासा मोई किया दुरिजन काठे इरि

राम पियारे राम का नगर बस्या भरपूरि
कबीर के राम राजा न हों लोकनायक न हों लेकिन वे निर्गुण होते हुए भी सामाजिक-मानवीय गुणों के प्रतीक, स्रोत एवं समुच्चय हैं। द्विवेदीजी ने कहा था - कबीर के निर्गुण का मतलब गुणहीन नहीं, गुणातीत है। निराकार और असीम अकल्पनीय गुणों के स्रोत और 15वीं शताब्दी में मान्य मानवीय गुणों के योग प्रतीक कबीर के राम। इस पर ध्यान दें तो कबीर के राम और तुलसी के राम में एक प्रच्छन्न समानता दिखाई पड़ेगी। इस प्रच्छन्न समानता के टूटने का उपक्रम भी आचार्य द्विवेदी के ही संकेत सूत्रों के आधार पर किया जा सकता है। दोनों संतों की दुविधायें हैं। ये दुविधायें उनको समान सूत्र में जोड़ती है। कहीं ऊपर। वस्तुतः सामाजिक-ऐतिहासिक 17वीं शताब्दी के कोल नायक और भावी मानव समाज के भी लोकनायक। कबीर ने कहा कुछ नहीं रहेगा। जयका पट्टा (ऋण पत्र) लिखा रखा है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश, नारद सब जायेंगे। आकाश - धरती की चक्की चला रही है, इसके बीच जो कुछ है सब नश्वर है। चंद्रमा, सूर्य, पवन, आकाश सब जायेंगे, रह जाएगा राम ही भरपूर रह जाएगा।

पवन जाहि आकास जाहिगे जंद जाहिगे सरारे

हम नाहीं तुम नाहीं रे भाई रामरहे भरपूरा रे।

जगत असत्य है राम सत्य है। सत्य अर्थात् जो रह सके। जिसमें सदैव रहने की प्रकृति या गुण हों। किसी ने कबीर से पूछा होगा कि ये सत्य राम कैसे हैं? इनके विषय में कुछ बताइए तो कबीर ने बताया मैं कुछ नहीं कह सकता। मारी कहुं तो डर लगता है, इसका कहुं तो झूठा होगा। मैंने कभी देखा नहीं अपनी आँखों से मैं राम को क्या जानूं।

मारी कहौत बहु डरौं हलका कहौं तो झूठ

मैं का जाणों रा कूं, आंखिन कबहुन दीख
यानी कभी ऐ महीकते मुन्जर नजर आ लिवासे माजज में दुविधा यह हुई तो आँखिन देखी वह नहीं रहेगा। जो रहेगा वह आँखिन कबहु न दीख कबीर ने भी एक रास्ता निकाला। राम तो नहीं मिले - यानी आँखों दिखलाई नहीं पड़े लेकिन राम जैसे मनुष्य मिले। कबीर दास के काम यही मनुष्य आए।

हम अपने से, उन्हें बन-बन में ढूँढा लेकिन नहीं मिले। मिले राम सरीखे जन -

कबीर बन बन में फिरा कारणि अपणे राम

राम सरीखे जन मिले तिन सारे सब काम।

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डॉ० विश्वनाथ त्रिपाठी    रचित साभार


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