Saturday, May 14, 2011

*** बन्धन से मुक्त आलोचना


राजेश जोशी की पुस्तक 'एक कवि की दूसरी नोटबुक' की समीक्षा

एक कवि अपने लेखन में कितना सर्जनात्मक हो सकता है यह हमें उसके गद्य से पता चलता है। क्योंकि हम कवियों की कविताओं के तो आदी हो चुके होते हैं लेकिन उनका गद्य हमारी निगाह में थोड़ा संदेह के घेरे में रहता है। वरिष्ठ कवि राजेश जोशी गद्य के अपने यहाँ-वहाँ बिखरे पन्नों को जिस श्रृंखला में चला रहे हैं उसका संयोजन वे अपने कवि व्यक्तित्व को सामने रखकर ही करते हैं। सच यह है कि राजेश जोशी ने खूब बढ़िया गद्य भी लिखा है लेकिन उन्होंने अपने जीवन में अपने कवि व्यक्तित्व को ही उभारा है। यही कारण है कि इसे यथोचित समालोचना मानने से इंकार करते हुए उन्होंने इसे एक कवि की नोटबुक माना है। और अपनी इस तर्ज पर आयी पहली किताब ‘एक कवि की नोटबुक’ की तरह ही इस दूसरी किताब का शीर्षक भी उन्होंने ‘एक कवि की दूसरी नोटबुक’ रखा। और उन्होंने ‘नाम तलाश करने की जहमत से बचने’ के लिए आगे इसमें दूसरी-तीसरी करके बस संख्या बदलकर श्रृंखला को आगे बढाने की सोचा है।

इस पुस्तक ‘एक कवि की दूसरी नोटबुक’ को पढ़ते हुए एकदम शुरूआत में जिन दो बातों पर निगाह जाती है उसमें एक तो यह है कि राजेश ने इस किताब को क्षमताओं से अधिक अक्षमताओं से पैदा हुई ज्यादा माना है। और दूसरी यह कि उन्होंने भूमिका में ही इसे स्वीकार किया है कि ‘इसमें व्यवस्था कम, बहक ज्यादा है’। दोनों ही बातों को मिलाकर जो मूल बात बनती है और जो राजेश कहना चाहते हैं वह यह है कि समालोचना उनकी मूल विधा नहीं है इसलिए उसमें हुए इस दखल को वे बहुत आत्मविश्वास से नहीं लेते हैं। इस पुस्तक को पढ़ते हुए सबसे पहले यही सवाल मन में आता है कि क्या वाकई ऐसा है? राजेश ने अपनी उसी भूमिका में लिखा है ‘किसी किस्म के आलोचकीय विवेक या वस्तुनिष्ठता की गुंजाइश भी जरूरी नहीं कि नज़र आये’।

राजेश ने अपनी इस किताब में जिस ‘व्यवस्था’ के नहीं होने और जिस ‘बहक’ के होने की बात की है या फिर उन्होंने जिस आलोचकीय विवेक या वस्तुनिष्ठता के शायद ‘न होने’ को अपनी सीमा समझा है वास्तव में यही उनकी शक्ति है। क्या यह जरूरी है कि हम आलोचना हमेशा एक आलोचकीय विवेक के साथ ही लिखें या एक व्यवस्था में रहकर ही लिखें। मुझे लगता है कि एक अच्छी आलोचना तभी लिखी जा सकती है जब हम व्यवस्था को थोड़ा छिन्न-भिन्न करें। परम्परावादी शिल्प को थोड़ा झकझोड़ें। जब आलोचना में इस व्यवस्था को तोड़ा जायेगा तभी उसमें आत्मीयता का प्रवेश होगा और जो आलोचना को ज्यादा मार्मिक, ज्यादा संवेदनशील और ज्यादा तीक्ष्ण बनायेगा। एक किताब या फिर एक लेखक पर हम ज्यादा अच्छा तभी लिख सकते हैं जब हम उन्हें अपने बहुत करीब पायें या फिर हमारा उनसे एक रिश्ता बनता हुआ सा दिखे। मुझे लगता है कि आलोचना के क्षेत्र में यह उलटफेर कोई सर्जनात्मक लेखक ही कर सकता है और राजेश जोशी इसके बहुत बड़े और सटीक उदाहरण हैं। राजेश के आये अभी तक ‘एक कवि की नोटबुक’ के दोनों भाग इस मद में एक जबरदस्त किताब हैं।

राजेश जोशी जिस आलोचना को अपनी विनम्रता में ‘बहक’ कह रहे हैं वास्तव में उस आलोचना में गजब की गहराई है। चूंकि यह किसी दवाब में लिखी गई आलोचना नहीं है इसलिए इसमें रस्मअदायगी जैसा कुछ भी नहीं है। राजेश के मन में जो भाया है राजेश ने सिर्फ उसी पर अपनी कलम चलायी है इसलिए उस किताब और उस लेखक विशेष से उनकी गजब की तारतम्यता जुड़ती हुई-सी यहाँ दिखती है। राजेश बहुत ही आत्मीय ढंग से उस लेखक विशेष के भीतर घुस जाते हैं। और यह उल्लेखनीय है कि यहाँ पर उनका कवि मन और उनकी कविताई उनको बहुत सपोर्ट करती है। सही माइने में चूंकि यह आलोचना लेखक के दिल के बहुत करीब है इसलिए वह पढ़ते वक्त पाठक के भी दिल के बहुत करीब चली जाती है।

विगत तीन दशकों में गद्य और पद्य दोनों ही विधाओं को लेकर आलोचना के स्तर में आ चुकी बड़ी गिरावट इस पुस्तक में राजेश जोशी की चिंता के मूल में है। उन्होंने माना है कि आज की आलोचना में ‘हल्ला अधिक है और, सार्थक विमर्श और साफ बोलने वाली आलोचना कम’। उन्होंने यह भी माना है कि आज की आलोचना में यह जरूरी हो गया है कि एक कवि के महत्व को रेखांकित करने के लिए दूसरे की हत्या आवश्यक है। वास्तव में हिन्दी साहित्य में यह व्यक्तिगत राग-द्वेष और राजनीतिकरण के बढ़ते प्रभाव के कारण है। आलोचना से तटस्थता और पाठ केन्द्रिता के समाप्त होने का ही यह प्रतिफलन है। हिन्दी आलोचना आज जितनी पाठ पर नहीं आधारित है उससे अधिक सम्बन्ध, खेमा, पार्टी आदि से प्रभावित हो गई है। लेकिन राजेश इस समस्या पर सिर्फ चिंता जाहिर ही नहीं करते हैं बल्कि एक वरिष्ठ साहित्यकार होने के नाते इसका एक हल भी सुझाते हैं और जो काफी हद तक तार्किक भी है। वे कहते हैं ‘एक कवि और कथाकार ही इसमें हस्तक्षेप कर सकता है। उसी की जरूरत है’। यह पुस्तक वास्तव में उसी हस्तक्षेप का ही फल है।

इस पुस्तक का एक दूसरा नाम ‘समकालीनता और साहित्य’ भी दिया गया है इसलिए इसमें समकालीन साहित्य पर ही बहस है। राजेश जोशी का अध्ययन इस पुस्तक में साफ पता चलता है। उन्होंने अज्ञेय, मुक्तिबोध, त्रिलोचन से लेकर नए कवियों देवी प्रसाद मिश्र, नीलेश रघुवंशी, बद्रीनारायण आदि तक की कविताओं से गुजरते हुए हिन्दी कविता का एक चित्र खींचा है। बीच की पीढ़ी में लीलाधर मंडलोई, सुदीप बनर्जी, विनय दुबे, मनमोहन की कविताओं का जो मूल्यांकन किया गया है वैसा मूल्यांकन तो खालिस आलोचना की किताब में भी ढूंढना मुश्किल है।

पुस्तक में एक जगह राजेश जोशी वरिष्ठ आलोचक नामवर सिंह से जूझते हुए दिखते हैं ‘नामवर सिंह की आलोचना को हर वक्त एक बनाम की, वर्सेस की जरूरत होती है। इस बनाम को कभी खलनायक कहा गया है और कभी शत्रु’। वहीं वे मुक्तिबोध के लिए लिखते हैं कि ‘शायद मुक्तिबोध ही ऐसे पहले लेखक हैं जो अपने पाठक को प्रश्न करने को उकसाते हैं’।

राजेश जोशी की जितनी पकड़ पद्य को लेकर है उससे कहीं भी कम गद्य को लेकर नहीं है। वे गद्य और पद्य की परम्परा को मिश्रित कर साहित्य की मूल नब्ज को पकड़ना चाहते हैं। अपनी बातों को पुष्ट करने के लिए वे लगातार गद्य और पद्य में आवाजाही करते हैं। उन्होंने गद्य में प्रेमचन्द से लेकर श्रीलाल शुक्ल का गद्य, दूधनाथ सिंह का ‘आखिरी कलाम’ विश्वनाथ त्रिपाठी का ‘नंगातलाई का गांव’ स्वयंप्रकाश और शशांक की कहानियों का उल्लेख किया है। वास्तव में यह पुस्तक समकालीन साहित्य से हमें बहुत शिद्दत से रूबरू करवाती है। जो पढ़ा-गुना और उससे तत्क्षण जो मन में विचार आया उसे ज्यों-का-त्यों लिख दिया गया है इसलिए इस किताब में गजब की विश्वसनीयता है। पिछले नोटबुक की तुलना में इस नोटबुक में गद्य की किताबों को भी अपनी सीमा में समेटा गया है इसलिए यह और ज्यादा प्रासंगिक बन गया है। किताब में राजेश जोशी की भाषा बहुत अच्छी है इसलिए उसमें बहुत पठनीयता है। पूरी किताब को एक रवानगी से लिखा भी गया है और इसे उसी तरह पढ़ा भी जा सकता है।

----------------------------------------------------डॉ० उमाशंकर चौधरी  रचित साभार


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पुस्तकः- एक कवि की दूसरी नोट बुक (समकालीनता और साहित्य)

लेखकः- राजेश जोशी

प्रकाशकः- राजकमल प्रकाशन, 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, नई दिल्ली-110002

मूल्यः- 450/



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