Saturday, January 25, 2014

*** हिन्दी नवजागरण और शिक्षा-चिंतन


वजागरण कालीन साहित्यकारों,पत्रकारों और चिंतकों ने यूरोप से भारतीय संसर्ग में जिन सरोकारों पर विस्तार से विचार किया उसमें शिक्षा को पर्याप्त महत्व दिया है | यह स्वाभाविक भी था क्योंकि तुलनात्मकता की दृष्टि ने उस समय के चिंतकों का ध्यान आकृष्ट किया था जिससे शिक्षा के प्रति उनके नज़रिए का विकास हुआ | यह तब और भी रुचिकर हो जाता है जब यह बात सामने आती है कि नवजागरण के अग्रदूत यूरोपीय शिक्षा से साक्षात्कार के बावजूद उसके अंधभक्त मात्र बनकर नहीं रह गए बल्कि एक अच्छे शोधार्थी की तरह उन्होंने अपनी वैचारिक सम्पदा का विस्तार किया | ये विचार न केवल अपने समय की आलोचना को हमारे सामने रखते हैं बल्कि उनकी उपयोगिता और प्रासंगिकता आज के शैक्षिक मूल्यांकन में भी अपनी गहरी भूमिका निभाती है | जाने माने शिक्षाविद प्रो.कृष्ण कुमार अपनी पुस्तक “गुलामी की शिक्षा और राष्ट्रवाद” में औपनिवेशिक कालीन शिक्षा और समकालीन शिक्षा पर विचार करते हुए आमुख में स्पष्ट लिखते हैं :
“ हमारे स्कूलों और कॉलेजों में आज जो कुछ भी पढ़ाया जाता है उसे ‘वैध स्कूली ज्ञान’ का दर्जा एक बहुत ही ख़ास किस्म के सांस्कृतिक और आर्थिक तनाव के दौरान हासिल हुआ है, और वह था औपनिवेशिक शासन का तनाव | बीसवीं सदी के अंतिम वर्षों को प्रस्थान बिंदु बनाकर उस तनाव की सघनता का आँकलन करना आसान नहीं है जिसे भारतीय समाज ने समूची उन्नीसवीं सदी में खुद पर दर्ज किया था | न ही इस बात को मान्यता देना आसान है कि हमारे शैक्षिक संस्थान युवाओं को जो शिक्षा देते हैं , और उन्नीसवीं सदी में वैध विद्यालयी ज्ञान के रूप में जिन चीजों का चयन किया गया था ,उनके बीच कोई सीधी कड़ी जुड़ती है | यह तो तय है कि हमारी राजनीतिक स्वतंत्रता हमें भरमा कर इस सोच तक ले आती है कि भारत में स्कूली ज्ञान की मौजूदा अवधारणा पर उस तनाव के कोई चिह्न मौजूद नहीं हैं जिसे औपनिवेशिक शासन ने भारतीय समाज और और संस्कृति पर आरोपित कर रखा था|”1

                                        प्रो. कृष्ण कुमार के इस उद्धरण से जो बात सामने आती है वह यह है कि अपनी गुलामी के दौरान औपनिवेशिक नीतियों का प्रभाव हमारे पढ़ने-लिखने के विषयों और तरीकों पर हावी था और वह इतना गहन था कि उसे तनाव के रूप में स्वीकृति दी गयी है| इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात जो अधिक चिंतित करने वाली है वह यह है कि आजादी के बाद हमारी राजनीतिक स्वतंत्रता ने भी वही भूमिका निभाई जो औपनिवेशिक नीतियाँ उसके पहले निभा रही थीं | यह इस मायने में और खतरनाक है कि आजादी से पहले की चालबाजियाँ एक बाहरी शत्रु की पहचान के कारण मूर्त थीं लेकिन अब जब बात अपने घर के भीतर की हो और संकेत,चिह्न और साक्ष्य अत्यधिक  सूक्ष्म तो दोनों की नीतियों के अंतर्संबंधों को प्रमाणित करना बेहद दुष्कर कार्य हो जाता है | ज़ाहिर है कि इस शोध के लिए विस्तृत फलक और पर्याप्त समय की दरकार है लेकिन इस बहाने इस पक्ष का अवलोकन तो किया ही जा सकता है कि हिन्दी नवजागरण के रचनाकर्मियों ने स्वयं उस शिक्षा की क्या  पड़ताल की है जो उनके सामने नई यूरोपीय दुनिया के ज्ञानोदय का परिचय लेकर आयी थी | नवजागरण कालीन रचनात्मक साहित्य में अंग्रेजों और उनके कार्यकलापों और उनसे उत्पन्न होने वाली आलोचनात्मकता का परिचय तो हमें प्राप्त होता ही है लेकिन यहाँ शिक्षा पर हम विशेष रूप से कुछ  उन रचनाकारों के विचार समझने का प्रयत्न करेंगे जिनका गद्य हमें पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादकीय या अग्रलेख के रूप में प्राप्त होता है |

                                                                                          हिन्दी नवजागरण के प्रतीष्ठित पत्रकारों में प्रताप नारायण मिश्र का नाम  बहुत ही आदर और सम्मान के साथ लिया जाता है | यदि शिक्षा संबंधी इनके लेखन को देखें या विचार-संरचना का अध्ययन करें तो पता चलता है कि इनका चिन्तन मूलतः चरित्र निर्माण की पैरोकारी करता है क्योंकि इनका स्पष्ट मानना था कि तत्कालीन शिक्षा उच्च पदवियाँ तो दिलाने में सक्षम थी लेकिन उन तथाकथित शिक्षित लोगों के चाल – चलन ठीक नहीं थे | यही कारण है कि सन १८९१ में उन्होंने ‘सुचाल शिक्षा’ नाम से एक पुस्तिका लिखी जो पटना के खड्गविलास प्रेस,बाँकीपुर से प्रकाशित हुयी थी | इस पुस्तिका की भूमिका में मिश्र जी ने यह स्वीकार किया है कि बाहरी,शारीरिक या सतही विकास से मनुष्य का निर्माण नहीं किया जा सकता और जब तक उसके हृदय की आँखें नहीं खुलती तब तक उसे सही मायने में शिक्षित नहीं माना जा सकता | उनके लिए शिक्षा का अर्थ केवल खाने-कमाने के प्रशिक्षण तक सीमित नहीं था बल्कि वे भी उस मनुष्य के निर्माण का सपना उससे बुनते थे जो चरित्र में बेमिसाल हो | शिक्षा संबंधी उनकी इस संहिता से यह समझ बनती है कि उनके जेहन में अंततः एक ऐसे आदर्श मनुष्य का स्वप्न था जो स्वार्थी नहीं हो सकता था और मनुष्यता  के अपराजित स्वरुप को मूर्त करने की कल्पना से परिचालित था | लेकिन यह समझना भी अपरिहार्य है कि ऐसी कामना को किसी युग या किसी भी समय अपने मन से  साकार नहीं किया जा सकता ,इसके लिए तो बहुत बड़ी सामाजिक तैयारी और अवैक्ल्पिक अनुशासन की आवश्यकता होती है | इसलिए प्रतापनारायण मिश्र के विचार कितने ही दूरदर्शी क्यों न हों लेकिन समाज उसकी कीमत चुकाए यह आवश्यक नहीं | लेकिन यह कहने का अर्थ यह नहीं कि मिश्र जी के पास शिक्षा के प्रति आलोचना की व्यावहारिक समझ नहीं थी | संभवतः तत्कालीन शिक्षा व्यवस्था से उनका मूल विरोध उसके रोज़गार केन्द्रित मात्र होने पर था और उनका यह मानना था कि उस लक्ष्य में भी शिक्षा को लेकर कोई तार्किक तैयारी नहीं थी | अपने ‘मिडिल क्लास’ नाम के एक लेख में वे लिखते हैं कि –
“जो लोग सचमुच विद्या के रसिक हैं उन्हें तो एम.ए. पास करके भी तृप्ति नहीं होती , क्योंकि विद्या का अमृत ऐसा ही स्वादिष्ट है कि मरने पीछे भी मिलता रहे तो अहोभाग्य ! पर जो लोग कुछ क,म,घ, सीख के, पेट के धंधे से लग जाना ही इति-कर्तव्यता समझते हैं ,उनके लिए यह मिडिल की भी ऐसी छूट लगा दी गयी है झींखा करें बरसों ! नहीं तो इन बिचारे दस दस रुपया की पिसौनी करने वालों को कब जहाज पर चढ़कर जगज्जात्रा करने का समय मिलता है जो जुगराफिया रटाई जाती है ? कौन दिल्ली और लखनौ के बादशाह बैठे हैं जो अपने पूर्वजों का चरित्र सुन के खिलअत बख्श देंगे जो तारीख में समय की हत्या कर दी जाती है ? साधारण नौकर को लिखना,पढ़ना,बोलना,चालना,हिसाब,किताब बहुत है| मिडिल वाले कोई प्रोफेसर तो होते ही नहीं | इन बेचारे पेटार्थियों को विद्या के बड़े-बड़े विषयों में श्रम कराना मानों चींटी पर हाथी का हौदा रखना है |”2

                                            मिश्र जी की इन पंक्तियों से स्पष्ट है कि वे विद्यार्थियों को भी रसिक की श्रेणी में रखते हैं तथा बाकी लोगों को उनकी उपयोगिता के अनुसार शिक्षा देने में विशवास रखते हैं | देखा जाय तो वे नवजागरण काल में ही विशेषज्ञता की शिक्षा की प्रस्तावना करते हैं लेकिन उनके चिन्तन के बारे में यह समझ भी बनती है कि वे समान शिक्षा के हिमायती नहीं | एक अर्थ में विद्यार्थी का निर्माण नहीं किया जा सकता क्योंकि वह एक अखंडित इकाई है जिसे एक बार विद्या में रस आया तो वह उसे विकसित करता चला जाएगा अन्यथा वह शिक्षा के क्षेत्र में कुछ ख़ास नहीं कर सकता | उनका शिक्षा –चिन्तन यूरोपीय शिक्षा से भारतीय शिक्षा की तुलना करता है और मानता है कि वह मूलतः हास्यास्पद है क्योंकि वह कुल मिलाकर भारतीय आचार-व्यवहार को अपदस्थ करता है और सांस्कृतिक रूप से उसे गुलाम बनाकर उसके मजे लेता है और उसे कहीं का नहीं छोड़ता | जो यूरोप या अमरीका कहता है उससे अधिक प्रामाणिक,तार्किक और विश्वसनीय कुछ भी नहीं और यह वह समझाता है कि भारतीय या प्राच्य को भूलने में ही भलाई है | ऐसे पढ़े-लिखों पर प्रतापनारायण जी व्यंग की बौछार करते हैं तथा उनके समूचे आचरण को अपनी शिक्षा की आलोचना का केंद्र बनाते हैं | यहाँ तक की पाश्चात्य शिक्षा के प्रभाव में जब वे यह देखते हैं कि भारतीय लोग अपने नाम भी बदलने लगे हैं तो वे जैसे उन्हें मुहँ चिढ़ाते हुए लिखते हैं कि –
“हाँ कोई नाम पूछ बैठे तो झख मार के राम रहीम आदि के साथ दत्त प्रसाद दास गुलाम आदि जोड़ के मुंह पर लाना पड़ता है | पर इसमें अपना वश ही क्या है | वह पिता की बेवकूफी है |”3

                                               प्रतापनारायण मिश्र के व्यंग की यह बानगी हमें यह समझाने का सफल प्रयास तो करती ही है कि वे तत्कालीन शिक्षा और सांस्कृतिक बदलाव के सजग आलोचक और सूक्ष्म अध्य्येता थे | लेकिन उनके विचारों से असहमत या सहमत हुआ जा सकता है विशेष रूप से तब जब वे यह प्रस्तावित कर रहे हों कि तत्कालीन यूरोपीय शिक्षा का प्रभाव यह पड़  रहा था कि वह भीतर के मनुष्य को संबोधित नहीं कर पा रही थी और केवल बाहरी रूप से आक्रान्त कर रही थी |  

                                                                                           हिन्दी नवजागरण के अग्रदूतों में ‘सरस्वती’ के सम्पादक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने भी तत्कालीन शिक्षा को लेकर पर्याप्त चिंतन अपने लेखों में किया है जिससे यह धारणा बनती है कि औपनिवेशिक शिक्षा के आगमन ने भारतीयों को सामाजिक अध्ययन के नए सन्दर्भ प्रदान किये | मार्के की बात यह है कि कई वर्षों की लगातार गुलामी के शिकार ये लेखक निरंतर अपने समाज की आंतरिक आवश्यकताओं का मूल्यांकन करते रहे और इसमें परम्परा और अतीत कभी उनके लिए बाधा नहीं बना | इसका प्रमाण द्विवेदी जी के शिक्षा चिंतन से हमें मिलता है |  द्विवेदी जी अपने एक लेख ‘पढ़े-लिखों का पांडित्य’ में उन तमाम पढ़े-लिखों का उपहास बेहद चुटीली भाषा में करते हैं जो स्त्री-शिक्षा के विरुद्ध अपने तर्क उपस्थित करते हैं | वे अपने विरोधियों को ये समझाते हैं कि नाटक में स्त्रियों द्वारा प्राकृत बोलना उनके अनपढ़ होने का प्रमाण नहीं है | दूसरे शब्दों में वे भाषा के वर्ग बोध और उसकी अलोकतांत्रिक सत्ता को समाज से बाहर का रास्ता दिखाते हैं | अपने इस महत्वपूर्ण लेख में वे अपने समय के ठेकेदारों से लोहा लेते हैं और लिंगभेद की अवधारणा पर कुठाराघात करते हैं | पुरुषों के श्रेष्ठता बोध के भ्रम को रेखांकित करते हुए वे लिखते हैं कि –
“स्त्रियों का किया हुआ अनर्थ यदि पढ़ाने का ही परिणाम है तो पुरुषों का किया हुआ अनर्थ भी उनकी विद्या और शिक्षा का ही परिणाम समझना,बम के गोले फेंकना, नरहत्या करना, डाके डालना, चोरियाँ करना, घूँस लेना, व्याभिचार करना – यह सब यदि पढने-लिखने का ही परिणाम हो तो ये सारे कॉलेज, स्कूल, और पाठशालाएँ बंद होनी चाहिए | परन्तु विक्षिप्तों, वातव्यथितों और ग्रह ग्रस्तों के सिवा ऐसी दलील पेश करने वाले बहुत ही कम मिलेंगे |”4                               
                                       यहाँ पर द्विवेदी जी का सन्देश पाठक को स्पष्ट समझ आता है कि यदि शिक्षा के केंद्र लिंग भेद का कोई भी कार्य करते हैं या उसकी मानसिकता बनाए रखते हैं तो बेहतर होगा कि उन्हें बंद कर दिया जाए | उनकी यही सोच उन्हें नवजागरण से प्रभावित होने वाले लोगों से बहुत अलग कर देती है जो शिक्षा की भूमिका पर न तो कुछ स्वतंत्र विचार कर सकते हैं और न ही आगे आने वाली दुनिया की पहचान करते हैं | वास्तव में वे औपनिवेशिकता के सांस्कृतिक गुलाम हैं और इससे उनके जीवन में कोई आधारभूत अंतर पैदा नहीं होता कि वे सामन्तवाद की जकड़ में हों या फिर साम्राज्यवाद के नए और लुभावने जाल में फँस रहे हों | द्विवेदी जी की समालोचना का यह कर्म अनवरत चलता रहता है और वे इन शिक्षा के केन्द्रों की खबर लेने और उनका प्रसार करने में ज़रा भी नहीं सकुचाते हैं | उनके लेखों में विभिन्न शिक्षा केन्द्रों, पुस्तकालयों तथा आचार्यों के किये गए कार्यो का तत्कालीन तार्किक लेखा जोखा मिल जाता है | इस दृष्टि से उनका एक अन्य लेख उल्लेखनीय है जिसका शीर्षक है ‘बनारस के संस्कृत-कॉलेज की कुछ पुरानी बातें’ | अक्टूबर १९१६ में लिखे गए इस लेख की ख़ास बात यह है कि यह प्रमाण सहित उक्त कॉलेज की पोल खोल कर रख देता है | इससे पता चलता है कि वास्तव में शिक्षा के नाम पर गड़बड़झाले की गति उस समय में भी बेहद प्रवाहमान थी | लॉर्ड  कार्नवालिस के समय के इस ‘संस्कृत पाठशाला’ नाम के सवा सौ वर्ष पुराने कॉलेज की स्थापना द्विवेदी जी के अनुसार संस्कृत भाषा के पठन-पाठन तथा न्यायधीशों की सहायता हेतु धर्मशास्त्र के अध्ययन के लिए की गयी थी | लेकिन द्विवेदी जी ने कालान्तर में उसके अपने उद्देश्यों से भटकने और उसके अभियोगों पर पाठक की दृष्टि कुछ इस प्रकार डाली है कि –
“ उस समय नियम यह था कि आयुर्वेद और व्याकरण पढ़ाने वालों को छोड़ कर और सब अध्यापक ब्राह्मण ही हों | 1798 में कॉलेज के प्रधानाध्यापक काशीनाथ तर्कालंकार नामक एक बंगाली थे | उन्होंने और अन्य पंडितों ने भी, वेतन के कागजों पर खयाली अध्यापकों और छात्रवृत्ति पाने वाले छात्रों के नाम लिख लिख कर रुपया वसूल करना शुरू किया | बात खुल गयी | तहकीकात हुयी और ये सब लोग निकाले गए | फल यह हुआ कि इन धर्म-धुरीण पंडितों से व्यवस्था लिया जाना बंद हो गया | वेद पढ़ाने की भी मनाही हो गयी |”5

                                          इन पंक्तियों से साफ़ पता चलता है कि द्विवेदी जी जहाँ एक ओर साम्राज्यवादी शिक्षा के प्रति आलोचनात्मक रहे हैं वहीँ उन्होंने भारतीयता के किसी भी झूठे मोह को अपनी दृष्टि में स्थान नहीं दिया | उनके लेखों से यह पता चलता है कि औपनिवेशिक शिक्षा के प्रति वे सदैव जागृत रहे तथा अपने पाठकों को भी जगाते रहे लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वे अपने यहाँ की सामन्तवादी शिक्षा के प्रति उदासीन हो गए | उनका जागरण भी मनुष्य का जागरण था न कि केवल झूठे आदर्शों पर पलने वाला  जागरण | इसीलिए वे यहाँ पर अपने समय से भी सवा सौ साल पुराने शिक्षा केंद्र की जमकर खबर लेते हैं और अपने पाठकों को भी परम्परा के नाम पर चलने वाले घालमेल के प्रति चैतन्य करते हैं | इसके साथ ही उनकी पैनी दृष्टि शिक्षा और सरकार के अंतर्संबंधों पर भी जाती है और वहाँ पर आंकड़ों के माध्यम से वे अपने पाठकों को यह समझाते हैं कि सरकार भारत में शिक्षा पर इसलिए कम खर्च करती है क्योंकि यूरोप का युद्ध उसके लिए कहीं अधिक महत्वपूर्ण है | ‘शिक्षा प्रचार के लिए गवर्नमेंट का खर्च’ नाम के अपने उक्त लेख में वे एक लाजवाब वित्त-विश्लेषक की भूमिका निभाते हुए लिखते हैं कि –
“शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण काम के लिए 100 में केवल 4 रुपया खर्च करना कुछ न करने के बराबर है | तथापि संतोष इतना ही है कि पहले गवर्नमेंट इस काम के लिए जितना खर्च करती थी उससे अब अधिक करती है | इस देश में शिक्षा का यह हाल है कि एक वर्ग मील में केवल 59 आदमी किसी तरह अपना नाम या चिट्ठी गोद-गाद लेते हैं |”6

                                       द्विवेदी जी की ये पंक्तियाँ अप्रैल 1915 में प्रकाशित हुयी हैं जिससे यह समझ बनती है कि वे शिक्षा के मुद्दे को केवल स्थानीय दृष्टि से नहीं देखते थे बल्कि उनके अंतर्मन में प्रथम विश्वयुद्ध का प्रभाव मानवता के प्रश्नों के सम्मुख मौजूद था | दुनिया बदल रही थी और भारत भी उसमें भूमिका निभा सकता था इसकी समझ नवजागरण के इस सम्पादक में बेहद गहरी थी इसमें दो राय नहीं हो सकती |

                                         नवजागरण कालीन पत्रिकाओं के बहुप्रतिष्ठित लेखक माधवराव सप्रे अपने समाज वैज्ञानिक निबंधों के लिए जाने जाते हैं और उनके लेख सरस्वती,मर्यादा,प्रभा विज्ञान तथा ऐसी ही अनेक अन्य पत्रिकाओं में प्रकाशित होते थे | उनके शिक्षा चिन्तन की विशेषता यह है कि शिक्षा उनके लिए संभवतः स्वतंत्र मुद्दा नहीं रही बल्कि वे उसे आन्दोलनों का अनिवार्य हिस्सा मानते थे | ऐसा प्रतीत होता है कि वे उसे वर्ग महत्व के अनुसार स्थान देते थे जिसका प्रमाण सरस्वती में प्रकाशित उनके एक लेख ‘किसानों की शिक्षा’ से मिलता है |  माधवराव सप्रे की यह विशेषता इस लेख में दिखती है कि जब वे भारतीय किसानों की बात करते हैं तो वे विश्व के अन्य देशों के किसानों की समस्याओं की चर्चा भी करते हैं और उनके समाधानों को स्थानीय स्तर पर लागू करने के हिमायती दिखते हैं | एक अर्थ में यह एक उचित वैज्ञानिक दृष्टि लगती है क्योंकि एक तो राष्ट्रवाद के नाम पर मनुष्य भेद का निषेध दिखता है और दूसरे समस्या को समस्या की तरह देखने पर बल दिया गया है | प्रस्तुत लेख में वे डेनमार्क के किसानों कि समस्याओं का अध्ययन भारतीय किसानों की समस्याओं को ध्यान में रख कर करते हैं | अपने अध्ययन में वे पाते हैं कि जब डेनिश किसानों को उनके विषय और व्यवसाय की उचित शिक्षा दी गयी तो उनकी स्थिति बहुत सशक्त होती चली गयी | यही वह संदर्भ है जहाँ माधवराव सप्रे की शिक्षा दृष्टि उजागर होती है और पाठक को यह पता चलता है कि वे शिक्षा के व्यावहारिक पहलू के पैरोकार थे | शिक्षा का मूल्यांकन वे किसानों के संदर्भ में प्रस्तुत करते हुए लिखते हैं कि –
“ यदि देखा जाय कि डेनमार्क (पुराने) के अशिक्षित किसानों की अपेक्षा भारत के किसान कितने शिक्षित हैं तो शून्य मिलेगा | पढ़ना-लिखना तो दूर , वे फसल काटना , रोगों से उसे बचाना ,अथवा उपयुक्त समय में उसे बेचना या तो भली-भांति जानते नहीं और यदि जानते भी हैं तो उसका उपयोग नहीं कर सकते | पढ़ने-लिखने में वे निरक्षर भट्टाचार्य हैं ही | इस अज्ञता से वे तो दुःख पाते हैं, साथ ही राष्ट्र भी पंगु हो रहा है |”7

                                        कहने की आवश्यकता नहीं कि माधवराव सप्रे का  नवजागरण आभ्यन्तरिक रूप से अत्यंत सकर्मक नवजागरण है जो जमीनी हकीकत से जीवन के संघर्ष में विश्वास करता है | वे भी साम्राज्यवाद का विरोध सामन्तवाद के विरोध के साथ बड़े ही वैज्ञानिक प्रश्नों और समाधानों के साथ करते हैं | वे जानते हैं कि यदि शिक्षा का उपयोग व्यावहारिक तरीके से किया जाय तो न केवल किसान बल्कि उससे जुड़े हुए समाज की अन्य इकाइयों को भी रूपांतरित किया जा सकता है | इसीलिए वे इस लेख में किसानों के लिए भूमि सुधार की बात करते हैं तो साथ ही उनके शत्रु वर्ग की पहचान भी उसी मुस्तैदी के साथ करते हैं | सब मिलाकर उनके लिए शिक्षा केवल पढ़ने-लिखने या साक्षरता मात्र का साधन नही बल्कि बुनियादी समस्याओं का समाधान भी है |

                                           काशी नागरीप्रचारिणी सभा के संस्थापक सदस्य तथा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के प्रथम अध्यक्ष डॉ. श्यामसुन्दर दास के नाम से शिक्षा जगत अपिरचित नहीं है | उनके प्रकाशित लेखों और निबंधों में शिक्षा के लिए दूरगामी चिन्तन देखने समझने को मिलता है | यदि यह देखा जाए कि उनके शिक्षा चिन्तन का मूल आधार क्या है तो पता चलता है कि एक तो वे शिक्षा की माध्यम भाषा के रूप में हिन्दी के अनन्य पक्षधर थे तो दूसरी बड़ी बात यह मिलती है कि स्वयं शिक्षक होने के नाते वे पाठ्यक्रम निर्माण जैसे विषयों के प्रति विशेष लगाव रखते थे और इस दृष्टि से अपने समय की शैक्षिक गतिविधियों पर आलोचनात्मक टिप्पणी किया करते थे | अन्य शब्दों में वे न केवल साहित्य और भाषा के कुशल और महत्वपूर्ण अध्य्येता थे बल्कि उन्हें नवजागरण काल का सक्रीय शिक्षाकर्मी कहने में किसी को कोई संकोच नहीं होना चाहिए | इसके साथ ही शिक्षा जगत मे उनकी भूमिका एक गहन शोधकर्मी की भी थी जिन्होंने आगे चलकर डॉ. पीताम्बर दत्त बड़थवाल जैसे कुशल शोधार्थी देते हुए हिन्दी में शोध कार्य की सशक्त परम्परा निर्मित की| हिन्दी भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाने के पीछे उनका उद्देश्य यह था कि वे शिक्षा को अधिक से अधिक व्यापकता और प्रामाणिकता प्रदान करना चाहते थे | लाहौर के दयानंद एंग्लो वैदिक कॉलेज की वार्षिक रिपोर्ट का विश्लेषण करते हुए उन्होंने सरस्वती में प्रकाशित अपनी एक टिप्पणी में लिखा है कि –
“ इस कॉलेज और स्कूल में हिन्दी सब बालकों को पढ़ाई जाती है , पर जहाँ तक हमें ज्ञात है, उपयुक्त पुस्तकों का प्रबंध यहाँ नहीं है , और यह बात कॉलेज के प्रबन्धकर्ताओं और आर्यसमाज के लिए लज्जा की है | हमें विशवास है कि कॉलेज के अधिकारीगण इस ओर ध्यान देंगे और इस अभाव की पूर्ती के लिए पूर्ण उद्योग करेंगे |”8

                                          श्यामसुन्दर दास के प्रस्तुत उद्धरण से यह प्रतिष्ठित होता है कि किसी भी शैक्षिक कार्य की समालोचना में हिन्दी की भूमिका उनका प्रमुख प्रतिमान थी और यदि इस दृष्टि से उन्हें कोई कमी समझ आती थी तो वे खुलकर उसकी चर्चा अपने लेख में करते थे|यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य है कि पाठ्य पुस्तक की कमी को वे पूरे आर्यसमाज के चरित्र से जोड़कर प्रस्तुत कर रहे हैं जैसे चेता रहे हों कि यदि पुस्तक का कार्य शीघ्र गति से नहीं किया गया तो यह किसी राष्ट्रीय क्षति से कम नहीं होगा | बाबू श्यामसुन्दर दास के शिक्षा संबंधी लेखों में इस प्रकार का चिन्तन अक्सर व्यक्त होता है जिसमें राष्ट्रीय चरित्र के निर्माण का संबोधन हो | अपने एक अन्य महत्वपूर्ण लेख ‘एज्युकेशन कमीशन और शिक्षा’ में वे यह चिंता रेखांकित करते हैं कि भारत में पाँच विश्वविद्यालय हैं और उनमें पठन पाठन और नियमों की कोई एकरूपता नहीं मिलती | ऐसी स्थिति पर वे उपहास ही कर रहे होते हैं जो अपने समय का तर्क लिए हुए है | वे कहते हैं कि यदि एक विद्यार्थी एक विश्वविद्यालय से दूसरे में पढ़ने जाता है तो उसे शिक्षा की भिन्न रीतियों का सामना एक ही देश में करना पड़ता है जिससे मूलतः चरित्र की स्थिरता नहीं बन सकती | देखा जाय तो वे शिक्षा में खंडित व्यक्तित्व का पुरजोर विरोध करते हैं | इसी संदर्भ में वे तत्कालीन उपलब्ध पुस्तकों की आलोचना करते हुए इसी लेख में लिखते हैं कि –
“जो पुस्तकें आजकल पढ़ाई जा रही हैं, वे ऐसी रद्दी हैं कि उनसे लाभ की कोई आशा ही नहीं की जा सकती | हमारी समझ में एंट्रेंस तक साहित्य संबंधी पुस्तकें नियत ही न की जाएँ वरन यह स्थिर कर दिया जाय कि लड़के की ऐसी योग्यता होनी चाहिए | अनुवाद और लेख लिखने पर अधिक ध्यान दिया जाए और इतिहास आदि पुस्तकें न नियत होकर विभाग नियत कर दिए जाएँ | इससे बड़ा भारी लाभ यह होगा कि लड़कों की रटने की बान छूट जायेगी और अध्यापकों को भी कुछ पढ़ना होगा और अपने लेकचर पहले से तैयार करने पड़ेंगे , और तब पठन पाठन का विशेष लाभ होगा |”9

                                          एक बार फिर यहाँ पर बाबू श्यामसुंदर दास ने खुलकर विद्यार्थियों के साथ ही साथ अध्यापकों की खबर लेते हुए पाठकों के समक्ष यह बात रख दी कि तत्कालीन शिक्षा व्यवस्था रटने-रटाने और कर्तव्य निपटाने की प्रवृत्ति से जूझ रही है | यह बात इस प्रामाणिकता के साथ बाबू साहब इसीलिए कह सके क्योंकि उनकी यह विशेषता थी की वे स्वयं एक जागरूक शिक्षक थे और शिक्षा को सिर्फ नौकरी की तरह नहीं लेते थे | वे सिर्फ साधारण शिक्षक नहीं थे बल्कि शिक्षक होने की वजह से शिक्षा जगत के नवजागरणकालीन बहुमूल्य चिंतक थे | उनके शिक्षा चिंतन का दायरा इसी कारण उन कारकों पर जाकर ठहरता है जिससे विद्यार्थी और अध्यापक का सामना हर दिन होना ही है | वह इसीलिये व्यापकता के साथ पाठक को गहरी यात्रा कराता है | लेकिन उनका शिक्षा चिन्तन बहुत गहरे स्तर पर आर्यसमाज की मान्यताओं और स्थापनाओं से जुड़ा हुआ लगता है | इसका अर्थ यह है कि डॉ. श्यामसुन्दर दास मौलिक रूप से सांस्थानिक चिन्तन और उसके क्रियान्वयन के प्रबल पक्षधर के रूप में अपना स्थान बनाते हैं | वे भारतीयता की आधुनिकतावादी संरचना का निर्माण बिना अतीत को छोड़े करना चाहते हैं और उसमें वे सबसे महत्वपूर्ण भूमिका हिन्दी और शिक्षा की ही मानते हैं | यही कारण है कि जब वे शिक्षा पर अपने विचार रखते हैं या उस पर चिन्तन करते हैं तो उनके विषय कई बार सूक्ष्म उपविषयों को उभारने का काम करते हैं जिससे उनकी पैनी दृष्टि का गहन परिचय प्राप्त होता है | इसका प्रमाण तब दिखता है जब अपने शिक्षा संबंधी एक अन्य लेख ‘हिन्दी पाठ्यपुस्तकों की भाषा’ में बाबू साहब शिक्षा में बोलचाल या साधारण उपयोग की हिन्दी के बजाय उसके विविध रूपों के प्रयोग-उपयोग का समर्थन करते हैं | इस लेख में वे शिक्षा में साधारण हिन्दी के समर्थकों को नवजागरण की परम्परा और अतीतप्रियता के आधार पर यह संबोधित करते हैं कि यदि छात्र हिन्दी पढ़ कर भी सूर, तुलसी, बिहारी, केशव और चंद की भाषा नहीं समझ सकता तो उसके पढ़ने-लिखने का कोई अर्थ नहीं है | इससे यह समझ बनती है कि डॉ.श्यामसुन्दर दास आधुनिक हिन्दी के बोध और निर्माण प्रक्रिया में आदिकालीन हिन्दी और मध्यकालीन हिन्दी की विशेष भूमिका मानते हैं | उक्त लेख में उनके भविष्य-दृष्टि का पता भी चलता है जब वे कविता की भाषा में नए प्रयोगों को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने के लिए आतुर दिखते हैं | यह समकालीन दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आज भी हिन्दी के पाठ्यक्रमों में यह दृष्टि स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है | लेकिन संभवतः पाठ्यक्रम निर्माण की सबसे बड़ी चुनौती वर्तमान और भविष्य का समायोजन होता है क्योंकि वहाँ पर समकालीनता के आधार पैर चुनने की समस्या होती है | कई बार तो वह पाठ्य-सामग्री भी उपलब्ध नहीं होती जो वर्तमान या भविष्य से क्लासरूम में संवाद स्थापित कराने में उपयोगी हो | इस दृष्टि से उक्त लेख में बाबू साहब की निम्नलिखित पंक्तियों का अवलोकन अपरिहार्य हो जाता है –
“ हम कई बेर लिख चुके हैं कि प्राचीन काल में हिन्दी का गद्य और पद्य दोनों ब्रजभाषा में था, परन्तु अब गद्य की भाषा निराली हो गयी है और वह अब बोली तथा लिखी भी जाती है | इसलिए यह आवश्यक है कि पद्य की रचना भी उसी भाषा में हो जिसमें गद्य लिखा जाता है | हम हिन्दी के प्रसिद्ध प्रसिद्ध कवियों से यह प्रार्थना करते हैं कि वे बालकों के लिए खड़ी बोली में पद्य रच कर इस अभाव की कुछ अंश में पूर्ती कर दें |”10

                                         यहाँ देखा जा सकता है कि कविता की भाषा और शिल्प में आते हुए नए संरचनात्मक बदलावों के प्रति डॉ. श्यामसुंदर दास इतने सम्वेदनशील हैं कि वे कवियों से शिक्षात्मक पूर्ती के लिए रचनाओं का आवेदन कर रहे हैं | इस आवेदन के साथ इसी लेख में वे पद्य लिखने के लिए श्रीधर पाठक का आदर्श स्थापित करते हुए उनके सत्रह पदों का उदाहरण भी रखते हैं | यह न केवल उनके भीतर के आलोचक की सजगता को दर्शाता है बल्कि उस शिक्षा चिंतक की दृष्टि को भी स्थापित करता है जो औपनिवेशिक काल में नवजागरण की शक्ति को रेखांकित करती है |

                                                                                              बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक तथा महामना की उपाधि सी संबोधित किये जाने वाले अग्रणी शिक्षाकर्मी, पत्रकार और चिंतक प. मदनमोहन मालवीय के शिक्षा चिन्तन पर दृष्टि डाली जाये तो पता चलता है कि उनके चिन्तन का केन्द्रीय आधार है शिक्षा में भारतीय समाज की आत्म निर्भरता | यहाँ आत्म निर्भरता का अभिप्राय अपने बल और अपने संसाधनों पर अपनी शिक्षा के लिए संघर्ष करने और एक समांतर व्यवस्था निर्मित करने से है | उनके लेखन से पता चलता है कि इस मामले में वे इटली के एक प्रसिद्द और प्रतिष्ठित व्यक्तिव मेंजिनी से प्रभावित थे और वे स्वयं उन्हें महात्मा की उपाधि से संबोधित करते हैं | स्वयं मेंजिनी को देशी विद्रोहियों की वजह से इटली से विलायत निर्वासित होना पड़ा था और जब वहाँ उन्हें यह पता चला कि अँगरेज़ इतालवी बच्चों को खरीदकर उनसे बेगारी करवाते हैं तो उन्हें बहुत दुःख पहुँचा | इसके बाद उन्होंने संकल्प लिया कि वे उन बच्चों को शिक्षा देंगे | इस संकल्प की पूर्ती के लिए उन्होंने किसी से कोई भिक्षा नहीं माँगी बल्कि अपनी कमाई के अंश से संसाधन जुटाकर उन बच्चों को पढ़ाना शुरू किया | इसका प्रतिफलन यह हुआ कि उन बच्चों में गुलामी के प्रति जागरूकता आयी और उन्होंने खुद अपने मालिकों से छुटकारा पाया और मालवीय जी के अनुसार ये बच्चे अपने देश की स्वतंत्रता के लिए वापस इटली भी रवाना हुए | कहने की आवश्यकता नहीं की इस प्रसंग से नवजागरण, शिक्षा और स्वतंत्रता का वही अन्तर्सम्बंध उजागर होता है जो मालवीय जी के शिक्षा चिन्तन का आधार है | इसके साथ यह भी समझ बनती है कि बनारस हिन्दू विश्विद्यालय बनाने के पीछे मालवीय जी की आत्म निर्भरता की यही अवधारणा काम कर रही थी | सन 1933 के ‘सनातनधर्म’ में छपे ‘हमारी शिक्षा’ शीर्षक के सम्पादकीय में सरकार पे निर्भर न होने और अपने समाज के बल पर शिक्षा को स्थापित करने के पक्ष में वे लिखते हैं कि -       
“जिन देशवासियों से सरकार एक अरब से कुछ अधिक धन वार्षिक वसूल करती है, उनकी शिक्षा के लिये इतना कम खर्च करना न्याय है अथवा अन्याय, इसे हमारे पाठकगण स्वयं सोच लें | यह तो हुयी सरकार की बात , परन्तु स्वयं इस देश के राजा, महाराजा, सेठ, साहूकार, धनी लोग जो अपना समय सुखपूर्वक आनन्द से व्यतीत करते हैं, वे अपने देशवासियों की शिक्षा का कहाँ तक उपाय करते हैं ? भाँति – भाँति  के विषय-भोग अथवा अपनी शान-शक्ति के लिए वे चाहे जितना धन फूँक दें, परन्तु अपनी संतान की शिक्षा के लिए आवश्यक धन खर्च करना उनको अत्यंत अखरता है |”11

                                        यहाँ पता चलता है कि मालवीय जी सरकार से कोई अपेक्षा नहीं करते थे बल्कि अपने पाठकों को यह समझाते हैं कि अंग्रेजों से उन्हें भी शिक्षा के लिए कोई उम्मीद नहीं करनी चाहिए | लेकिन एक अन्य मार्के की बात जो वे बताते हैं वह यह है कि जो लोग सरकार को टैक्स देते हैं वही लोग स्थानीय स्तर पर भी यदि तन, मन और धन से जुट जाएँ तो धीरे-धीरे भारत में शिक्षा की स्थिति में गुणवत्ता के साथ सुधार लाया जा सकता है | अगर इसके साथ बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना का इतिहास जोड़ दिया जाए तो मालवीय जी के शिक्षा चिन्तन की सारी कथा आप ही समझ आ जाती है | आत्म निर्भरता ही शिक्षा के लिए जैसे उनका मूल मन्त्र है | इसकी साथ ही यह जानने की आवश्यकता है कि मालवीय जी के शिक्षा-चिन्तन में स्त्री-शिक्षा का समावेश बहुत ही तार्किक ढंग से हुआ है | वास्तव में स्त्री-शिक्षा पर मालवीय जी का चिन्तन उन लोगों के लिए एक जवाब है जो उनके समय स्त्री-शिक्षा के विरुद्ध थे और जिनका तर्क यह था कि यदि स्त्रियों को पुरुषों की तरह शिक्षित किया जाएगा तो समाज और घर में एक असंतुलन पैदा हो जाएगा | घर के काम, बच्चे पालने और अतिथियों के आदर सत्कार जैसे कामों में बाधा उत्पन्न हो जायेगी | सारा घर जंगल में तब्दील हो जाएगा | इसीलिये उनको केवल उतना ही शिक्षित किया जाए जितना घर चलाने के लिए ज़रूरी हो | ऐसे लोगों की मानसिकता को दुरुस्त करते हुए मालवीय जी ने ‘सनातनधर्म’ के सम्पादकीय ‘स्त्री-शिक्षा’ में स्पष्ट लिखा है कि जो शिक्षा पुरुषों को सर्वश्रेष्ठ बनाती है वह स्त्रियों को गलत रास्ते पर कैसे ले जायेगी और कैसे उन्हें विवेकरहित और अज्ञानी बना देगी ! लेकिन इस तर्क के पीछे अपने समय के अनुसार मालवीय जी जो उदाहरण देते हैं वे अच्छे खासे स्त्री-शिक्षा विरोधियों को निरुत्तर करने में सक्षम है | अपने उक्त सम्पादकीय में मालवीय जी लिखते हैं कि –
“भारत बन्धु फासेट साहब की कन्या ने केम्ब्रिज विश्वविद्यालय की सर्वोच्च गणित-परीक्षा में उच्च पड़ लाभ किया, परन्तु वह बात कभी सुनने में न आयी कि गणितशास्त्र के उच्च ज्ञान से स्त्रियों की प्रकृति-सुलभ कोमलता से वह वंचित हो गयी हो | वैज्ञानिक क्यूरी साहब, जिन्होनें रेडियम धातु का आविष्कार करके सारे जगत् को अपने आश्चर्य-कार्य से चकित कर दिया है वह उनकी और उनकी विदूषी स्त्री के सम्मिलित परिश्रम का फल है | इस आविष्कार में किसने अधिक परिश्रम किया, यह बताना कठिन है | परन्तु तो भी यह बिना कहे नहीं रहा जाता कि यदि उनकी स्त्री उच्च हृदय नहीं रही होती तो वैज्ञानिक क्यूरी क्या उनसे किसी प्रकार की सहायता पा सकते थे ? क्यूरी की शोचनीय मृत्यु के पश्चात भी उसे विद्वान लोगों ने उसके पति के आसन पर आरूढ़ किया और उसने अपना सारा जीवन विज्ञान के अनुशीलन में व्यतीत किया | परन्तु क्या वह ऐसा करने में पत्नी अथवा माता के कर्तव्य-पालन में अशक्त हो गयी थी ?”12   

                                           स्त्री और शिक्षा के इस सम्बन्ध को उजागर करने के पश्चात मालवीय जी उक्त सम्पादकीय में इस बात पर भी चर्चा करते हैं कि दरअसल शिक्षा स्त्री को कमजोर नहीं बल्कि सशक्त बनाती है | अपितु वे इसे स्त्री और पुरुष के संबंधों के नए आधार के रूप में देखते हैं | इसके लिए वे महादेव और गंगा का रूपक देते हैं जिसमें वे यह बताने का प्रयास करते हैं कि जैसे शिव के मस्तक से गंगा प्रवाहित होकर भूमि को उर्वर बनाते हुए सागर में विलीन हो जाती हैं वैसे ही शिक्षा के प्रवाह से स्त्री हमारी सामाजिक शक्ति को उर्वर बनाती है और हमारे जातीय जीवन की रक्षा करती है | स्पष्ट होता है कि प. मदनमोहन मालवीय का शिक्षा चिन्तन सनातनता और आधुनिकता को सम्मिलित कर चलने का हिमायती है और वह हिन्दी नवजागरण को इसी राह पर लाना चाहता है |

                                                                                        सरस्वती, प्रभा, अभ्युदय तथा प्रताप जैसे पत्रों से लगातार लेखन करने वाले नवजागरण काल के पत्रकारों में गणेशशंकर विद्यार्थी का नाम कभी भुलाया नहीं जा सकता क्योंकि वे जो लिखते-पढ़ते थे उसके लिए उन्होंने अपने जीवन का बलिदान तक दे दिया था | सन 1931 में साम्प्रदायिक दंगों के अवरोध में उनका निधन हो गया था और साम्प्रदायिकता के विरोध के प्रति वे वचनबद्ध पत्रकार थे | इसीलिये इसमें दो राय नहीं हो सकती कि उनके द्वारा अन्य विषयों के लेखन में भी भारत का इतिहास या उसकी सामग्री देखी जा सकती है | शिक्षा चिन्तन से सम्बंधित उनका एक लेख ‘राष्ट्रीय शिक्षा’ के शीर्षक से प्रताप में प्रकाशित होने की बात की गयी है | यह लेख सही मायने में शिक्षा को लेकर नवजागरण का आधुनिक परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत करता है और शिक्षा के व्यापक संदर्भों को संबोधित करता है | सबसे अलग बात जो इस लेख के माध्यम से गणेशशंकर विद्यार्थी लिखते हैं वह औपनिवेशिक शासन के दौर में ही नागरिक या मनुष्य को मानव संसाधन के रूप में पहचानने की है | यह उनकी प्रगतिशील दृष्टि का परिचय देता है | वे देश की पहचान में जब प्राकृतिक संपत्ति की बात करते हैं तब शिक्षा के संदर्भ में वे देश की मानसिक और नैतिक संपत्ति की नई समझ भी प्रस्तावित करते हैं | वे ‘राष्ट्रीय शिक्षा’ नाम के अपने इस महत्वपूर्ण लेख में लिखते हैं कि-
“हमें यह भी स्मरण रखना चाहिए की राष्ट्रीय जीवन तथा राष्ट्रीय उन्नति के लिए देश की प्राकृतिक संपत्ति को उन्नति देने की अपेक्षा देश की मानसिक तथा नैतिक संपत्ति को उन्नति देना अधिक पूर्व का तथा कहीं अधिक आवश्यक कार्य है | राष्ट्र के बालक तथा बालिकाएँ ही राष्ट्र की मानसिक तथा नैतिक संपत्ति हैं और यह संपत्ति राष्ट्र की प्राकृतिक संपत्ति की अपेक्षा कहीं अधिक मूल्यवान तथा कहीं अधिक महत्व की है |”13

                                         इस संपत्ति की पहचान कराने के साथ ही विद्यार्थी जी यह भी बताते हैं की औपनिवेशिक काल में केवल वे ही देश अपना अस्तित्व बचा सकते हैं जो इसकी रक्षा और पोषण के लिए प्रयत्नशील रहेंगे | इसके विपरीत जो राष्ट्र अपने मानसिक संसाधन के विकास के लिए उद्योग नहीं करेंगे या प्रयत्नशील नहीं रहेंगे धीरे-धीरे वे भविष्य के नक़्शे से मिटते चले जायेंगे| इस संदर्भ में वे दक्षिण अफ्रीका का उदाहरण भी देते हैं और उसकी आलोचना करते हुए बताते हैं कि अपने मानसिक संसाधनों तथा शिक्षा की अवहेलना के चलते वहाँ के नागरिक सोने की खाने होते हुए भी गुलामों का जीवन जीते हैं जबकि उनके सोने का उपयोग कर युरोप और कनाडा के लोग शिक्षित लोग आनन्द का जीवन व्यतीत कर रहे हैं | इससे यही धारणा बनती है कि विद्यार्थी जी का शिक्षा चिन्तन भी बहुत व्यावहारिक मनुष्य के निर्माण की अपेक्षा करता है और अपनी आलोचना में इसे अपना मापदंड बनाता है | शिक्षा को लेकर अपने इस लेख में विद्यार्थी जी एक अन्य महत्वपूर्ण दिशा में पाठक को ले जाते हैं जब वे शिक्षित भारतीयों से अपने देश के लोगों को पढ़ाने के लिए संसाधन और श्रम के योगदान की मांग करते हैं | इस मामले में वे शिक्षा की संस्कृति को वर्ग और वर्ण पर हावी होते देखना चाहते हैं | वे शिक्षित नौजवानों से जिन शब्दों में शिक्षा कर्म के लिये निवेदन करते हैं वे इस प्रकार हैं –
“यदि देश का प्रत्येक शिक्षित युवक ऊँच-नीच के घृणित विचारों को छोड़कर अपने आसपास रहने वाले चार बालकों अथवा बालिकाओं को भी प्रतिवर्ष अशिक्षित से शिक्षित बना देने का संकल्प कर लेवे तो परिणाम अत्यंत उत्साहवर्धक हो |”14

                                          इन पंक्तियों से ज्ञात होता है कि विद्यार्थी जी का शिक्षा चिन्तन भारत को वर्गहीन और वर्णहीन समाज के रूप में देखना चाहता था जिससे राष्ट्रीय भावना भी साम्राज्यवाद के साथ ही साथ सामन्तवाद से लोहा लेने में और सशक्त ही होती | लेकिन नवजागरण के एक सजग प्रहरी होने के नाते उनकी अध्ययन क्षमता केवल स्वप्न पर आधारित नहीं थी और वे अच्छी तरह जानते थे कि भारतीय समाज से तमाम भेद भाव मिटाना आसान नहीं है बल्कि संभवतः उन्हें यह अहसास भी था कि शिक्षा के द्वारा भी भेद पैदा करने का काम किया जा सकता है | यह भी उनके शिक्षा चिन्तन की अनन्य विशेषता है जिसका परिचय पाठक को उनके इस लेख से गुजरते हुए मिलता है |  जहाँ सैद्धांतिक रूप से गणेशशंकर विद्यार्थी का मानना है कि देश के लोगों को शिक्षा के साथ धर्म, जाति और वर्ग से सम्बद्ध नहीं होना चाहिए और एक उदार नीति अपनाते हुए राष्ट्र को जल्दी से जल्दी एक इकाई में रूपांतरित करना चाहिए वहीँ वे व्यावहारिक रूप से इस सिद्धांत के प्रति बेहद सजग रवैया अपनाते हैं और सिर्फ नियम,रीति,आदर्श की दुहाई देने तक अपने को सीमित नहीं रखते | शिक्षा और धर्म के अन्तर्सम्बन्ध को लेकर वे उक्त लेख में लिखते हैं –
“यदि हिन्दू धर्म की शिक्षा से अभिप्राय आवागमन इत्यादि हिन्दुओं के दार्शनिक सिद्धांतों की शिक्षा से है तो भी प्रामाणिक रूप में, इन सिद्धांतों की शिक्षा देना विद्यार्थियों की तर्कशक्ति, उनकी मानसिक स्वतंत्रता तथा व्यक्तित्व का नाश कर देना होगा | किन्तु यदि हिन्दू धर्म की शिक्षा से अभिप्राय सच बोलना, चोरी न करना इत्यादि केवल आचार तथा नैतिक विषयों की शिक्षा से है तो हमारी समझ में यह नहीं आता कि हिन्दू-धर्म की शिक्षा, जैन-धर्म की शिक्षा तथा सिख धर्म की शिक्षा में भेद क्यों किया जाता है ? हमें इन धर्म अथवा मतों में से कोई भी ऐसा दिखाई नहीं देता जो सदाचार की प्रशंसा और दुराचार की निंदा न करता हो |”15

                                         गणेशशंकर विद्यार्थी जी के ये शब्द शिक्षा से सम्बन्धित दो महत्वपूर्ण मुद्दों को उठाते हैं | एक तो यह की धर्म का शिक्षा से कोई सम्बन्ध होना  चाहिए या नहीं क्योंकि धर्म की अतार्किकता बच्चों या विद्यार्थियों को पुरातनपंथी बना सकती है,यह सवाल आज भी हमारे जेहन में राजनीति को लेकर अक्सर उठता है | दूसरा मुद्दा जो यहाँ विद्यार्थी जी उठाते हैं वह संभवतः किसी एक धर्म या उससे सबंधित संस्कृति के शिक्षा के ऊपर वर्चस्व से है | मार्के की बात यह कि इन सवालों के साथ वे नैतिकता के पक्ष में पूरी तरह अखंडित रूप से खड़े दिखाई देते है और शिक्षा को भी इसी मार्ग पर ले जाना चाहते हैं | इसीलिये वे आगे इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि शिक्षा में सदाचार तो सिखाना ही चाहिए लेकिन वह किसी धर्म, पंथ या सम्प्रदाय से आये यह कतई ज़रूरी नहीं | गणेशशंकर विद्यार्थी जी की यह सोच अपने समय से आगे की थी जब लोग और नेता धर्म को आधार पर राष्ट्र निर्माण में संलग्न थे |   
   
                                                                                            क्रांतिकारियों के मध्य प्रशिक्षित हिन्दी के प्रसिद्ध पत्रकार तथा ‘आज’ के यशस्वी सम्पादक बाबूराव विष्णु पराड़कर की भूमिका पत्रकारिता के क्षेत्र में मील का पत्थर मानी जाती है | कहते हैं कि पाठकगण उनके लिखे हुए सम्पादकीय की प्रतीक्षा किया करते थे और जनमत निर्माण में उनके विचारों का दखल अनिवार्य माना जाता था | उनके सम्पादन में न केवल  विचारों की स्थापनाएँ होती थीं बल्कि उसके द्वारा हिन्दी के पत्रकारों की पीढ़ियों का निर्माण भी सुनने- समझने को मिलता  है | पराड़कर जी के शिक्षा-चिन्तन के दो सरोकार उभर कर पाठक के सामने आते हैं | शिक्षा की भाषा को लेकर उनका चिन्तन मूलतः हिन्दी की पक्षधरता का हिमायती है | लेकिन इसका अभिप्राय यह नहीं है कि वे अंग्रेज़ी या अन्य भाषाओं के विरोधी हैं | उनका यह मानना है कि अंग्रेज़ी का अध्ययन एक भाषा के विषय के रूप में होना चाहिए लेकिन अन्य विषयों के माध्यम के रूप में उसका निषेध होना चाहिए | वे इसके दो कारण मानते हैं | पहला तो यह कि अंग्रेज़ी जब विषयों के माध्यम के रूप में उपयोग में लाई जाती है तो वह लोगों के सर पर चढ़ जाती है और युवकों की बुद्धि को कुंठित कर देती है | संभवतः पराड़कर जी के इस कथन का अभिप्राय औपनिवेशिक भाषा की सांस्कृतिक साम्राज्यवादी प्रकृति से है जो स्थानीयता का दलन करती है | लेकिन यहाँ फिर यह याद रखना आवश्यक है कि वे भाषा के स्तर पर अंग्रेज़ी के विरोधी नहीं हैं बल्कि यह मानते हैं कि उसके अलावा अन्य यूरोपीय भाषाओं का अध्ययन भी होना चाहिए | माध्यम भाषा के रूप में अंग्रेज़ी-विरोध का दूसरा कारण पराड़कर जी के अनुसार मातृभाषा की उपेक्षा है | सितम्बर, 1937 के ‘आज’ में प्रकाशित अपने  सम्पादकीय ‘हिन्दुस्तानी द्वारा शिक्षा’ में इस परिप्रेक्ष्य का विस्तार करते हुए वे लिखते हैं –
“आजकल के स्कूलों में अंग्रेज़ी की जरा-जरासी  भूल पर लड़कों को दण्ड दिया जाता है, शिक्षक भी डपटे जाते हैं पर हिन्दी की पाठ्य-पुस्तकें भूलों से भरी रहती हैं, स्वयं सिखानेवाले एक पत्र भी शुद्ध नहीं लिख सकते – यहाँ तक कि नाम भी अशुद्ध लिख जाते हैं | आचार्यों और अध्यापकों की हिन्दी देखने का दुर्भाग्य हमें नित्य प्राप्त होता है और देखकर रुलाई आती है | इसका कारण यह है कि यहाँ मातृभाषा ‘सेकेण्ड लैंगुएज’ है और अंग्रेजी मुख्य | जो हिन्दी की पाठ्य-पुस्तकें चुनते है उनमें भी बहुत कम हिन्दी जानते हैं | हिन्दी की यह उपेक्षा भी अंग्रेजी को शिक्षा का माध्यम न रहने देने का एक कारण है और बहुत बड़ा कारण है | हम हृदय से आशा करते हैं कि कांग्रेसी सरकार इस सुधार में बिलकुल विलम्ब न होने देगी |”16

                                          यहाँ पर पराड़कर जी ने उस शैक्षिक माहौल का उल्लेख किया है जो बताता है कि उस समय भी हिन्दी को लेकर एक हीन भावना काम करती थी और अंग्रेजी को औपनिवेशिक भाषा होने के कारण गुलामी की मानसिकता के तहत श्रेष्ठता बोध के भ्रम में स्वीकार किया जाता था | शिक्षकों को डाँटने का संदर्भ भाषा, राजनीति और सत्ता के समीकरण की ओर इंगित करता है जिससे यह साबित होता है कि सत्ता के वर्चस्व के साथ भाषा की स्वीकार्यता जुड़ी हुयी थी और इस प्रकार शिक्षा के माध्यम के रूप में भाषा वर्गभेद का महत्वपूर्ण कारण थी | द्वीतीय भाषा का यह सिद्धांत हिन्दी के प्रति निराशा भाव को पनपाने में मारक का काम करता होगा और इसीलिये हिन्दी नगण्यता और लापरवाही का शिकार बन जाती होगी | पराड़कर जी यह अच्छी तरह समझते थे कि जब तक समांतर सत्ता के प्रयास नहीं होते तब तक मातृभाषा को स्थापित नहीं किया जा सकता और यही कारण है कि वह तत्कालीन कॉंग्रेस से इस क्षेत्र में बदलाव की उम्मीद कर रहे हैं | इस संदर्भ में यह भी उल्लेखनीय है कि पराड़कर जी शिक्षा की भाषा के रूप में हिन्दुस्तानी के बजाय हिन्दी के प्रबल पक्षधर थे | इसके साथ ही पराड़कर जी ने ‘आधारभूत शिक्षा’ अथवा ‘बुनियादी शिक्षा’ पर अपने विचार प्रकट किये हैं जो संयुक्त प्रांत के तत्कालीन शिक्षा मंत्री डॉ. सम्पूर्णानन्द जी द्वारा प्रस्तावित एक शैक्षिक योजना थी | वे इस योजना के पक्ष में लिखते हैं क्योंकि यह उस समय की दो अलग शिक्षा व्यवस्थाओं- वर्नाक्युलर और एंग्लो वर्नाक्युलर के विकल्प के रूप में प्रस्तुत की गयी थी | यह प्राथमिक स्तर पर समान शिक्षा की योजना थी और इसकी सबसे बड़ी विशेषता मातृभाषा में शिक्षा प्रदान करना  थी | इसमें परीक्षा व्यवस्था पर अत्यधिक बल नहीं था और यह छात्र की प्रकृति का मूल्यांकन कर उसके भविष्य का निर्णय लेने की बात इसमें की गयी थी | खास बात यह थी कि इस नई पद्धति के अनुसार शिक्षकों के प्रशिक्षण का प्रावधान भी इसमें किया गया था | अन्य शब्दों में यह उस वैकल्पिक शिक्षा की प्रस्तावना थी जो पराड़कर जी तत्कालीन सरकार से चाह रहे थे | इससे लिए वे इस योजना को शिक्षा के क्षेत्र में क्रान्ति का आरम्भ मानते हैं |

                                        नवजागरण के विभिन्न अग्रदूतों और चिंतकों के शिक्षा पर किये गए चिन्तन के इस संक्षिप्त अध्ययन से यही स्थापित होता है कि उन्होंने शिक्षा के महत्व को न केवल दर्शन के स्तर पर पहचाना था बल्कि वे कई मामलों में उसके समालोचक की भूमिका भी निभा रहे थे | शिक्षा के उनके सरोकार आज भी हमें समकालीन आलोचना दृष्टि निर्मित करने में अत्यंत सहायक सिद्ध होते हैं | उनके चिन्तन की प्रासंगिकता हमें आज भी इस रूप में जागृत करने के लिए सक्षम लगती हैं कि आज भी उन पर परम्परा का निर्माण किया जा सकता है जिसके लिए रूचि और आन्दोलन की आवश्यकता है |  यह नही कि शिक्षा संबंधी समकालीन मुद्दे नवजागरण कालीन मुद्दों से अलग नहीं होंगे | आज की समस्याएँ अपना अलग व्यक्तित्व गढ़ती हैं और संभवतः नैतिकता के पतन अथवा केवल रोज़गार और स्टेटस सिम्बल होने के कारण आम लोगों में उसके प्रति उदासीनता का भाव बढ़ा है | छात्रों और शिक्षकों की अभूतपूर्व समस्याएँ अक्सर समाचार का हिस्सा बनती हैं | कभी शिक्षा के क्षेत्र में बाजारवाद और निजीकरण के तत्व हावी होते दिखते हैं तो कभी विश्विद्यालय चुनावी राजनीति के अड्डे के रूप में सिमटने लग जाते हैं | इस तरह की और अन्य बातें शिक्षा के लिए नाकारात्मक  भाव उत्पन्न करते हैं और लगातार उसकी चर्चा पब्लिक स्फ़ियर में कम होती चली जा रही है | लेकिन शिक्षा-चिन्तन की नवजागरण कालीन छोटी सी यह झलक बेहद सशक्तता के साथ यही प्रस्तावित करती है कि परिस्थिति कैसी भी क्यों न हो, यदि हम कान लगाकर ध्यानपूर्वक सुनें तो पता चलेगा कि इतिहास चुप नहीं रहता !


                                                                            सन्दर्भ-सूची
  1. कृष्ण कुमार , गुलामी की शिक्षा और राष्ट्रवाद, ग्रन्थ शिल्पी (इण्डिया) प्राइवेट लिमिटेड ,दिल्ली, 2006, पृष्ठ – 11
  2.  प्रतापनारायण मिश्र, मिडिल क्लास, प्रतापनारायण-ग्रंथावली, नागरीप्रचारिणी सभा,वाराणसी, नई दिल्ली, सम्पादक, विजयशंकर मल्ल, सं. 2049, पृष्ठ – 91
  3. वही, पढ़े लिखों के लक्षण, पृष्ठ – 364
  4. महावीर प्रसाद द्विवेदी, पढ़े लिखों का पांडित्य, महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रतिनिधि संकलन, नेशनल बुक ट्रस्ट, इण्डिया, प्रधान सम्पादक, नामवर सिंह, सम्पादक, रामबक्ष ,पहली आवृत्ति, 1997, पृष्ठ – 63
  5. वही, बनारस के संस्कृत-कालेज की कुछ पुरानी बातें, पृष्ठ – 113
  6. वही, शिक्षा प्रचार के लिय गवर्नमेंट का खर्च, पृष्ठ – 136
  7.  माधवराव सप्रे, किसानों की शिक्षा, माधवराव सप्रे, प्रतिनिधि संकलन, नेशनल बुक ट्रस्ट, इण्डिया, प्रधान सम्पादक, नामवर सिंह, सम्पादक, मैनेजर पाण्डेय, पहली आवृत्ति, 2011, पृष्ठ  - 153
  8. डॉ. श्यामसुंदर दास, दयानंद एंग्लो वैदिक कालेज की महत्ता, डॉ. श्यामसुन्दर दास के अप्रकाशित निबन्ध, हिन्दी प्रचारक संस्थान, लखनऊ, वाराणसी, कलकत्ता, सम्पादक, डॉ. रत्नाकर पाण्डेय, प्रथम संस्करण, 1983, पृष्ठ – 30
  9. वही, एज्युकेशन कमीशन और शिक्षा, पृष्ठ – 32
  10. वही, हिन्दी पाठ्यपुस्तकों की भाषा, पृष्ठ – 69
  11. मदनमोहन मालवीय, हमारी शिक्षा, महामना मालवीय और हिन्दी पत्रकारिता, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी, डॉ. लक्ष्मीशंकर व्यास, प्रथम आवृत्ति, 1987, पृष्ठ – 105
  12. वही, स्त्री – शिक्षा, पृष्ठ – 110
  13. गणेशशंकर विद्यार्थी, राष्ट्रीय शिक्षा, चुनी हुयी रचनाएँ गणेशशंकर विद्यार्थी, राहुल फाउंडेशन, लखनऊ, सम्पादक, कात्यायनी, सत्यम, प्रथम संस्करण : जनवरी 2006, पृष्ठ – 123
  14. वही, पृष्ठ – 131
  15. वही, पृष्ठ – 133
  16. बाबूराव विष्णु पराड़कर, ‘हिन्दुस्तानी’ द्वारा शिक्षा, सम्पादक पराड़कर, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान (पत्रकारिता विभाग), राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन हिन्दी भवन, लखनऊ, सम्पादक, लक्ष्मी शंकर व्यास, प्रथम संस्करण : 1977, पृष्ठ – 68

                                                डॉ. अरुणाकर पाण्डेय
                                               तदर्थ प्रवक्ता,मोतीलाल नेहरु कॉलेज,नई दिल्ली
                                                9910808735
                                                arunakarpandey@gmail.com
                             
                                              
                                                                           
      

              

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