Wednesday, June 18, 2014

*** एक बीज की तरह : नरेश सक्सेना



विता हमारी सांस्कृतिक धरोहर है. हमारे अपने समय का ऐसा दस्तावेज़, जिसके माध्यम से कवि प्रतीकों में इतिहास दर्ज करता है. इतिहास को तो तथ्यात्मक होना चाहिए, लेकिन कविता के पास यह स्पेस है कि वह अधिक विवरणात्मक और काल्पनिक होकर भी प्रतीकों में अपने समय के यथार्थ को अभिव्यक्त कर सके. आज की कविता में किस्से कहने का चलन तेज़ी से बढ़ा है. इन किस्सों में विवरण है और विवरणों में व्यक्त होती विडम्बना. विडम्बना आधुनिक कविता को उसकी आतंरिक लय देती है जो गेयात्मक हो यह ज़रूरी नहीं. यह लय आधुनिक कविता का अपना शास्त्र (शब्दावली) है, जिसे उसने आधुनिकता की यात्रा में अर्जित किया है. यहाँ शास्त्र परंपरागत रूप में कविता को बांधता नहीं है बल्कि उसे मुक्त करने का विन्यास है. यही लय कविता की स्वाभाविक गति भी है. चूँकि आज के समय में व्यक्ति की चुनौतियाँ, उसके संघर्ष, और सरोकार तेज़ी से बदले हैं. इसलिए कविता भी अपने पुराने फार्मूले से अलग हुई है. निरंतर परिवर्तित होते हुए विकास के अलग-अलग सोपानों को आधुनिक कविता की बुनावट और विश्लेषण के नए सन्दर्भों के रूप में कवि ने स्वयं प्रस्तावित किया है. यह प्रस्तावना नई और अग्रगामी है. इस प्रस्तावना के भीतर नरेश सक्सेना ने अपनी कविताओं की उपस्थिति बहुत मजबूती के साथ दर्ज करवाई है.

नरेश सक्सेना की पहली कविता सन ६० में छपी थी और पहला काव्य-संग्रह समुद्र पर हो रही है बारिश २००१ में. आज लगभग १२-१३ वर्ष बाद नरेश सक्सेना का दूसरा काव्य-संग्रह सुनो चारूशीला भारतीय ज्ञानपीठ ने प्रकाशित किया है. इतने सालों के अंतराल और मुट्ठी भर कविताओं से नरेश ने हिंदी कविता में अपनी विशेष जगह बनायी है. क्यूँकि नरेश सक्सेना की कविता पहली बार हिंदी कविता में विज्ञान और गणित के समीकरणों पर बात करती है, मनुष्यता की पक्षधरता में इतिहास और भविष्य से जूझती है, प्रकृति से हमारे संबंधों को पुख्ता करती है. उनकी कविता सिर्फ़ समस्याओं तक ले ही नहीं जाती बल्कि वह संभावित विकल्प दे कर पाठक की, श्रोता की ज़िम्मेदारी और भूमिका भी निश्चित करती है. नरेश सक्सेना के यहाँ लीक से हटकर चलना किसी चुनाव का परिणाम नहीं बल्कि कविता के स्वभाव की तरह आता है. उनकी कविताओं का आस्वाद अपनी समकालीन हिंदी कविता से बहुत भिन्न-सा है. लीक से हटकर चलने में एक ओर वे परम्परा से टकराते हैं दूसरी ओर अपनी रचनात्मक ऊर्जा का परिचय भी देते हैं. विज्ञान और गणित की पृष्ठभूमि उनकी कविता को हिंदी की पहली, ठोस वैज्ञानिक नियमों के भीतर चलते जीवन की कविता के रूप में प्रस्तुत करती है. वैज्ञानिक नियम जीवन की गति को पारिभाषित करते चलते हैं, ये हिंदी कविता में पहली बार होगा. इस अर्थ में नरेश सक्सेना हिंदी के अकेले कवि है जो वस्तुओं में जीवन के सिद्धान्त खोज लेते हैं और उनकी रचनात्मक ऊर्जा में कविता की लय भरते हैं. लय कविता में उन संबंधों का विधान करती है, जिसे आन्तरिकता में पाया जाता है यानी किसी पदार्थ या वस्तु को भीतर से जानना, रूप से नहीं गुण से जानना, वह गुण जो किसी अस्तित्व का आतंरिक विधान होता है. नरेश स्वयं लिखते है –

सेनाएँ जब किसी सेतु की ओर बढ़ती हैं तो सेतु यह नहीं जानता कि वे मित्र सेनाएँ हैं या शत्रु सेनाएँ. उसकी समझ में सिर्फ़ लय आती है – कि एक लय उसकी ओर बढ़ रही है. वह इस लय पर झूमना और लचकना शुरू कर देता है......यह मात्र लय के भौतिक आघातों की बात नहीं है, यह लय के साथ लय कि संगति यानि दो लयों के एक लय में विलीन होकर अपनी मुक्ति का द्वार खटखटाने का प्रसंग है.                                                       (सुनो चारूशीला, पृ०-९ )

उक्त संग्रह में सेतु कविता इसी पर है :-
सेनाएँ जब सेतु से गुज़रती हैं
तो सैनिक अपने क़दमों की लय तोड़ देते हैं
क्योंकि इससे सेतु के टूट जाने का खतरा
उठ खड़ा होता है
शनैः शनैः लय के सम्मोहन में डूब
सेतु का अंतर्मन होता है आंदोलित ..........
लय से उन्मत्त
सेतु कि काया करती है नृत्त .....
लय कि इस ताकत को मेरे शत-शत प्रणाम.

लय एक पूरी प्रक्रिया है जो आधुनिक कविता में काव्यानुभूति भी है और कविता तथा पाठक का आंतरिक सम्बन्ध भी. अपने नए काव्य-संग्रह सुनो चारुशीला में नरेश सक्सेना ने दो–तीन पृष्ठ की भूमिका लिखी है. इस भूमिका में उन्होंने अपनी कविता सम्बन्धी विचार-प्रक्रिया को साझा किया है :-

१९५८ में छपे चार मुक्तकों के बाद ( जो मेरी पहली रचना थी ) मैंने मुख्यतः गद्य शैली में कवितायेँ लिखीं हैं ..... ‘कल्पना’ में उन दिनों तीन बार में मेरी कुल आठ कवितायेँ छपीं थीं, जिनमें से सात गद्य में थीं, सिर्फ़ एक छंद में.

आधुनिक कविता पर युगीन सत्य के उन हिस्सों के चयन का दबाव बराबर बना रहा, जो पूरी तरह समझे या जाने नहीं जा सके हैं. इसलिए उसकी अभिव्यक्ति में परिस्थितियों और विचारों की भूमिका या तो भाव के बराबर या उससे अधिक ही दिखाई देती है. संभवतः इसीलिए कविता अधिक गद्यात्मक होती गयी. आधुनिक युग में जब कविता को गद्य की कविता कहा गया तो इस पृष्ठभूमि में भाव और विचार मिलकर, बदली हुई परिस्थितियों में अपनी भूमिका तय करते हैं. कविता के इस वातावरण में लय की उपस्थिति महत्वपूर्ण हो जाती है. नरेश सक्सेना लिखते हैं :

 सामन्यतः मैं बोल कर लिखता हूँ इसलिए बोली की लय अनायास ही उसमें आ जाती है.
    (सुनो चारूशीला, पृ०-८ )

यहाँ अनायास जन-जीवन से उनके आत्मीय सम्बन्ध का द्योतक है जो कवि से इस लय को जोड़ता चलता है. बोली की लय लोक की, जन की लय है. राजनीति और तंत्र के बीच मनुष्य और प्रकृति के सम्बन्ध की लय है. बोलियों में आंचलिकता का नमक रहता है. और फिर जीने के लिए पानी की तरह नमक भी तो ज़रूरी है :-
 
बह रहे पसीने में जो पानी है वह सूख जायेगा
लेकिन उसमें कुछ नमक भी है
जो बच रहेगा                                     ( समुद्र पर हो  रही है बारिश, पृ०-१३ )

नरेश कि कविताओं में बोलचाल की लय बराबर बनी  हुई है. पहले संग्रह समुद्र पर हो रही है बारिश से लेकर दूसरे संग्रह सुनो चारूशीला तक. यहाँ सहजता एक अनिवार्य मूल्य की तरह कविता में गुँथी चली आती है. शिल्प के स्तर पर नरेश सक्सेना की कविता अभिधा की कविता है लेकिन संवेदना के धरातल पर लक्षणामूलक व्यंजना है. काव्यानुभवों का आडम्बर और रचनात्मक कर्मकांड नरेश की कविताओं में नहीं दिखता. यह अकस्मात नहीं है. खुद नरेश मानते हैं कि सामान्य पाठक कि समझ और संवेदना पर मैं भरोसा करता हूँ. विज्ञान और गणित की पृष्ठभूमि के कारण जटिलता को मैं कोई मूल्य नहीं मानता. विज्ञान और गणित दो-टूक होते हैं. वैसे भी ज्ञान चीज़ों को सरल बनाता है. जटिलता की जड़ें अकसर अज्ञान में होतीं हैं. (सुनो चारूशीला, पृ०-९ ) तो नरेश सक्सेना सायास सहजता को कविता के गुण के रूप में अपनाते हैं. संबोधनों के प्रयोग से वे संवाद और संबंधों की सहजता और आत्मीयता का वातावरण ही नहीं बनाते बल्कि वह कविता को स्वयं अनुशासित भी करते हैं. उनकी एक कविता है :-
 
हर घड़ी में एक घुंडी होती है
जिसे घुमाकर उसका वक़्त
आगे पीछे किया जा सकता है
फ़ौरन पता करिये
कि आपकी घुंडी किसके हाथ में है
कविताओं में वक़्त बर्बाद मत करिये
मेरी शक्ल क्या देख रहे हैं
अपनी घड़ी देखिये जनाब !!

नरेश की कवितायेँ केवल शिल्प की बुनावट में ही सहज नहीं हैं बल्कि सहजता ही उनकी कविताओं का कथ्य भी है. कविता यहाँ सहजता के परंपरागत रूप में सहज नहीं है, बल्कि यह सहजता, जटिलताओं के बीच से गुज़रते हुए उनके तोड़ पा लेने की मुक्तावस्था है .सहजता यहाँ व्यवहार की गति है. मनुष्य के आचरण का मार्ग है. इस सहजता में गहराई और व्यापकता अनिवार्य रूप से होगी. परिवर्तन कविता जितनी अभिधात्मकता में रची गयी है उतनी ही व्यापक और गहराई तक पाठक को ले जाने की क्षमता भी उसमे है :-
  
बरसों से बंद पड़ी हवेली में
कोई नहीं आया था
एक दिन आई आँधी
उसके साथ आई धूल
सूखे हुए पत्ते और तिनके, और कागज़
पूरी हवेली एक ताज़गी से भर गयी

नरेश सक्सेना की कविता इस अर्थ में कविता की परम्परा से जुड़ती, उसका विकास करती दिखाई देती है. सहजता के साथ उनकी कविताओं में काल का प्रसार है. काल के इस विस्तार में, प्रसार में उससे जुड़े संघर्षों का इतिहास भी दर्ज है. इतिहास कविता देखें :-

बरत कर फेंक दी गयी चीज़ें, ख़ाली डिब्बे, शीशियाँ और रैपर
ज़्यादातर तो बीन ले जाते हैं बच्चे,
बाकी बची, शायद कुछ देर रहती हों शोकमग्न
लेकिन देखते-देखते आपस में घुलने मिलने लगती हैं
मनाती हुई मुक्ति का समारोह.
..........................................
एक दिन उनके ढेर पर उगता है
एक पौधा –पौधे में फूल
फूलों में उन सबका सौंदर्य
और खुशबू में उनका इतिहास.

काल के प्रसार में मनुष्यता ही बची रहे यह कविता का संकल्प भी है और ध्येय भी. मनुष्यता के काले अध्यायों के बीत जाने पर उसके अवशेष फिर से मनुष्यता के नए अध्याय लिखें, यह कामना और बीजारोपण केवल कविता ही कर सकती है. सुनो चारूशीला की भूमिका में नरेश सक्सेना कविता को मानव इतिहास के सबसे आवश्यक दस्तावेज़ के रूप में देखते हैं. उन्हीं के शब्दों में :-

फूलों पर लिखी गयी कोई कविता भयानक विस्फोट का माध्यम भी बन सकती है....कविता ऐसी जो पाठक को विचलित करे, भावबोध का परिष्कार करे और दृष्टि को बदल दे : मनुष्यता का ऐसा दस्तावेज़ जो अपने समय के अन्याय और क्रूरता को चुनौती दे. कविता ऐसी जो बुरे वक़्त में काम आये, जो हिंसा को समझ और संवेदना में बदल दे.  

संघर्ष कि यह प्रक्रिया ऐतिहासिक है जिसमे मनुष्य की सकारात्मक भूमिका अनिवार्य है, और वह भविष्य से भी इसी सकारात्मक ऊर्जा तथा योगदान की आशा रखता है. सुनो चारूशीला संग्रह में कवि आशान्वित भविष्य के लिए वर्तमान समय बच्चों को सौंप देना चाहता है :-

किले के फाटक खुले पड़े हैं
और पहरेदार गायब
ड्योढ़ी में चमगादड़ें
दीवाने ख़ास में जाले और
हरम बेपर्दा हैं
सुलतान दौड़ो !!
आज किले में भर गए हैं बच्चे .......

अनवरत चलते रहने के इस प्रक्रिया (काल की गति ) में नरेश सक्सेना विज्ञान के ठोस नियमों के साथ भीतर जाकर साहित्य और जीवन के समीकरणों को सुलझाते हैं. नरेश सक्सेना हिंदी के पहले और शायद अकेले कवि हैं जिन्होंने भाषा और तकनीक के इस सम्बन्ध की आवश्यकता और अभाव की ओर ध्यान दिलाया. विज्ञान आधुनिक समाज की आंतरिक शक्ति या आंतरिक बुनावट है. इसमें धंसे बिना आज के मनुष्य कि संरचना को नहीं समझा जा सकता. सुनो चारूशीला संग्रह की भूमिका में नरेश सक्सेना ने विज्ञान और साहित्य के साथ-साथ ना चल पाने के कारण पैदा अनुपस्थिति की ओर इशारा करते हुए कहा है :-

हिंदी के साथ दो दुर्घटनाएँ एक साथ हुईं. एक तो उर्दू से उसका नाता टूटना और दूसरा विज्ञान और तकनीकी से उसे काट दिया जाना. यह निरी साहित्यिक दुर्घटना नहीं – एक बड़ी, सोची समझी राजनीतिक साजिश है. जो भाषा अपने समय के विज्ञान से कटी हो, वह कितने दिन तक ज्ञान की भाषा बनी रह सकती है! सिर्फ़ हिंदी ही नहीं हमारे देश की सारी भाषाएँ विज्ञान की सहज अवधारणाओं, मुहावरों और शब्दावली से कट गयी हैं.

नरेश सक्सेना विज्ञान के नियमों, प्राप्त परिणामों और जिंदगी के गणितीय समीकरणों के बीच कविता के रिसाव को देखते हैं. ये अनुभव शाश्वत नहीं आधुनिक मनुष्य ने स्वयं अर्जित किये हैं, और इन अनुभवों ने मनुष्य को नए सिरे से परिभाषित किया है. नरेश सक्सेना के यहाँ ईंट ,सीमेंट, कॉन्क्रीट, संख्याएँ, ज़ंग, लोहा, धातुएँ, पानी, मिट्टी, रौशनी यहाँ तक की दांतों के कीड़े  भी कविता से मनुष्य की नई भूमिका रचते हैं. लोहा जितना भौतिक स्तर पर हमारे परिवेश को रहने लायक बनाता है उतना ही हमारे शरीर की भीतरी बनावट में भी उसकी हिस्सेदारी है. विशेष परिस्तिथियों में वस्तुएँ मनुष्यों की तरह और मनुष्य परिस्थितियों की तरह व्यवहार करने लगते हैं. ( समुद्र पर हो  रही है बारिश, भूमिका से ) उनकी कविता है लोहे की रेलिंग  :-

थोड़ी सी ऑक्सीजन और थोड़ी-सी नमी
वह छीन लेती है हवा से
और पेंट कि परत के नीचे छिपकर
एक ख़ुफ़िया कार्रवाई की शुरुआत करती है
..........................................................
यह शिल्प और तकनीक के जबड़ों से
छूटकर आज़ाद होने की
जी तोड़ कोशिश ,
यह घर लौटने की एक मासूम इच्छा
आखिर थोड़ी-सी ऑक्सीज़न और
थोड़ी-सी नमी
तो हमें भी ज़रूरी है ज़िंदा रहने के लिए
बस थोड़ी-सी ऑक्सीज़न
और थोड़ी-सी नमी
वह भी छीन लेती है हवा से

दरअसल वस्तुओं की भूमिका का यह सन्दर्भ नया है, जिसकी परतों को विज्ञान ने हमारे समक्ष खोला. तब एक ऐसी दुनिया से मनुष्य का साक्षात्कार होता है जो अब तक अनदेखी, अनजानी थी. इस दुनिया को भीतर जा कर देखने से चिंतन की पूरी मानसिक बुनावट बदली. इन बदले हुए सन्दर्भों और परिवेश में नई भूमिका का चयन करना ही होगा, अन्यथा पीछे छूटी हुई चीज़ों की तरह मनुष्य की भूमिका भी अकर्मक हो जायेगी. उनकी एक बड़ी सधी हुई कविता है कॉन्क्रीट. बकौल कवि .....

कॉन्क्रीट की कथा बताती है / रिश्तों की ताकत में / अपने बीच / ख़ाली जगह छोड़ने की अहमियत के बारे में

नरेश सक्सेना जिन सन्दर्भों में जीवन को पढ़ते और सुलझाते हैं वहाँ विज्ञान के बेसिक नियमों की उपस्थिति अनिवार्य रूप से दिखाई देती है, परन्तु कविता की प्रयोगशाला विज्ञान की प्रयोगशाला के सामान ही काम नहीं करती और जैसा कि कवि ने स्वयं कहा है, कविता निश्चित ही विज्ञान से कुछ ऊपर की चीज़ है, नीचे की नहीं. सदियों बाद तक गणितज्ञ और वैज्ञानिक कविताओं को सिद्ध करते रहते हैं. मनोरंजन या विलास का साधन कविता नहीं होती. फिर भी विज्ञान में जीवन और जीवन में विज्ञान की कविता के पहले और अकेले कवि है नरेश सक्सेना. संवेदना लगातार इन गणितीय समीकरणों के बीच अपनी जगह बनाये रखती है. मिट्टी कविता समय, समाज, मनुष्यता और इन सबके बीच विज्ञान के पारस्परिक संबंधों का अच्छा उदाहरण है....

नफ़रत पैदा करती है नफ़रत
और प्रेम से जनमता है प्रेम
इंसान तो इंसान, धर्मग्रंथों का यह ज्ञान
तो मिट्टी तक के सामने ठिठककर रह जाता है
मिट्टी के इतिहास में मिट्टी के खिलौने हैं
खिलौनों के इतिहास में हैं बच्चे
और बच्चों के इतिहास में बहुत से स्वप्न हैं
जिन्हें अभी पूरी तरह समझा जाना शेष है
नौ बरस की टीकू तक जानती है ये बात
कि मिट्टी से फूल पैदा होते हैं
फूलों से शहद पैदा होता है
और शहद से पैदा होती है बाक़ी की कायनात
मिट्टी से मिट्टी पैदा नहीं होती

जिस प्रकार कविता और समाज के सम्बन्ध को अन्योन्याश्रित रूप में देखा जाता है ठीक उसी प्रकार जीवन में विज्ञान के नियमों की भी उपस्थिति ज़रूरी है. नरेश अपने इस अर्जित ज्ञान से कविता का नया वातावरण, उसकी नई शैली रचते हैं. उनकी कविताओं में शिल्प के स्तर पर भी कई प्रयोग मिलते हैं. मछलियाँ’ और मुझे मेरे भीतर छुपी रौशनी दिखाओ आदि कवितायेँ किसी फ़िल्म की स्क्रिप्ट सरीखी मालूम पड़ती हैं. वहाँ केवल भाव ही नहीं, भाव–भंगिमा, आंगिक अभिनय, ध्वनि और प्रकाश का नियंत्रण, सभी कुछ शब्द-बद्ध है. नरेश ने फ़िल्में बनाते हुए, नाटक लिखते हुए, संगीत रचनाएँ बनाते, इंजीनियरिंग की समस्याएँ हल करते हुए लगातार महसूस किया है की गणित, विज्ञान, संगीत, कविता और अन्य कलाओं में कोई विरोध आपस में नहीं होता, बल्कि एक आतंरिक संगति होती है.

नरेश सक्सेना की कविता मुहावरों में बात करती हैं. कभी-कभी पूरी कविता इन मुहावरों में समेटी जा सकती है. चुटकुले बाज़ी के लिए किये गए मुहावरे नहीं, बल्कि मनुष्य के संबंधों के बीच से जन्मे मुहावरे. इन मुहावरों के विशेष सन्दर्भ हैं, जैसे बच्चे भविष्य हैं जिनको हमें मनुष्यता, प्रकृति से प्रेम, निडरता की विरासत सौंपनी है, ना कि सांप्रदायिक भाषा, राजनीति और इतिहास. पानी भी कई जगह कई अर्थों में आया है. वह शरीर का तीन चौथाई हिस्सेदार ही नहीं, जीवन है, सामाजिक धरोहर है, मूल है, मंत्र है भविष्य है, सजीव है. ये मुहावरे मनुष्य के अपने आस-पास की चीज़ों से सम्बन्ध में अस्तित्वमान हुए हैं. यदि मनुष्य की हिस्सेदारी उन तमाम चीज़ों में है जो उसके आसपास घटित होती है तो निश्चित ही उनसे मनुष्य का सम्बन्ध भी है. उदाहरण के लिए उनकी कविता का यह शीर्षक देखिये –

पहाड़ों के माथे पर बर्फ बनकर जमा हुआ, यह कौन से समुद्रों का जल है जो पत्थर बनकर, पहाड़ों के साथ रहना चाहता है

किसी कविता का शीर्षक जब इतने विस्तार में हो तो यह स्पष्ट हो जाता है कि कवि उस सम्बन्ध को कितनी गहराई में जा कर समझता और समझाना चाहता है. कवि का सम्बन्ध उस हर चीज़ से है जो जीवन की यात्रा पर है. यह उदाहरण देखिये :-

हर पत्थर समुद्र कि यात्रा पर है
जो गोल है, वह लंबी दूरी तय करके आया है
जो चपता या तिकोना है, वह नया सहयात्री है.
मेरी उपस्थिति से बेखबर, सभी पत्थर
नंगधडंग और पैदल
टकटकी लगाए आकाश पर.
हर रंग के, छोटे और बड़े सीधे और सरल
कि जितने पत्थर भीतर से
उतने ही पत्थर बाहर से
.................................
अपनी भीतरी तहों में छुपाये हुए बचपन की यादें
.............................
हर पत्थर एक शब्द था.

नरेश संबंधों के कवि हैं. जो कुछ भी हमारे पास भौतिक रूप में उपलब्ध है उससे हमारा सम्बन्ध है और रहना भी चाहिए. चूंकि यह सम्बन्ध ही समाज के आपसी तालमेल का सूत्र है, इसलिए मनुष्य की ज़िम्मेदारी है कि वह इन संबंधों को सजीव और सकारात्मक बनाये रखे. एक कविता है दाग़-धब्बे  :-

जहाँ-जहाँ होता है जीवन
हवा, पानी, मिटटी, और आग जहाँ होते हैं
धब्बे और दाग़
ज़रूर वहाँ होते हैं
वे जीवन की हलचल में हिस्सा बांटना चाहते हैं.

ये सम्बन्ध ही हैं जिनके लिए कवि पूरी परम्परा और संस्कृति पर सवाल खड़ा करता है. यह सम्बन्ध केवल चीज़ों या  प्रकृति से नहीं. उस इतिहास से भी है जिसने मनुष्य को वर्ग और वर्ण में बाँट कर श्रम के महत्व को कम किया. उस जाति, जनता और समाज का तिरस्कार किया जिसने अपना अमूल्य श्रम समाज को दिया. नरेश व्यक्तिगत संबंधों के ही नहीं सामाजिक संबंधो के भी कवि हैं. उनकी कवता है अजीब बात :-

कहते हैं रास्ता भी एक जगह होता है
जिस पर ज़िंदगी गुज़ार देते हैं लोग
और रास्ते पाँवों से ही निकलते हैं
पाँव शायद इसीलिए पूजे जाते हैं
हाथों को पूजने कि कोई परम्परा नहीं
हमारी संस्कृति में
ये कितनी अजीब बात है !

वास्तविकता पैदा करना, मनुष्यत्व पैदा करना नरेश सक्सेना कि कविताओं की आतंरिक बुनावट की युक्ति है. वे जबतब इसका बखूबी प्रयोग करते है. सन्दर्भ बदलने से अर्थ को नयापन मिलता है. और सन्दर्भ बदलना एक लंबी प्रक्रिया से गुज़रना है, इस प्रक्रिया में वे मनुष्य की सकर्मक भूमिका की मांग करते हैं. पुराने ढर्रे पर ही चलते रहने वाले सन्दर्भ भला सृजनात्मक कैसे होंगे? और जब नए और पुराने सन्दर्भों की टकराहट होती है तो नए अर्थ फूटने लगते हैं. अर्थ और सन्दर्भ का यह विज्ञान नरेश की कविताओं में कई जगह आया है. उनकी एक कविता है, मनुष्यों के गिरने के कोई नियम नहीं होते. इस कविता को सुनो चारूशीला संग्रह की प्रतिनिधि कविता के रूप में देखा जा सकता है :-

चीज़ों के गिरने के नियम होते हैं।
मनुष्यों के गिरने के कई नियम नहीं होते।
लेकिन चीज़ें कुछ भी तय नहीं कर सकतीं
अपने गिरने के बारे में
मनुष्य कर सकते हैं
.............................
इससे पहले कि गिर जाये समूचा वजूद 
एकबारगी
तय करो अपना गिरना
अपने गिरने की सही वज़ह और वक़्त
और गिरो किसी दुश्मन पर
गाज की तरह गिरो
उल्कापात की तरह गिरो
वज्रपात की तरह गिरो
मैं कहता हूँ 
गिरो !!

काट-छाँट कर इस पूरी कविता का कोई भी एक हिस्सा उद्धृत किया जाना पर्याप्त नहीं है. दरअसल यह एकसूत्रीय-आरोही कविता है. अर्थात एक ही सूत्र को आदि से अंत तक बढ़ते क्रम में पिरोना. आरोही कविता विवरणों को गूंथ कर अंतिम चरण में ( यानी क्लाइमैक्स पर पहुँचकर ) प्रश्न या आघात पैदा करती है. इन आघातों के कंपन में पाठक अपनी अर्थ छवियाँ ग्रहण करता है, एक से और भिन्न-भिन्न अर्थ. सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक रूप में गिरना कभी भी किसी समाज के लिए अनुसरणीय नहीं रहा, ना ही हो सकता है. लेकिन यहाँ गिरने का सन्दर्भ भी बदला है और अर्थ भी. गुरुत्वाकर्षण के साधारण से दिखने वाले वैज्ञानिक सिद्धांत ने हमारे समक्ष चिंतन की एक नई दुनिया ही खोल दी. हम चाह कर भी इस सिद्धांत को नकार नहीं सकते. इससे दो बातें हुई - पहली यह की मनुष्य ने यह समझा कि प्रकृति की गतिविधियों पर कुछ नियम एकसमान रूप से काम करते है, दूसरे यह की इन समीकरणों की समस्या को मनुष्य अपनी सूझ-बूझ से हल कर सकता है. यह नई बौद्धिक चेतना है जिसने उस काव्यलोक का निर्माण किया जिसे हम आधुनिक-बोध कहते हैं. इस बोध में मनुष्य की भूमिका ईश्वर के प्रति आस्था से बड़ी और सकर्मक है. कोई समाज जब अपनी यह सकर्मक भूमिका भूल कर, अज्ञान के वशीभूत होता है तब सत्ता, धर्म और बाज़ार मिल कर उसका शोषण करते हैं.

कवि तठस्थ होकर कविता नहीं कर सकता क्योंकि कवि-कर्म चयन के साथ चलने वाली प्रक्रिया है और यह चयन उसकी प्रतिबद्धता को निर्धारित करता है. नरेश सक्सेना की कविता प्रतिबद्धता के लिए विज्ञान के सरल जीवन सूत्रों के पक्ष को चुनती है और उसी तरह व्यवहार करती है. लेकिन कवि-क्षेत्र में उनकी कुछ सीमायें भी है. देखा जाये तो उनका पहला संग्रह समुद्र पर हो रही है बारिश की कविताओं का शिल्प और कथ्य अधिक सघन है बनिस्पत दूसरे संग्रह की कविताओं के. जो एक कमजोरी सरसरी तौर पर दिखती है वह यह कि वे कई हिस्सों को अनावश्यक विस्तार देते है. संभवतः पाठक के समक्ष कविता की जटिलता को खोलने की कोशिश में यह किया गया हो पर इससे कविता की बनावट को नुकसान पहुँचा है. जैसे उनकी एक कविता है शिशु :-

शिशु लोरी के शब्द नहीं
संगीत समझता है
बाद में सीखेगा भाषा
अभी वह अर्थ समझता है

समझता है सबकी मुस्कान
सभी की अल्ले ले ले ले
तुम्हारे वेद पुराण कुरान
अभी  वह व्यर्थ समझता है
अभी वह अर्थ समझता है

इस कविता का पहला बंध स्वयं में पर्याप्त, सुगठित और आघात करने में सक्षम है और समुद्र पर हो रही है बारिश संग्रह में उन्होंने इसे पहले बंध के रूप में ही शामिल भी किया है; किन्तु जब वे सुनो चारूशीला में इसका विस्तार करते हैं तो कविता सहज से सरलता कि ओर जाने लगती है. उसकी कसावट, शिल्प बिखरने लगता है. यह कविता का अवरोह है. जबकि पहले बंध में कविता का आरोह पाठक को ठीक उस बिंदु पर ले जाता है जहाँ तक उसे पहुँचना चाहिए और जहाँ से आगे कि यात्रा वह स्वयं तय करे.

नरेश की कविताओं में अपने समय की राजनीतिक घटनाएँ और वातारण भी दर्ज हुआ है और इस तरह वे केवल राजनीति को ही नहीं इतिहास से भी अपनी कविता को साझा करते है. गुजरात के दंगों जैसे राजनीतिक सामाजिक घटनाओ कि राख वहाँ अब भी उड़ती है. जनता के बीच लगातार घोले जाने वाले सांप्रदायिकता को धता-बताने की कोशिश वहाँ है. सुनो चारूशीला संग्रह से पहली कविता रंग देखिये :-

सुबह उठकर देखा तो आकाश
लाल, पीले, सिन्दूरी और गेरुए रंगों से रंग गया था
मज़ा आ गया ‘आकाश हिंदू हो गया है’
पड़ोसी ने चिल्लाकर कहा
‘अभी तो और मज़ा आएगा’ मैंने कहा
बारिश आने दीजिए
सारी धरती मुसलमान हो जायेगी.

रंगों को राजनीति में जड़ करने की राजनीति के विरुद्ध यह कविता प्रतिरोध है, उस मानसिकता से जिसने प्रकृति और बच्चों से रंग छीनकर उन्हें सांप्रदायिक बना दिया. राजेश जोशी ने लिखा था ‘उन्होंने रंग उठाये और मार डाला’, शमशेर जब उषा का चित्र और शाम का चित्र खींचते है तब राजनीति वहाँ हस्तक्षेप नहीं करती. सोचिये भगवा और हरियल रंग की राजनीति का हमारे जीवन में आज कितना असर है कि रंगों में भी वोट बैंक की राजनीति दिखाई देती है. गीतों में ब्रांड कॉपीराइट के लिए लड़ते हैं. बाज़ार के समय में भला रंग कैसे अछूते रह जाते. कविता की यात्रा पर निकला कवि केवल अपने समय और उसमें घटने वाली घटनाओं से ही नहीं टकराता. वह सबसे पहले शब्द और भाषा से टकराता है. नरेश सक्सेना भी टकराते हैं. कभी-कभी इस टकराहट में अनुभूति और संवेदना भाषा से बड़ी और ताकतवर दिखाई देती है और तब कवि भाषा से बाहर जा कर सोचता है :-
बेहतर हो
कुछ दिनों के लिए हम लौट चलें
उस समय में
जब मनुष्यों के पास भाषा नहीं थी
और हर बात
कहके नहीं, करके दिखानी होती थी

मानवीय जीवन में गति ही सब कुछ है, गति जो स्पंदन पैदा करती है, और लय को बराबर अपने साथ लिए चलती है. लय भी तो जीने की गति ही है. जीवन में यह गति छंद (छंद जीने का अनुशासन, सलीका ही तो है) के बिना नहीं हो सकती. जीवन और कविता में धारण करने की असीम क्षमता है, नरेश सक्सेना इन क्षमताओं के अलग-अलग कोणों के बीच विज्ञान के ज्ञान को खोंसते हुए कविता के स्पेस का सही और सटीक इस्तेमाल करना जानते हैं. यही उनकी कविता और कवित्व की सफलता की कसौटी है. जीवन और कविता अपना पुनुरुत्पादन करते चलते हैं, सृजन की इस प्रक्रिया में बीज जहाँ पड़ जाए वहीँ से जीवन अंकुर बन फूट पड़ता है.
घृणा और हिंसा से भरे इस समय में
पौधों को सींचते हुए
करता हूँ कामना उस साहस की
जिसके साथ मिटटी में कर सकूँ प्रवेश
एक बीज की तरह.

             ---------------------------------------------------------------------------       अपराजिता शर्मा
साभार 

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