Wednesday, June 18, 2014

एक बीज की तरह : नरेश सक्सेना


कविता हमारी सांस्कृतिक धरोहर है. हमारे अपने समय का ऐसा दस्तावेज़, जिसके माध्यम से कवि प्रतीकों में इतिहास दर्ज करता है. इतिहास को तो तथ्यात्मक होना चाहिए, लेकिन कविता के पास यह स्पेस है कि वह अधिक विवरणात्मक और काल्पनिक होकर भी प्रतीकों में अपने समय के यथार्थ को अभिव्यक्त कर सके. आज की कविता में किस्से कहने का चलन तेज़ी से बढ़ा है. इन किस्सों में विवरण है और विवरणों में व्यक्त होती विडम्बना. विडम्बना आधुनिक कविता को उसकी आतंरिक लय देती है जो गेयात्मक हो यह ज़रूरी नहीं. यह लय आधुनिक कविता का अपना शास्त्र (शब्दावली) है, जिसे उसने आधुनिकता की यात्रा में अर्जित किया है. यहाँ शास्त्र परंपरागत रूप में कविता को बांधता नहीं है बल्कि उसे मुक्त करने का विन्यास है. यही लय कविता की स्वाभाविक गति भी है. चूँकि आज के समय में व्यक्ति की चुनौतियाँ, उसके संघर्ष, और सरोकार तेज़ी से बदले हैं. इसलिए कविता भी अपने पुराने फार्मूले से अलग हुई है. निरंतर परिवर्तित होते हुए विकास के अलग-अलग सोपानों को आधुनिक कविता की बुनावट और विश्लेषण के नए सन्दर्भों के रूप में कवि ने स्वयं प्रस्तावित किया है. यह प्रस्तावना नई और अग्रगामी है. इस प्रस्तावना के भीतर नरेश सक्सेना ने अपनी कविताओं की उपस्थिति बहुत मजबूती के साथ दर्ज करवाई है.

Saturday, January 25, 2014

*** हिन्दी नवजागरण और शिक्षा-चिंतन


वजागरण कालीन साहित्यकारों,पत्रकारों और चिंतकों ने यूरोप से भारतीय संसर्ग में जिन सरोकारों पर विस्तार से विचार किया उसमें शिक्षा को पर्याप्त महत्व दिया है | यह स्वाभाविक भी था क्योंकि तुलनात्मकता की दृष्टि ने उस समय के चिंतकों का ध्यान आकृष्ट किया था जिससे शिक्षा के प्रति उनके नज़रिए का विकास हुआ | यह तब और भी रुचिकर हो जाता है जब यह बात सामने आती है कि नवजागरण के अग्रदूत यूरोपीय शिक्षा से साक्षात्कार के बावजूद उसके अंधभक्त मात्र बनकर नहीं रह गए बल्कि एक अच्छे शोधार्थी की तरह उन्होंने अपनी वैचारिक सम्पदा का विस्तार किया | ये विचार न केवल अपने समय की आलोचना को हमारे सामने रखते हैं बल्कि उनकी उपयोगिता और प्रासंगिकता आज के शैक्षिक मूल्यांकन में भी अपनी गहरी भूमिका निभाती है | जाने माने शिक्षाविद प्रो.कृष्ण कुमार अपनी पुस्तक “गुलामी की शिक्षा और राष्ट्रवाद” में औपनिवेशिक कालीन शिक्षा और समकालीन शिक्षा पर विचार करते हुए आमुख में स्पष्ट लिखते हैं :
“ हमारे स्कूलों और कॉलेजों में आज जो कुछ भी पढ़ाया जाता है उसे ‘वैध स्कूली ज्ञान’ का दर्जा एक बहुत ही ख़ास किस्म के सांस्कृतिक और आर्थिक तनाव के दौरान हासिल हुआ है, और वह था औपनिवेशिक शासन का तनाव | बीसवीं सदी के अंतिम वर्षों को प्रस्थान बिंदु बनाकर उस तनाव की सघनता का आँकलन करना आसान नहीं है जिसे भारतीय समाज ने समूची उन्नीसवीं सदी में खुद पर दर्ज किया था | न ही इस बात को मान्यता देना आसान है कि हमारे शैक्षिक संस्थान युवाओं को जो शिक्षा देते हैं , और उन्नीसवीं सदी में वैध विद्यालयी ज्ञान के रूप में जिन चीजों का चयन किया गया था ,उनके बीच कोई सीधी कड़ी जुड़ती है | यह तो तय है कि हमारी राजनीतिक स्वतंत्रता हमें भरमा कर इस सोच तक ले आती है कि भारत में स्कूली ज्ञान की मौजूदा अवधारणा पर उस तनाव के कोई चिह्न मौजूद नहीं हैं जिसे औपनिवेशिक शासन ने भारतीय समाज और और संस्कृति पर आरोपित कर रखा था|”1

Wednesday, November 20, 2013

*** कबीर के बहाने आधुनिकता पर एक बहस



बीर अपने समय में आधुनिक थे? यह कहने का फैशन-सा चल पड़ा है। इस कथन के पीछे जो विचार काम कर रहा है वह यह कि आधुनिकता कोई बहुत ही उम्दा और मानवीय मूल्य है जिसके बिना कोई भी मानवता का पक्षधर हो ही नहीं सकता। कबीर आधुनिक थे तो बु़द्ध और महावीर भी आधुनिक थे? इसमें कोई शक या गुंजाइश नहीं रहती है। इसके बरक्स कोई यह कहे कि इन्हें आधुनिक कहकर आप इनका अपमान कर रहे हैं तो वह प्रतिक्रियावादी घोषित कर दिया जायेगा। क्या हम कभी यह सवाल पूछते हैं कि कबीर, महावीर या बुद्ध इस बर्बर और अवमानवीकृत आधुनिकता का ठप्पा अपने ऊपर लगवाना भी चाहते हैं या नहीं? कबीर जैसा साधारण और सहज व्यक्ति आधुनिक बर्बरता और जटिल पूंजीवाद के दुष्चक्र में पिसते उपभोक्ता को देखकर भी यही कहता की चलती चाकी देखकर दिया कबीरा रोए। दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोए। दूसरा सवाल यह है कि क्या हम आधुनिक हैं? और क्या जैसे हम आधुनिक हैं? वैसे आधुनिक कबीर हो सकते थे? क्या उन्हें वैसा आधुनिक होना चाहिए था? आधुनिकता चाहे औपनिवेशक हो या देशज वह आधुनिकता ही रहेगी। क्या हम में देशज आधुनिकता का कोई लक्षण है? जिस आधुनिकता के अन्तर्विरोधों के कारण दो महायुद्धों की त्रासदी मानवता को झेलनी पड़ी हो, परमाणु बमों से हुई अनन्त पीड़ा को भोगना पड़ा हो? हजारों छोटे-मोटे युद्धों में करोड़ों इंसानों का रक्त बहा दिया गया हो, मानवता के अपमान और हृास की कहानी पूरी सदी में बिखरी पड़ी हो, मानवीय गौरव और गरिमा के अवमानना का महाकाव्य जिस विचारधारा ने लिखा हो? उस विचारधारा का ठप्पा कबीर जैसे मानवीय गायक पर लगाने का प्रयास उनका घोर अपमान ही माना जायेगा।

पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने अपनी कबीरनामक पुस्तक में कबीर को वाणी का डिक्टेटर कहकर वास्तव में उन्हें आधुनिकता की पहली पंक्ति में ही पधरादेने की जो परंपरा प्रारंभ की थी उसका ही विस्तार डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल ने अपनी पुस्तक अकथ कहानी प्रेम की : कबीर की कविता और उनका समयमें किया है। देशज आधुनिकता का प्रारंभ कबीर से करने के प्रयास में वे यह सोच ही नहीं सके की इसी आधुनिकता ने हिटलर जैसा डिक्टेटर पैदा किया था। और अन्ततः हजारी प्रसाद द्विवेदी और पुरुषोत्तम अग्रवाल अलग-अलग तरह से उन्हें हिटलर की श्रेणी में ही बिठा रहे हैं।


Friday, October 11, 2013

*** युद्ध के दिनों में प्रेम : उसने कहा था



लेरी जी ने कुल तीन कहानियां लिखीं और तीनो हीं प्रथम प्रेम की कहानियां हैं। 'सुखमय जीवन और 'बुद्धू का कांटा' की मनोभूमि चञ्चल और उत्फुल्ल है जबकि 'उसने कहा था' एक त्रासदी। इनमें तीसरी 'उसने कहा था' असंदिग्ध रूप से भाषा और विषयवस्तु के साथ व्यवहार, संरचना और गठन आदि को देखते हुए हिंदी की पहली प्रौढ़ और प्राञ्जल कहानी है। इसकी कथा के गठन के विस्मयजनक चमत्कार, बहुपरतीय अर्थवत्ता, और भाव गहनता पर इतना कुछ कहा जा चुका है कि शायद अब अलग से कोई टिप्पणी भी फ़ालतू जान पड़े। लेकिन फिर भी, हर बार पढ़ने के बाद इसकी ताजग़ी पुनर्जीवित हो उठती है और कुछ कहने को शेष रह गया सा प्रतीत होता है। 'उसने कहा था' के बहाने यह भी एक उत्तेजक और रोचक परीक्षा संभव है कि पाठकों की अलग अलग पीढ़ियां और अलग अलग दृष्टियां व रुचियां एक ही रचना के लिये अलग अलग प्रतिक्रियाएं कैसे करती हैं, न केवल पीढ़ीगत बल्कि व्यक्तिगत भी। 

नयी कहानी के दौर में 'उसने कहा था' में चित्रित प्रेम के सत्य और विश्वसनीयता को लेकर एक रोचक बहस चली थी। उस बहस में उठाये गये प्रश्नों के सिरे से देखा जाय तो पूरी कहानी को एक भावुक अतिरंजना में पगा हुआ पाया गया था जिसे कथानक के संरचना–कौशल ने धारासार अश्रुप्रवाह में बह जाने से बचा लिया है। बहस साप्ताहिक हिन्दुस्तान मेँ छपी थी।

Tuesday, July 2, 2013

*** कफ़न : सच की गवाही का अमर दस्तावेज़


पन्यास सम्राट के नाम से सुप्रसिद्ध मुंशी प्रेमचन्द उर्दू का संस्कार लेकर हिन्दी में आए और हिन्दी के महान लेखक बने। उन्होंने हिन्दी को अपना खास मुहावरा और खुलापन दिया। कथा लेखन के क्षेत्र में उन्होंने युगान्तरकारी परिवर्तन किए। आम आदमी को उन्होंने अपनी रचनाओं का विषय बनाया और दमन, शोषण और भ्रष्ट चेहरों की गिरफ्त में पिसती उनकी ज़िन्दगी की समस्याओं पर खुलकर कलम चलाते हुए उन्हें समाज के सही नायकों के पद पर आसीन किया। 
प्रेमचंद ने साहित्य को कल्पना लोक से सच्चाई के धरातल पर उतारा। वे साम्प्रदायिकता, भ्रष्टाचार, जमींदारी, कर्जखोरी, गरीबी, उपनिवेशवाद, पूंजीवाद, सामाजिक विषमता और संवेदना के तिरोभाव पर आजीवन लिखते रहे। वे आम भारतीय के रचनाकार थे।
प्रेमचंद हिन्दी साहित्य के युग प्रवर्तक हैं। उन्होंने हिन्दी कहानी में समाज को खोखला करने वाले भ्रष्ट और दोहरे चरित्रों का खुलासा करते हुए ज़मीनी सच्चाई को स्वर देने की एक नई परम्परा शुरू की। आज भी प्रेमचंद के ज़िक्र के बगैर हिन्दी भाषा और साहित्य की विरासत या भारत के भविष्य का कोई भी विमर्श यदि अधूरा माना जाता है तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

Wednesday, June 26, 2013

*** फ़िल्मी गीतों की समकालीन प्रवृत्तियों पर एक दृष्टि


छले वर्ष फ़िल्मी गीतों की दुनिया में एक अभूतपूर्व विवाद जुड़ा जब ‘डी.के. बोस’ नाम के एक सज्जन को एक टीवी चैनल पर उनकी प्रतिक्रिया के लिए बैठा पाया | वे उस समय के एक प्रसिद्ध फिल्मी गीत ‘भाग-भाग डी के बोस’ से इतने प्रताड़ित हो चुके थे कि सीधे खबर का हिस्सा ही बना दिए गए | पत्रकार उनकी भावनाओं को अपने दर्शकों के सामने लाने के लिए बहुत प्रयत्नशील दिख रहे थे और वे अपनी बारी आने पर केवल अपने दुःख को व्यक्त कर देते थे या फिर बहुत धैर्य के साथ विशेषज्ञों की टिप्पणियों को सुनने समझने का प्रयास करते हुए शायद यह समझ पा रहे थे कि उस पूरे कार्यक्रम में वे  खुद एक उत्पाद में परिवर्तित होते चले जा रहे थे | इस गीत के लेखक हैं अमिताभ भट्टाचार्य और इसे हमारे सेंसर बोर्ड की स्वीकृति भी प्राप्त थी लेकिन इसकी सामाजिक जवाबदेही के नाम पर सबसे बड़ा तर्क यही था कि इसे अपार लोकप्रियता मिली है और इसका आधार भी दिल्ली का वही युवा समाज है जो मुहावरीय आँधी आने पर एक विशेष गाली का उपयोग करता है और उसे हास्य के एक चलताऊ साधन के रूप में अपनाता है | इस तरह यह गीत जनता से ही पैदा हुआ और जनता में ही व्याप्त हुआ लेकिन इसे फिल्मी रूप देने वाले मास मीडिया ने डी.के. बोस नाम के लोगों को जैसे ‘जनता’ मानने से इनकार किया और फिर विवाद का एक दौर थम गया | यही नहीं, डी.के. बोस के साथ ‘शीला की जवानी’ और ‘मुन्नी बदनाम हुयी डार्लिंग तेरे लिए’ की मुन्नी और शीला की फिल्मी अमरता ने कुछ जीवित शीलाओं और मुन्नियों को भी इसी तरह प्रताड़ित किया और वे भी अखबारी मजा लेने के माध्यम भर की पहचान लिए सिमट गयीं | शीला वाले गीत का राजनीतिक उपयोग भी हुआ हो या निकट भविष्य में होगा इसके भी प्रबल आसार हैं | इसके बाद तो अभी तक ये सिलसिला जारी है जो कि ‘बबली’ को बदमाश बताता है और फिल्म के बाहर के पाण्डेय जी लोगों के चरित्र को इस नायकत्व के साथ प्रस्तुत कर रहा है कि वे ऑन ड्यूटी सीटी बजाने के लिए तो प्रसिद्ध हैं ही, लेकिन उनकी ख़ास बात यह है कि ‘फँसते नहीं हैं कोई काण्ड करके !’ 

Sunday, June 2, 2013

*** ‘क़िस्सा कोताह’ : एक कवि की बहक



क़िस्सा क्या है? कहानी का कच्चा माल, कहानियों के इस कच्चे माल को बरतने में राजेश जोशी ने कोई कोताही नहीं बरती और अपने पाठकों के लिए विधागत सीखचों के बंधन से मुक्त एक मुक्त-सा गल्प रच डाला. यह उन्मुक्तता किस्सा कोताह में छाई हुई है. मुक्त-सा इसलिए भी कि किस्सों को कहानी बनने में वक्त लगता है, एक पूरी प्रक्रिया से गुज़रना पड़ता है लेकिन इससे पहले ही किस्सा हाथ छुड़ाकर कभी उपन्यास कभी शहर गाथा कभी आत्मकथात्मक संस्मरण तो कभी कोरी गपड़तान हो जाते हैं.

इस अर्थ में किस्सा कोताह हिन्दी की पहली और मजेदार ढंग से अकेली ऐसी रचना है जो पाठक की उस एक अजीब-सी लत को तोड़ने का काम करती है जिसके चलते पाठक किसी भी चीज को पढ़ने से पहले वह जान लेना चाहता है कि वह जिस किताब को पढ़ रहा है वह क्या है यानी पहले उसकी विधा तय होना चाहिए. बंधी-बंधाई बनी-बनाई मानसिकता या दूसरे शब्दों में कहें तो दूराग्रहों, पूर्वाग्रहों पर चोट करती राजेश जोशी की किस्सा कोताह, नयेपन की माँग करती है. भले ही आज के राजनीतिक आर्थिक समीकरणों के बीच यह एक गप्पी की गपड़तान ही क्यों ना लगे. ज़रूरी है इन क़िस्सों का ज़िंदा रहना, बनते रहना, सुनते रहना और सुनाया जाना, जिससे उदासीनता के वातावरण को भंग किया जा सके.

Monday, April 15, 2013

*** खोजने दो मुझे अपना खुद का वसंत !



ज के साहित्य में वसंत की पड़ताल की जाए तो निश्चित ही यह समझ बनती है कि कहीं साहित्य से उसका सम्बन्ध ऐतिहासिक तो नहीं था ! पारंपरिक साहित्य वसंत के आगमन की सूचना रस के आस्वादन के साथ देखता था और उसे मनुष्य के जीवन का एक ऐसा पर्व मानता था जिसमें वह अपने मनुष्यत्व की रक्षा और उसके विकास का अवसर देखता था | वह पाठक के संकीर्ण ह्रदय को ऐसा संस्कार देता था जिसमें वह सिर्फ कोई सांस्कृतिक क्रिया मात्र के रूप में सीमित नहीं रह जाती थी बल्कि यह भाव स्थापित करती थी कि प्रकृति ने मनुष्य में जो कुछ अधूरा छोड़ा है उसे वह वासंती मिठास से भरा जा सकता है | यह एक ऐसी स्थिति थी जो साधारणीकरण की प्रक्रिया में जन-मानस की अभिव्यक्ति बन जाती थी और जो कुछ जहाँ था वह उसी रूप में एक परिव्याप्त सौन्दर्य को प्रस्तावित करता था | इसके साथ ही वह ऐसे भावों के साथ लोकमंगल के परीक्षण और संवर्धन के विचारों को भी इतनी कलात्मकता के साथ पिरो कर रखता था जिससे शासकों में बुद्धि और ह्रदय की शुद्धता और साहित्य में आलोचना की परम्परा विकसित होती थी | कभी-कभार ऐसे में लोकधर्म, ऋतु और मिथक के भी अद्भुत प्रयोग देखने को मिलते थे | अभिप्राय यह कि वसंत ऋतु साहित्य और समाज के सम्बन्ध का नवीनीकरण करने का सशक्त माध्यम बन गया था | वसंत आक्रोश को संतुलित और बेहतर बनाने का अवसर साहित्य के द्वारा प्रदान करता था | 

साहित्य में वसंत की यह परंपरा एक लम्बे समय या कालान्तारों के साथ चलती रही लेकिन अपने समकालीन पड़ाव पर आते हुए वह इस तरह से बिखरी कि उसका अनुमोदन आज एक बहुत बड़ी नाटकीयता लग सकती है | वह आज अपना तेज खोती हुयी दिखती है | यह परम्परा अचानक नहीं बिखरी है बल्कि समाज और उसमें आने वाले परिवर्तनों की तरह एक प्रक्रिया का प्रतिफलन है | साहित्य और वसंत की यह कहानी समाज के विखंडन और मनुष्य के अधूरेपन को रेखांकित करती है | साहित्य, वसंत और मनुष्य के उभरते इस नए सम्बन्ध की पदचाप हरिशंकर परसाई के निबंध ‘घायल वसंत’ में स्पष्ट सुनने को मिलती है | इस निबंध में परसाई जी ने वसंत की पूरी उपस्थिति को बदल कर रख दिया है | उसे ऋतुराज की भूमिका से निकाल कर मनुष्य की यथार्थवादी प्रासंगिकता से जोड़ कर प्रस्तुत किया है | इसे पढ़ते हुए पाठकों को वसंत के एक नए रंग का आभास होता है और यकीनन पारंपरिक पाठक को एक तगड़ा सांस्कृतिक झटका लगता है | 

Sunday, March 10, 2013

*** कुंवर नारायण के काव्य में मिथकीय-चेतना


                                            
मिथक : अर्थ और स्वरूप


व्य से मिथक का घनिष्ठ सम्बन्ध है जो भारतवर्ष में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी माना जाता है. हिंदी में मिथक शब्द का प्रयोग आधुनिक काल में प्रारंभ हुआ जो सन 1950 के बाद नयी कविता में सृजन के एक विशिष्ट उपादान की तरह प्रयुक्त होने लगा. मिथक शब्द अंग्रेज़ी के मिथका हिंदी रूप है तथा यह शब्द हिंदी जगत को आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी से मिला. मिथ मूलतः ग्रीक भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है –‘वाणी का विषय’. वाणी का विषय से तात्पर्य है एक कहानी, एक आख्यान जो प्राचीन काल में सत्य माने जाते थे और कुछ रहस्यमय अर्थ देते थे. मिथ शब्द के कुछ कोशगत अर्थ भी हैं कोई पुरानी कहानी अथवा लोक विश्वास, किसी जाति का आख्यान धार्मिक विश्वासों एवं प्रकृति के रहस्यों के विश्लेषण से युक्त देवताओं तथा वीर पुरुषों की पारंपरिक गाथा, कथन, वृत्त, किवदंती, परंपरागत कथा आदि. यदि इन सब अर्थों की मीमांसा की जाये तो एक बात सब अर्थों के मूल में किसी न किसी सीमा तक लक्षित है – ‘सबके मूल में कथा तत्व का होना’.


        मिथक को दार्शनिक, तत्वशास्त्री, समाजशास्त्री, भाषाविज्ञानी, इतिहासकार और कोशकार सभी ने अपने अपने ढंग से परिभाषित किया. अरस्तु के यहाँ मिथ शब्द का का प्रयोग कथाबंध या गल्प कथा के रूप में मिलता है. रिचर्ड चेज का कहना है – ‘मिथक ही साहित्य है’. वे कहते हैं कि साहित्य का मुख्य रूप मिथकात्मक ही होता है.


बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में प्रेसकाट ने अपनी पुस्तक पोएट्री एंड मिथमें कविता और मिथक के व्यापक विमर्श प्रस्तुत किये. एनसाइक्लोपिडिया आव रिलिजन एंड एन्थ्रिक्समें ई.ए.गार्डनर ने मिथक पर विचार करते हुए कहा कि मिथक प्रायः प्रत्यक्षतः या परोक्षतः कथा रूप में होता है. इस प्रकार मिथक कथा, नीति-कथा या अन्योक्ति से उसी प्रकार भिन्न है जिस प्रकार कहानी या रूपाख्यान से.


Sunday, October 7, 2012

*** भारतेन्दुयुगीन आलोचना



लोचना की शुरूआत भारतेन्दु से मानी जाती है तो बालकृष्ण भट्ट से और प्रेमघन से भी. ‘‘साधारणतः हिन्दी-विद्वानों की यह धारणा बनी हुई है कि प्रेमघनजी ही हिन्दी के सर्वप्रथम समालोचक हैं.’’1 इसके अलावा वैचारिक घालमेल भी है. जिसमें एक तरफ तो यह कहा जाता है कि, ‘‘भारतेन्दु बाबू हरिश्चंद्र आधुनिक युग के सर्वप्रथम आलोचक हैं.’’ दूसरी तरफ सोच समझ से मुक्त यह भी कहा जाता है कि ‘‘आधुनिक हिन्दी आलोचना का सूत्रपात भारतेन्दुयुग में उपाध्याय पं. बदरीनारायण चैधरी प्रेमघन ने किया.’’2 भारतेन्दुयुग में आलोचना की शुरूआत किसने की उससे ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है यह जानना कि आलोचना का आरंभिक और विकासात्मक स्वरूप क्या रहा.

            आरंभिक काल में पत्र-पत्रिकाओं की सम्पादकीय टिप्पणियों, प्राप्ति स्वीकारों और यदाकदा सम्पादक के नाम पत्रों के ही रूप में आलोचना दिखाई पड़ती है. लेकिन धीरे-धीरे यह स्वरूप बदलता है. पुस्तक-परिचय वाली शैली ही समसामयिक पुस्तकों की विस्तृत आलोचनाओं के रूप में विकसित होती है. आनंद-कादम्बिनी की संयोगिता-स्वयंवर और बंग-विजेता तथा हिन्दी प्रदीप की सच्ची समालोचना इसी शैली के प्रौढ़ उदाहरण हैं. इसमें पुस्तक परिचय का हल्कापन नहीं है. इनमें सत् साहित्य को प्रोत्साहन और असत् के बहिष्कार की सदिच्छा ही प्रधान है, इसलिए ये समीक्षाएँ गंभीर और विश्लेषणात्मक है.3