Thursday, July 14, 2016

*** 'जुही की कली' : युवा पाठ

"निराला" पुस्तक की भूमिका (द्वितीय संस्करण) में डॉ० रामविलास शर्मा लिखते है कि तब से लेकर अब तक देश और साहित्य में अनेक परिवर्तन हो चुके हैं। भारत अब उपनिवेश न रहकर अर्द्ध-उपनिवेश हो गया है। परंतु यह जर्जर सामंती ढांचा अब भी है। जिससे निराला साहित्य का घनिष्ट संबंध अब भी है

रामविलास जी इसके पहले संस्करण की भूमिका में लिखते हैं कि उनका व्यक्तित्व एक अच्छे खासे हीरो का सा है। उनमे काफी वैचित्र्य एवं नाटकीयता है फिर भी उनके जीवन के एक संक्षिप्त अध्ययन से हमारे सामाजिक संगठन की असंगतियाँ ,उसकी रुढीप्रियता और उसका खोखलापन बहुत कुछ समझ में आ जायेगा । छायावाद के प्रवर्तकों में उनका अन्यतम स्थान है । जो पुराने साहित्य के प्रवर्तक या समर्थक थे और एक पिटी हुई लीक को छोरकर साहित्य में नए प्रयोग करना प्राचीनता का अपमान समझते थे । इसी विरोध को निराला ने अपना केंद्र बनाया साथ ही साथ छायावाद में भी जो जो असंगतियाँ थीं जिससे उनका मार्ग अवरुद्ध हो गया था  । वैसी रचनाओं से मुह मोरकर निराला समाज के यथार्थ जीवन की ओर झुके और साहित्य में एक नई प्रगतिशील धारा के अगुआ बने ।वह दो युगों के प्रतिनिधि साहित्यकार हैं और जीवन के विसम परिस्थितियों में भी उन्होंने साहित्य की साधना की है। 

रामविलास जी की यह भूमिकाएँ अक्षरसः  उनके साहित्य के महत्व को सपष्ट रूप से व्यक्त करता है।

'जुही की कली' निराला की प्रथम रचना मानी जाती है।

         "विजन-वन वल्लरी पर
          सोती थी सुहागभरी - 
          स्नेह-स्वप्न-मग्न अमल-कोमल-तनु-तरुणी
          जुही की कली"

निराला जहाँ एक ओर स्वाधीनता और सामाजिक परिवर्तन के पक्ष में क्रांतिकारी चेतना को प्रेरित कर रहे थे, वहीँ दूसरी ओर जातीय भाषा और राष्ट्रवाद, साथ-साथ वह हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने हेतु प्रयासरत थे। 'जुही की कली' स्थूल दृष्टि से तो नहीं किन्तु सूक्ष्म दृष्टि से राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन की विषयवस्तु के साथ तात्कालिक समाजिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक आन्दोलन को अपने अंदर समाहित किये हुए हैं। जैसा कि इस कविता की बाहरी बनावट या अभिधात्मक रूप कविता को केवल प्रकृति चित्रण जैसा प्रतीत करता है, किन्तु किसी भी कविता का अपने समकालीन यथार्थ एवं विषय-वस्तु का संबंध स्थापन केवल एक स्तर पर नहीं वरन कई सारे स्तरों पर होता है और यही कारण है कि कविता एक स्तर पर नहीं तो अगले स्तर पर राष्ट्रीय जागरण या आन्दोलन की मूल चुनौतियों को गहराई से समझते हुए अभिव्यक्त होता है।

Monday, November 16, 2015

*** ‘लोकवादी तुलसीदास’

रचनाकार की दृष्टि यदि उनकी रचनाओं में समाहित हो तो रचनाकार का व्यक्तित्व व उनकी विशेषताओं को उजागर करने के लिए रचना से परे कम ही भटकना पड़ता है.  तुलसीदास को 'लोकवादी' का विशेषण देने के लिए डॉ विश्वनाथ त्रिपाठी अपनी पुस्तक 'लोकवादी तुलसीदास'  में उनकी रचनाओं को ही आधार बनाते हैं और यथेष्ट विवरण एवं उद्धरण से तुलसी की लोकवादिता को प्रस्तुत करते हैं. इसी क्रम में उन बिन्दुओं को भी बेहिचक रेखांकित करते हैं जहाँ तुलसी की लोकवादिता खंडित होती है. लेकिन इस खंडन के कारण पुस्तक का नाम त्रिपाठी जी नहीं बदलते. पुस्तक का नाम ध्येय-सापेक्ष होता है और इस पुस्तक के नाम से उनका ध्येय स्पष्ट हो जाता है.

तुलसीदास को विषय बनाना इतिहास और परंपरा में सप्रयोजन प्रवेश करना है. प्रयोजन वर्तमान से सम्बद्ध ही नहीं अतीत से विशेष लगाव का भी हो सकता है. इतिहास और परम्परा के प्रति विशेष लगाव का मतलब आँख मूंदकर गले लगाना नहीं बल्कि अपनी रचना-दृष्टि और उद्देश्य के अनुरूप परंपरा का साक्षात्कार करना है. 'लोकवादी तुलसीदास' इसी तरह का साक्षात्कार है. डॉ. त्रिपाठी ने इसे चार अध्यायों में विभक्त किया है. प्रथम अध्याय 'तुलसी के राम' में तुलसी के अधीष्ट 'राम के रामत्व' को अन्य रचनाओं के राम से पृथक करते हुए उसकी विशिष्टता को सामने लाते हैं. उन्होंने लिखा कि वाल्मीकि, भवभूति, तुलसी और निराला के 'रामों' में जो अंतर है उसका कारण इन महाकवियों के युगबोध का अंतर है. एक ही धरातल पर समानता दिखती है और वह है केवल राम का संघर्ष.  (पृ० २५)  तुलसीदास ने राम के जीवन की अविरल संघर्ष-परंपरा को स्वीकार कर उनके चरित्र को अपनी रचनाओं में पुनः स्थापित करने के स्थान पर अपने युग के नायक के रूप में चित्रित किया. यह नायक तुलसी के दर्शन और चिंतन में तो ब्रह्म है लेकिन उनकी कविता में लोकनायक है. राम के रामत्व के साथ नायक का नायकत्व भी पृथक हो जाता है. राम-नाम की महिमा गाते समय तुलसी निस्सम्बल, असहाय, अभागे, गुणहीन, गरीब, दीन, अकुलीन, पंगु, अंधे, भूखे आदि जन को याद करते हैं. इन्हीं दीन जनों के बंधु हैं तुलसी के लोकनायक. तुलसी भक्त-कवि हैं लेकिन उनके भक्ति और उनके राम में इस लोक की पूरी समाई है. डॉ. त्रिपाठी ने इन्हीं संदर्भो में राम को 'मानव  इतिहास के संघर्षशील व्यक्ति' का और सहायक बन्दर भालू को 'सर्वहारा का प्रतीक'  बना सकने की बात रखते हुए लिखा - "जो लोग राम कथा के इन प्रतीकों को नहीं समझते, वे सचमुच अधिकारी हैं तुलसी को सामंती व्यवस्था का पोषक और संकीर्णतावादी कहने को." (पृ०-२५)

Tuesday, August 25, 2015

*** बालश्रम


ज बच्चे हमारे सबसे मूल्यवान प्राकृतिक संसाधन हैं। वे समाज और संसार के नियंता हैं। नियंता इस दृष्टि से कि उनके द्वारा उस समाज को आगे बढ़ाया जाना है जिसमें उनका पालन हो रहा है, जिसमे उनका बचपन गुज़र रहा है। मानव जीवन के सबसे स्वतंत्र और स्वच्छंद समय को देखा जाए तो निःसंदेह उसका नाम बचपन ही है किन्तु क्या हम यह कह सकते हैं कि हर बचपन में स्वच्छंदता है? क्या बच्चों को माँ की लोरियाँ नसीब हैं? क्या बचपन को खिलौने मिल रहें है? आज हमारे सामने ये गंभीर सवाल हैं। हर वर्ष 12 जून को हम विश्व बालश्रम निषेध दिवस के रूप में मनाते हैं। यह दिवस उन अबोध नौनिहालों के लिए होता है जो होते तो हमारे लाडलों की तरह ही हैं लेकिन गरीबी की गिरफ़्त में इस कदर जकड़ उठते हैं कि उन्हें बचपन की अमीरी का एहसास ही नही होता है। 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में पच्चीस करोड़ छियानबे लाख ऐसे बच्चे हैं जिनकी उम्र 5 से 11 साल के बीच है। इनमें से करीब 1 करोड़ बच्चे श्रमिक हैं। यदि राज्यों को देखा जाए तो तकरीबन उत्तरप्रदेश में 21 लाख, बिहार में 10 लाख, राजस्थान में 8 लाख बाल मज़दूर हैं। आज देश के लगभग सभी ढाबों, होटलों, पंचर की दुकानों या इस तरह के अन्य कामों में बच्चों को देखा जा सकता है। ऐसा नही है कि इन कामों में सिर्फ लड़के ही श्रमिक हैं बल्कि लड़कियां भी  इन कार्यों में लगीं हैं। अधिकतर धनाढ्य घरों में आपको लड़के और लड़कियां आपको काम करते दिख जायेंगे जहाँ उनका उत्पीड़न भी होता है।

Sunday, January 18, 2015

*** वैष्णव भक्ति आन्दोलन का अखिल भारतीय स्वरुप


रतीय इतिहास में मध्यकाल राजनीतिक, सांस्कृतिक, आर्थिक तथा सामाजिक सभी दृष्टि से महत्वपूर्ण था । एक और जहाँ इस्लामी संस्कृति भारतीय सामाजिक संरचना को प्रभावित कर रही थी तो वहीं इसकी पृष्ठभूमि में भक्ति आंदोलन का सूत्रपात भी होता है । साहित्येतिहास में इसे स्वर्णिम काल की संज्ञा दी गई है । भक्ति आंदोलन ने समय समय पर लगभग पूरे देश को प्रभावित किया और उसका धार्मिक सिद्धांतों, धार्मिक अनुष्ठानों, नैतिक मूल्यों और लोकप्रिय विश्वासों पर ही नहीं, बल्कि कलाओं और संस्कृति पर भी निर्णायक प्रभाव पड़ा।[1]

            उत्तरी भारत में चोदहवीं से सत्रहवीं शताब्दी में फैली भक्ति आंदोलन की उद्दाम लहर समाज के वर्ण, जाति, कुल और धर्म की परिसीमाओं का अतिक्रमण कर सम्पूर्ण जनमानस की चेतना में व्याप्त हो गई थी । जिसने एक जन आंदोलन का रूप ग्रहण कर लिया । भक्ति आंदोलन में साधक या भक्त के द्वारा मोक्ष प्राप्ति अथवा आत्म साक्षात्कार के लिए परमात्मा के सगुण या निर्गुण रूप की भक्ति ही नहीं की गई वरन भक्ति के माध्यम से तदयुगीन सामाजिक जीवन में स्थित एक वर्ण या जाति के प्रति कीए गए अत्याचार, अन्याय और शोषण के खिलाफ असहमति और विरोध का प्रदर्शन था । साथ ही उसने जन सामान्य की आशाओं, आकांक्षाओं और आदर्शों की भी अभिव्यक्ति हुई थी ।[2]

Monday, September 1, 2014

*** सुख की उपभोक्तावादी परिभाषाओं के विरूद्ध : ईदगाह


दगाह पढ़ कर प्रायः पहला विस्मय हामिद के बारे में होता है। ऐसा बच्चा सचमुच का हो सकता है क्या। उम्र चार पांच साल। गरीब सूरत गरीब हालत। दादी का इकलौता अनाथ। अड़ोसियों पड़ोसियों की अभिभावकता में साथी बच्चों के साथ गांव से शहर तक पैदल चल कर जाता है , सारे दिन भूखा प्यासा मेले में भटकता है और भूखा ही लौट आता है क्योंकि दादी के हाथों को जलने से बचाने के लिये एक चिमटा खरीदना ज्यादा ज़रूरी था। बहुत दिनों तक इस कहानी के विषय में चर्चा हामिद के चरित्र की स्वाभाविकता और बाल मनोविज्ञान की समझ के आस पास घूमती रही। स्वयं प्रेमचंद ने अपनी ओर से ऐसे अनेक विवरण जुटाये हैं जो स्वाभाविकता की कसौटी पर हामिद के चरित्र के औचित्य को प्रमाणित करते हैं। हम कह सकते हैं कि कहानी के भीतर इस स्वाभाविकता का अर्जन किया गया है। पाठक इस संदर्भ में अपनी इच्छा और अनुभव के दायरे के अनुसार पक्ष और विपक्ष दोनो ओर से तर्क जुटा सकता है। यथार्थ और स्वाभाविकता की हमारी कसौटी प्रायः इसी के द्वारा निर्धारित होती है कि हमारा अपना अनुभव और दूसरों के अनुभव के बारे में हमारी जानकारी की सीमा क्या है। किसी कृति पर इस संदर्भ में टिप्पणी करते समय हम इसे बिना किसी किस्म की आत्मसजगता के अंतिम और संपूर्ण मान लेते हैं और इस आधार पर फैसला सुना देते हैं कि कहानी के बाहर जितने बच्चे हमने देख रखे हैं हामिद का औसत व्यवहार उनसे मेल खाता है या नहीं। हम इस बात की छूट देना भी याद नहीं रखते कि विपन्नता की जिस हद पर रहते हुए और दादी के प्यार की खूराक से पोषित होते हुए हामिद जीना सीख रहा है वह हमारे मध्यवर्गीय अनुभव की सीमाओं के बाहर अतः अपरिचित सा ज्ञात होते हुए भी हामिद के संदर्भ के लिये स्वाभाविक हो सकता है। वह उस संसार का वासी है जिसके बच्चे अपना बचपना जल्दी खो देते हैं। चार पांच साल की उम्र के इस बेहद गरीब बच्चे के चारो ओर एक बड़ा सा मेला है। बच्चे की जेब में कुल तीन पैसे है जिन्हे लेकर वह खरीदार की हैसियत से इस मेले में मौजूद है। इस मेले में वह अकेला नहीं है। उम्र में उससे थोड़ा ही बड़े हैसियत में उससे कुछ ही बेहतर उसके दोस्त भी साथ में मौजूद हैं। सामान्यतः उन्हें भी उसी विपन्न समाज और उसी वंचित बचपन के साकार अभिप्रायों के रूप में देखा जा सकता है लेकिन हामिद का आचरण अन्यों की तुलना में भिन्न और विशिष्ट होकर उभरता है। ये बाकी बच्चे हामिद के इसी आचरण की भिन्नता को एक परिप्रेक्ष्य देने और रेखांकित करने का कथात्मक उद्देश्य निभाने के साथ साथ यह भी रेखांकित करते हैं कि गरीबी की अंतिम रेखाओं के आसपास जीते हुए भी भूखे पेट सो रहने की विवशता ,आधापेट खा पाना, भरपेट खाने को पा जाना ,कभी कभी मनपसंद भी खा सकने की विलासिता की औकात रखना आदि देखने में भले ही उसी एक स्थिति की निकट श्रेणियां प्रतीत होती हों वस्तुतः वे एक दूसरे से गुणात्मक रूप से भिन्न जीवनस्थितियां हैं। हामिद पहली कोटि की विपन्नता के संसार का वासी है। मातापिताविहीन होने के कारण भावात्मक रूप से भी असुरक्षित हैं। उसके पास एक अकेली दादी है जो अपनी है। इन सारे संदर्भों को देखते हुए यह निष्कर्ष अनुचित नहीं कि कम से कम स्वयं प्रेमचंद ने तो पूरी यात्रा हामिद के बोध और तर्क की सीमाओं के साथ तय की है। 

Wednesday, June 18, 2014

*** एक बीज की तरह : नरेश सक्सेना



विता हमारी सांस्कृतिक धरोहर है. हमारे अपने समय का ऐसा दस्तावेज़, जिसके माध्यम से कवि प्रतीकों में इतिहास दर्ज करता है. इतिहास को तो तथ्यात्मक होना चाहिए, लेकिन कविता के पास यह स्पेस है कि वह अधिक विवरणात्मक और काल्पनिक होकर भी प्रतीकों में अपने समय के यथार्थ को अभिव्यक्त कर सके. आज की कविता में किस्से कहने का चलन तेज़ी से बढ़ा है. इन किस्सों में विवरण है और विवरणों में व्यक्त होती विडम्बना. विडम्बना आधुनिक कविता को उसकी आतंरिक लय देती है जो गेयात्मक हो यह ज़रूरी नहीं. यह लय आधुनिक कविता का अपना शास्त्र (शब्दावली) है, जिसे उसने आधुनिकता की यात्रा में अर्जित किया है. यहाँ शास्त्र परंपरागत रूप में कविता को बांधता नहीं है बल्कि उसे मुक्त करने का विन्यास है. यही लय कविता की स्वाभाविक गति भी है. चूँकि आज के समय में व्यक्ति की चुनौतियाँ, उसके संघर्ष, और सरोकार तेज़ी से बदले हैं. इसलिए कविता भी अपने पुराने फार्मूले से अलग हुई है. निरंतर परिवर्तित होते हुए विकास के अलग-अलग सोपानों को आधुनिक कविता की बुनावट और विश्लेषण के नए सन्दर्भों के रूप में कवि ने स्वयं प्रस्तावित किया है. यह प्रस्तावना नई और अग्रगामी है. इस प्रस्तावना के भीतर नरेश सक्सेना ने अपनी कविताओं की उपस्थिति बहुत मजबूती के साथ दर्ज करवाई है.

Saturday, January 25, 2014

*** हिन्दी नवजागरण और शिक्षा-चिंतन


वजागरण कालीन साहित्यकारों,पत्रकारों और चिंतकों ने यूरोप से भारतीय संसर्ग में जिन सरोकारों पर विस्तार से विचार किया उसमें शिक्षा को पर्याप्त महत्व दिया है | यह स्वाभाविक भी था क्योंकि तुलनात्मकता की दृष्टि ने उस समय के चिंतकों का ध्यान आकृष्ट किया था जिससे शिक्षा के प्रति उनके नज़रिए का विकास हुआ | यह तब और भी रुचिकर हो जाता है जब यह बात सामने आती है कि नवजागरण के अग्रदूत यूरोपीय शिक्षा से साक्षात्कार के बावजूद उसके अंधभक्त मात्र बनकर नहीं रह गए बल्कि एक अच्छे शोधार्थी की तरह उन्होंने अपनी वैचारिक सम्पदा का विस्तार किया | ये विचार न केवल अपने समय की आलोचना को हमारे सामने रखते हैं बल्कि उनकी उपयोगिता और प्रासंगिकता आज के शैक्षिक मूल्यांकन में भी अपनी गहरी भूमिका निभाती है | जाने माने शिक्षाविद प्रो.कृष्ण कुमार अपनी पुस्तक “गुलामी की शिक्षा और राष्ट्रवाद” में औपनिवेशिक कालीन शिक्षा और समकालीन शिक्षा पर विचार करते हुए आमुख में स्पष्ट लिखते हैं :
“ हमारे स्कूलों और कॉलेजों में आज जो कुछ भी पढ़ाया जाता है उसे ‘वैध स्कूली ज्ञान’ का दर्जा एक बहुत ही ख़ास किस्म के सांस्कृतिक और आर्थिक तनाव के दौरान हासिल हुआ है, और वह था औपनिवेशिक शासन का तनाव | बीसवीं सदी के अंतिम वर्षों को प्रस्थान बिंदु बनाकर उस तनाव की सघनता का आँकलन करना आसान नहीं है जिसे भारतीय समाज ने समूची उन्नीसवीं सदी में खुद पर दर्ज किया था | न ही इस बात को मान्यता देना आसान है कि हमारे शैक्षिक संस्थान युवाओं को जो शिक्षा देते हैं , और उन्नीसवीं सदी में वैध विद्यालयी ज्ञान के रूप में जिन चीजों का चयन किया गया था ,उनके बीच कोई सीधी कड़ी जुड़ती है | यह तो तय है कि हमारी राजनीतिक स्वतंत्रता हमें भरमा कर इस सोच तक ले आती है कि भारत में स्कूली ज्ञान की मौजूदा अवधारणा पर उस तनाव के कोई चिह्न मौजूद नहीं हैं जिसे औपनिवेशिक शासन ने भारतीय समाज और और संस्कृति पर आरोपित कर रखा था|”1

Wednesday, November 20, 2013

*** कबीर के बहाने आधुनिकता पर एक बहस



बीर अपने समय में आधुनिक थे? यह कहने का फैशन-सा चल पड़ा है। इस कथन के पीछे जो विचार काम कर रहा है वह यह कि आधुनिकता कोई बहुत ही उम्दा और मानवीय मूल्य है जिसके बिना कोई भी मानवता का पक्षधर हो ही नहीं सकता। कबीर आधुनिक थे तो बु़द्ध और महावीर भी आधुनिक थे? इसमें कोई शक या गुंजाइश नहीं रहती है। इसके बरक्स कोई यह कहे कि इन्हें आधुनिक कहकर आप इनका अपमान कर रहे हैं तो वह प्रतिक्रियावादी घोषित कर दिया जायेगा। क्या हम कभी यह सवाल पूछते हैं कि कबीर, महावीर या बुद्ध इस बर्बर और अवमानवीकृत आधुनिकता का ठप्पा अपने ऊपर लगवाना भी चाहते हैं या नहीं? कबीर जैसा साधारण और सहज व्यक्ति आधुनिक बर्बरता और जटिल पूंजीवाद के दुष्चक्र में पिसते उपभोक्ता को देखकर भी यही कहता की चलती चाकी देखकर दिया कबीरा रोए। दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोए। दूसरा सवाल यह है कि क्या हम आधुनिक हैं? और क्या जैसे हम आधुनिक हैं? वैसे आधुनिक कबीर हो सकते थे? क्या उन्हें वैसा आधुनिक होना चाहिए था? आधुनिकता चाहे औपनिवेशक हो या देशज वह आधुनिकता ही रहेगी। क्या हम में देशज आधुनिकता का कोई लक्षण है? जिस आधुनिकता के अन्तर्विरोधों के कारण दो महायुद्धों की त्रासदी मानवता को झेलनी पड़ी हो, परमाणु बमों से हुई अनन्त पीड़ा को भोगना पड़ा हो? हजारों छोटे-मोटे युद्धों में करोड़ों इंसानों का रक्त बहा दिया गया हो, मानवता के अपमान और हृास की कहानी पूरी सदी में बिखरी पड़ी हो, मानवीय गौरव और गरिमा के अवमानना का महाकाव्य जिस विचारधारा ने लिखा हो? उस विचारधारा का ठप्पा कबीर जैसे मानवीय गायक पर लगाने का प्रयास उनका घोर अपमान ही माना जायेगा।

पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने अपनी कबीरनामक पुस्तक में कबीर को वाणी का डिक्टेटर कहकर वास्तव में उन्हें आधुनिकता की पहली पंक्ति में ही पधरादेने की जो परंपरा प्रारंभ की थी उसका ही विस्तार डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल ने अपनी पुस्तक अकथ कहानी प्रेम की : कबीर की कविता और उनका समयमें किया है। देशज आधुनिकता का प्रारंभ कबीर से करने के प्रयास में वे यह सोच ही नहीं सके की इसी आधुनिकता ने हिटलर जैसा डिक्टेटर पैदा किया था। और अन्ततः हजारी प्रसाद द्विवेदी और पुरुषोत्तम अग्रवाल अलग-अलग तरह से उन्हें हिटलर की श्रेणी में ही बिठा रहे हैं।


Friday, October 11, 2013

*** युद्ध के दिनों में प्रेम : उसने कहा था



लेरी जी ने कुल तीन कहानियां लिखीं और तीनो हीं प्रथम प्रेम की कहानियां हैं। 'सुखमय जीवन और 'बुद्धू का कांटा' की मनोभूमि चञ्चल और उत्फुल्ल है जबकि 'उसने कहा था' एक त्रासदी। इनमें तीसरी 'उसने कहा था' असंदिग्ध रूप से भाषा और विषयवस्तु के साथ व्यवहार, संरचना और गठन आदि को देखते हुए हिंदी की पहली प्रौढ़ और प्राञ्जल कहानी है। इसकी कथा के गठन के विस्मयजनक चमत्कार, बहुपरतीय अर्थवत्ता, और भाव गहनता पर इतना कुछ कहा जा चुका है कि शायद अब अलग से कोई टिप्पणी भी फ़ालतू जान पड़े। लेकिन फिर भी, हर बार पढ़ने के बाद इसकी ताजग़ी पुनर्जीवित हो उठती है और कुछ कहने को शेष रह गया सा प्रतीत होता है। 'उसने कहा था' के बहाने यह भी एक उत्तेजक और रोचक परीक्षा संभव है कि पाठकों की अलग अलग पीढ़ियां और अलग अलग दृष्टियां व रुचियां एक ही रचना के लिये अलग अलग प्रतिक्रियाएं कैसे करती हैं, न केवल पीढ़ीगत बल्कि व्यक्तिगत भी। 

नयी कहानी के दौर में 'उसने कहा था' में चित्रित प्रेम के सत्य और विश्वसनीयता को लेकर एक रोचक बहस चली थी। उस बहस में उठाये गये प्रश्नों के सिरे से देखा जाय तो पूरी कहानी को एक भावुक अतिरंजना में पगा हुआ पाया गया था जिसे कथानक के संरचना–कौशल ने धारासार अश्रुप्रवाह में बह जाने से बचा लिया है। बहस साप्ताहिक हिन्दुस्तान मेँ छपी थी।

Tuesday, July 2, 2013

*** कफ़न : सच की गवाही का अमर दस्तावेज़


पन्यास सम्राट के नाम से सुप्रसिद्ध मुंशी प्रेमचन्द उर्दू का संस्कार लेकर हिन्दी में आए और हिन्दी के महान लेखक बने। उन्होंने हिन्दी को अपना खास मुहावरा और खुलापन दिया। कथा लेखन के क्षेत्र में उन्होंने युगान्तरकारी परिवर्तन किए। आम आदमी को उन्होंने अपनी रचनाओं का विषय बनाया और दमन, शोषण और भ्रष्ट चेहरों की गिरफ्त में पिसती उनकी ज़िन्दगी की समस्याओं पर खुलकर कलम चलाते हुए उन्हें समाज के सही नायकों के पद पर आसीन किया। 
प्रेमचंद ने साहित्य को कल्पना लोक से सच्चाई के धरातल पर उतारा। वे साम्प्रदायिकता, भ्रष्टाचार, जमींदारी, कर्जखोरी, गरीबी, उपनिवेशवाद, पूंजीवाद, सामाजिक विषमता और संवेदना के तिरोभाव पर आजीवन लिखते रहे। वे आम भारतीय के रचनाकार थे।
प्रेमचंद हिन्दी साहित्य के युग प्रवर्तक हैं। उन्होंने हिन्दी कहानी में समाज को खोखला करने वाले भ्रष्ट और दोहरे चरित्रों का खुलासा करते हुए ज़मीनी सच्चाई को स्वर देने की एक नई परम्परा शुरू की। आज भी प्रेमचंद के ज़िक्र के बगैर हिन्दी भाषा और साहित्य की विरासत या भारत के भविष्य का कोई भी विमर्श यदि अधूरा माना जाता है तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है।