ज के साहित्य में वसंत की पड़ताल की जाए तो निश्चित ही यह समझ बनती है कि कहीं साहित्य से उसका सम्बन्ध ऐतिहासिक तो नहीं था ! पारंपरिक साहित्य वसंत के आगमन की सूचना रस के आस्वादन के साथ देखता था और उसे मनुष्य के जीवन का एक ऐसा पर्व मानता था जिसमें वह अपने मनुष्यत्व की रक्षा और उसके विकास का अवसर देखता था | वह पाठक के संकीर्ण ह्रदय को ऐसा संस्कार देता था जिसमें वह सिर्फ कोई सांस्कृतिक क्रिया मात्र के रूप में सीमित नहीं रह जाती थी बल्कि यह भाव स्थापित करती थी कि प्रकृति ने मनुष्य में जो कुछ अधूरा छोड़ा है उसे वह वासंती मिठास से भरा जा सकता है | यह एक ऐसी स्थिति थी जो साधारणीकरण की प्रक्रिया में जन-मानस की अभिव्यक्ति बन जाती थी और जो कुछ जहाँ था वह उसी रूप में एक परिव्याप्त सौन्दर्य को प्रस्तावित करता था | इसके साथ ही वह ऐसे भावों के साथ लोकमंगल के परीक्षण और संवर्धन के विचारों को भी इतनी कलात्मकता के साथ पिरो कर रखता था जिससे शासकों में बुद्धि और ह्रदय की शुद्धता और साहित्य में आलोचना की परम्परा विकसित होती थी | कभी-कभार ऐसे में लोकधर्म, ऋतु और मिथक के भी अद्भुत प्रयोग देखने को मिलते थे | अभिप्राय यह कि वसंत ऋतु साहित्य और समाज के सम्बन्ध का नवीनीकरण करने का सशक्त माध्यम बन गया था | वसंत आक्रोश को संतुलित और बेहतर बनाने का अवसर साहित्य के द्वारा प्रदान करता था |
साहित्य में वसंत की यह परंपरा एक लम्बे समय या कालान्तारों के साथ चलती रही लेकिन अपने समकालीन पड़ाव पर आते हुए वह इस तरह से बिखरी कि उसका अनुमोदन आज एक बहुत बड़ी नाटकीयता लग सकती है | वह आज अपना तेज खोती हुयी दिखती है | यह परम्परा अचानक नहीं बिखरी है बल्कि समाज और उसमें आने वाले परिवर्तनों की तरह एक प्रक्रिया का प्रतिफलन है | साहित्य और वसंत की यह कहानी समाज के विखंडन और मनुष्य के अधूरेपन को रेखांकित करती है | साहित्य, वसंत और मनुष्य के उभरते इस नए सम्बन्ध की पदचाप हरिशंकर परसाई के निबंध ‘घायल वसंत’ में स्पष्ट सुनने को मिलती है | इस निबंध में परसाई जी ने वसंत की पूरी उपस्थिति को बदल कर रख दिया है | उसे ऋतुराज की भूमिका से निकाल कर मनुष्य की यथार्थवादी प्रासंगिकता से जोड़ कर प्रस्तुत किया है | इसे पढ़ते हुए पाठकों को वसंत के एक नए रंग का आभास होता है और यकीनन पारंपरिक पाठक को एक तगड़ा सांस्कृतिक झटका लगता है |





