Monday, April 15, 2013

*** खोजने दो मुझे अपना खुद का वसंत !



ज के साहित्य में वसंत की पड़ताल की जाए तो निश्चित ही यह समझ बनती है कि कहीं साहित्य से उसका सम्बन्ध ऐतिहासिक तो नहीं था ! पारंपरिक साहित्य वसंत के आगमन की सूचना रस के आस्वादन के साथ देखता था और उसे मनुष्य के जीवन का एक ऐसा पर्व मानता था जिसमें वह अपने मनुष्यत्व की रक्षा और उसके विकास का अवसर देखता था | वह पाठक के संकीर्ण ह्रदय को ऐसा संस्कार देता था जिसमें वह सिर्फ कोई सांस्कृतिक क्रिया मात्र के रूप में सीमित नहीं रह जाती थी बल्कि यह भाव स्थापित करती थी कि प्रकृति ने मनुष्य में जो कुछ अधूरा छोड़ा है उसे वह वासंती मिठास से भरा जा सकता है | यह एक ऐसी स्थिति थी जो साधारणीकरण की प्रक्रिया में जन-मानस की अभिव्यक्ति बन जाती थी और जो कुछ जहाँ था वह उसी रूप में एक परिव्याप्त सौन्दर्य को प्रस्तावित करता था | इसके साथ ही वह ऐसे भावों के साथ लोकमंगल के परीक्षण और संवर्धन के विचारों को भी इतनी कलात्मकता के साथ पिरो कर रखता था जिससे शासकों में बुद्धि और ह्रदय की शुद्धता और साहित्य में आलोचना की परम्परा विकसित होती थी | कभी-कभार ऐसे में लोकधर्म, ऋतु और मिथक के भी अद्भुत प्रयोग देखने को मिलते थे | अभिप्राय यह कि वसंत ऋतु साहित्य और समाज के सम्बन्ध का नवीनीकरण करने का सशक्त माध्यम बन गया था | वसंत आक्रोश को संतुलित और बेहतर बनाने का अवसर साहित्य के द्वारा प्रदान करता था | 

साहित्य में वसंत की यह परंपरा एक लम्बे समय या कालान्तारों के साथ चलती रही लेकिन अपने समकालीन पड़ाव पर आते हुए वह इस तरह से बिखरी कि उसका अनुमोदन आज एक बहुत बड़ी नाटकीयता लग सकती है | वह आज अपना तेज खोती हुयी दिखती है | यह परम्परा अचानक नहीं बिखरी है बल्कि समाज और उसमें आने वाले परिवर्तनों की तरह एक प्रक्रिया का प्रतिफलन है | साहित्य और वसंत की यह कहानी समाज के विखंडन और मनुष्य के अधूरेपन को रेखांकित करती है | साहित्य, वसंत और मनुष्य के उभरते इस नए सम्बन्ध की पदचाप हरिशंकर परसाई के निबंध ‘घायल वसंत’ में स्पष्ट सुनने को मिलती है | इस निबंध में परसाई जी ने वसंत की पूरी उपस्थिति को बदल कर रख दिया है | उसे ऋतुराज की भूमिका से निकाल कर मनुष्य की यथार्थवादी प्रासंगिकता से जोड़ कर प्रस्तुत किया है | इसे पढ़ते हुए पाठकों को वसंत के एक नए रंग का आभास होता है और यकीनन पारंपरिक पाठक को एक तगड़ा सांस्कृतिक झटका लगता है | 

Sunday, March 10, 2013

*** कुंवर नारायण के काव्य में मिथकीय-चेतना


                                            
मिथक : अर्थ और स्वरूप


व्य से मिथक का घनिष्ठ सम्बन्ध है जो भारतवर्ष में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी माना जाता है. हिंदी में मिथक शब्द का प्रयोग आधुनिक काल में प्रारंभ हुआ जो सन 1950 के बाद नयी कविता में सृजन के एक विशिष्ट उपादान की तरह प्रयुक्त होने लगा. मिथक शब्द अंग्रेज़ी के मिथका हिंदी रूप है तथा यह शब्द हिंदी जगत को आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी से मिला. मिथ मूलतः ग्रीक भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है –‘वाणी का विषय’. वाणी का विषय से तात्पर्य है एक कहानी, एक आख्यान जो प्राचीन काल में सत्य माने जाते थे और कुछ रहस्यमय अर्थ देते थे. मिथ शब्द के कुछ कोशगत अर्थ भी हैं कोई पुरानी कहानी अथवा लोक विश्वास, किसी जाति का आख्यान धार्मिक विश्वासों एवं प्रकृति के रहस्यों के विश्लेषण से युक्त देवताओं तथा वीर पुरुषों की पारंपरिक गाथा, कथन, वृत्त, किवदंती, परंपरागत कथा आदि. यदि इन सब अर्थों की मीमांसा की जाये तो एक बात सब अर्थों के मूल में किसी न किसी सीमा तक लक्षित है – ‘सबके मूल में कथा तत्व का होना’.


        मिथक को दार्शनिक, तत्वशास्त्री, समाजशास्त्री, भाषाविज्ञानी, इतिहासकार और कोशकार सभी ने अपने अपने ढंग से परिभाषित किया. अरस्तु के यहाँ मिथ शब्द का का प्रयोग कथाबंध या गल्प कथा के रूप में मिलता है. रिचर्ड चेज का कहना है – ‘मिथक ही साहित्य है’. वे कहते हैं कि साहित्य का मुख्य रूप मिथकात्मक ही होता है.


बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में प्रेसकाट ने अपनी पुस्तक पोएट्री एंड मिथमें कविता और मिथक के व्यापक विमर्श प्रस्तुत किये. एनसाइक्लोपिडिया आव रिलिजन एंड एन्थ्रिक्समें ई.ए.गार्डनर ने मिथक पर विचार करते हुए कहा कि मिथक प्रायः प्रत्यक्षतः या परोक्षतः कथा रूप में होता है. इस प्रकार मिथक कथा, नीति-कथा या अन्योक्ति से उसी प्रकार भिन्न है जिस प्रकार कहानी या रूपाख्यान से.


Sunday, October 7, 2012

*** भारतेन्दुयुगीन आलोचना



लोचना की शुरूआत भारतेन्दु से मानी जाती है तो बालकृष्ण भट्ट से और प्रेमघन से भी. ‘‘साधारणतः हिन्दी-विद्वानों की यह धारणा बनी हुई है कि प्रेमघनजी ही हिन्दी के सर्वप्रथम समालोचक हैं.’’1 इसके अलावा वैचारिक घालमेल भी है. जिसमें एक तरफ तो यह कहा जाता है कि, ‘‘भारतेन्दु बाबू हरिश्चंद्र आधुनिक युग के सर्वप्रथम आलोचक हैं.’’ दूसरी तरफ सोच समझ से मुक्त यह भी कहा जाता है कि ‘‘आधुनिक हिन्दी आलोचना का सूत्रपात भारतेन्दुयुग में उपाध्याय पं. बदरीनारायण चैधरी प्रेमघन ने किया.’’2 भारतेन्दुयुग में आलोचना की शुरूआत किसने की उससे ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है यह जानना कि आलोचना का आरंभिक और विकासात्मक स्वरूप क्या रहा.

            आरंभिक काल में पत्र-पत्रिकाओं की सम्पादकीय टिप्पणियों, प्राप्ति स्वीकारों और यदाकदा सम्पादक के नाम पत्रों के ही रूप में आलोचना दिखाई पड़ती है. लेकिन धीरे-धीरे यह स्वरूप बदलता है. पुस्तक-परिचय वाली शैली ही समसामयिक पुस्तकों की विस्तृत आलोचनाओं के रूप में विकसित होती है. आनंद-कादम्बिनी की संयोगिता-स्वयंवर और बंग-विजेता तथा हिन्दी प्रदीप की सच्ची समालोचना इसी शैली के प्रौढ़ उदाहरण हैं. इसमें पुस्तक परिचय का हल्कापन नहीं है. इनमें सत् साहित्य को प्रोत्साहन और असत् के बहिष्कार की सदिच्छा ही प्रधान है, इसलिए ये समीक्षाएँ गंभीर और विश्लेषणात्मक है.3

Friday, July 6, 2012

*** फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ : निर्वासन के दर्द का अहसास




शहूर उत्तरउपनिवेशवादी चिंतक एडवर्ड सईद ने कई अन्य पाश्चात्य चिंतकों की तरह निर्वासन के शिकार या विस्थापित लेखकों और अपने मुल्क से दूर कर दिये गये नागरिक समूहों के बारे में विस्तार से लिखा है। अपने इसी सैद्धान्तिक चिंतन के बीच उन्होंने महमूद दरवेश और फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का भी ज़िक्र किया है। वे फ़ैज़ से बेरूत में उन दिनों मिले थे जब पाकिस्तान में ज़ियाउल हक़ की फ़ौजी तानाशाही फै़ज़ जैसे जम्हूरियतपसंद अदीबों और दानिशवरों पर किसी भी तरह का कहर बरपा कर सकती थी। फै़ज़ से अपनी मुलाक़ात का ज़िक्र करते हुए एडवर्ड सईद ने अपने एक लेख, 'निर्वासन पर कुछ चिंतन´ में लिखा :
कई बरस पहले मैंने अपने ज़माने के उर्दू के अज़ीमतर शायर फै़ज़ अहमद फै़ज़ के साथ कुछ वक़्त बिताया था। वे अपने वतन पाकिस्तान में ज़िया के फ़ौजी शासन के चलते निर्वासित हो कर बेरुत आ गये थे जहां उनका एक तरह से स्वागत हुआ। फि़लिस्तीनी उनके स्वाभाविक तौर से जिगरी दोस्त थे। मैंने महसूस किया कि उन में आपस में बड़ी गहरी आत्मीयता थी जब कि उनकी न तो ज़बान या शेरी रवायत या ज़िंदगी की तारीख़ ही उनसे मिलती जुलती थी। सिर्फ़ एक बार मैंने फै़ज़ को अपने निर्वासन के दर्द से उबरते हुए देखा था जब उनके एक पाकिस्तानी दोस्त, इक़बाल अहमद बेरुत आये थे जो खु़द भी निर्वासित थे। हम तीनों एक गंदे से रेस्त्रां में देर रात तक जमे रहे, फै़ज़ अपनी नज़्में सुनाते रहे। कुछ देर बाद इक़बाल और उन्होंने हमारे लिए नज़्मों का तर्जुमा करना बंद कर दिया। जैसे रात गुज़रती गयी, इससे कोई दुश्वारी पेश नहीं हुई। जो मैं देख रहा था, उसके लिए किसी तर्जुमे की दरकार नहीं थी। यह नज़ारा एक तरह से प्रतिरोध के स्वर से भरी घरवापसी जैसा था, मानो वे कह रहे हों, 'ऐ ज़िया, ले हम आ गये, लाज़िम है, हम भी देखेंगे।´ ज़िया तो असलियत में अपने मुल्क में ही था, वह उनके प्रतिरोध की आवाज़ नहीं सुन रहा था।

Sunday, May 6, 2012

*** शमशेर : इतने पास अपने


मशेर से मुलाक़ात उस समय हुर्इ थी जब वे दिल्ली विश्वविधालय की टयूटोरियल लाइब्रेरी बिलिडंग की पहली मंजि़ल पर एक कमरे में उर्दू विभाग की एक योजना के तहत 'उर्दू-हिंदी शब्दकोश' बनाने के काम के सिलसिले में रोज़ बैठते थे और मैं एम. ए. अंग्रेज़ी करने के दौरान और फिर एक सांध्य कालेज में अंग्रेज़ी के लेक्चरर हो जाने के बाद हिंदी एम ए करने के दौर में यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी में ही ज़्यादा समय बिताता था। मेरा यह सिलसिला 1967 से 1980 तक जारी रहा। मेरा ज़्यादातर लेखन भी उस दौर में लाइब्रेरी में ही हुआ था। शमशेर के बाद उसी काम में त्रिलोचन शास्त्री भी लगे थे और उनके साथ भी उसी तरह की बैठकबाज़ी होती थी, बल्कि वे तो खु़द लाइब्रेरी में आकर मुझे तलाश कर लेते थे और दिन में कर्इ बार पान या चायपान के लिए बाहर निकाल ले जाते थे। शमशेर संकोची थे, उन से तो उनके कमरे में ही जाकर मिला जा सकता था। फ़रवरी 1976 में मैं भी माडल टाउन में 'के' ब्लाक के एक मकान की छत पर बनी दो कमरे की बरसाती में शिफ्ट हो गया था। उन दिनों माडल टाउन लेखकों की एक बस्ती की तरह लगता था, हर गली में एक दो लेखक रह रहा था, डा. नगेंद्र, रामदरश मिश्र, राजकुमार शर्मा, आनंद प्रकाश, सुधीश पचौरी, मलयज, मुरलीमनोहरप्रसाद सिंह, अजित कुमार और स्नेहमयी चौधरी, कृष्णदत्त पालीवाल, विश्वनाथ त्रिपाठी, रवींद्रनाथ श्रीवास्तव, बालस्वरूप राही आदि सभी उसी बस्ती में रहते थे, वियोगी हरि भी माडल टाउन से लगे किंग्ज़वे कैंप की हरिजन कालोनी में रहते थे हालांकि मैंने कभी उन्हें देखा नहीं और न ही मैं उन्हें पहचानता था, मुझे यह सच भी नहीं लगता था। शमशेर उस समय मलयज के परिवार के साथ, जी-328 नं0 के मकान के ग्राउंड फ्लोर पर रहते थे जहां अक्सर रविवार को मैं गपशप के लिए चला जाता था, वहां प्राय: मलयज से भी मुलाक़ात हो जाती थी। त्रिलोचन जो बाद में आये थे, वहीं पास ही में एक बरसाती में रहने लगे थे, उनसे तो लाइब्रेरी के प्रांगण में हो ही जाता था, इसलिए घर पर 'सत्संग करने की नौबत नहीं आती थी, मगर शमशेर से मिलना उनके आवास पर ही होता था। त्रिलोचन मेरे घर पर भी आ जाते थे, मगर शमशेर ने सिर्फ़ एक बार 'सरप्राइज़ दिया।

Wednesday, April 11, 2012

*** ख़बर और लोकप्रियतावाद



ज यदि हम अपने समय के उपलब्ध मीडिया उत्पादों पर नज़र डालें तो पायेंगे कि वे अधिक से अधिक व्यावसायिक लाभ कमाने, अधिक से अधिक लोकप्रिय होने और अत्यधिक सत्ता प्राप्त करने की प्रक्रिया में विकसित हुए हैं | बाज़ारवादी मीडिया व्यवस्था किसी भी कीमत पर इन तीन उद्देश्यों को प्राप्त करना चाहती है और इस क्रम में वह वास्तव में नागरिकता की समझ और उसके व्यवहारों को हटाकर उसकी जगह स्वच्छंद स्वभाव के उपभोक्ता को बनाना चाहती है जो अपने पुराने मूल्यों और परम्पराओं से तो संघर्ष करे लेकिन साथ ही वह स्वयं भी एक उत्पाद में परिवर्तित होता चला जाए | उसके उत्पाद में बदलने से यह फ़ायदा होता है कि मीडिया कम्पनियाँ अपने पाठकों-दर्शकों-श्रोताओं को भी बेचती हैं और सारी दुनिया की मार्केट में अपनी साख पैदा करती हैं | इस लिए यह मीडिया व्यवस्था सतही तौर पर तो बेहद आधुनिक और लोकतांत्रिक वातावरण बनाने वाली इकाई दिखती है लेकिन बहुत ही सावधानी के साथ देखा जाए तो उन्होंने मनुष्य की मुक्ति के रास्तों को अब तक के इतिहास में सबसे कठिन बना दिया है | इस समूची व्यवस्था को टेक्नोलॉजी का भी ऐतिहासिक समर्थन प्राप्त है जिसके कारण इसकी संरचना को तोड़न लगभग असंभव है | उसके पास लोगों के समय और उनकी पसंद का बेजोड़ अध्ययन है जिसके बल पर वह उन्हें मनोरंजन के नशे में लगातार बेहोश करती है और कभी भी उनमें विचार करने की ऐसी क्षमता पैदा नहीं होने देती जिससे वे तटस्थ और स्वतंत्र होकर अपने असल मुद्दों की पहचान कर उसका सही विश्लेषण कर सकें | सच कहा जाए तो उसने बहुत ही खूबी से जनता के अड्डों (पब्लिक स्फेयर) का प्रबंधन सीख लिया है | वह लोगों और उनकी मनःस्थिति का व्यापार तो करती ही है साथ ही वह उनके मन को कई खण्डों में विभाजित कर हमेशा तनाव में रखना चाहती है जिससे कभी भी वह तसल्लीबख़्श होकर एकजुट एकाग्रता की स्थति को प्राप्त न होने पाए | यही कारण है कि लोकतांत्रिकता की आड़ में हमारे पास सूचनाओं का अम्बार तो लग जाता है लेकिन सम्प्रेषण के मामले में हम लगातार गरीब होता जा रहें हैं |

Sunday, April 8, 2012

*** बोलियों के साहित्य का सरोकार


ज अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी पर निर्भर देश के अंदर बढ़ रहे आक्रामक पूंजीवाद की पृष्ठभूमि में बाजार समर्थक लेखकों की उपस्थिति चिंताजनक है। इसी आक्रामक पूंजीवाद के दौर में एक तरह का आक्रामक व्यक्तिवाद भी विकसित हो रहा है। हमारे यहाँ के मध्यवर्ग में उस विकृत चेतना का देखा-देखी में विकास हो रहा है। यह वर्ग अपने लिए अधिकाधिक सुख-सुविधाएँ जुटाना अब गुनाह नहीं मानता। निजी स्वार्थलिप्सा में डूबे हुए कुछ लेखक भी इस क्रम में दिखाई पड़ जाते हैं। ऐसे लेखक पद और पुरस्कारों के लिए सत्ता के गलियारे में चक्कर मारते हैं और विभिन्न अकादमियों के अध्यक्ष और सचिवों की चापलूसी करने में वे संकोच नहीं करते। ऐसे लेखकों के सामने रखकर अगर आज के साहित्यिक परिदृश्य को रखकर निष्कर्ष निकाला जाए तो वह एकांगी होगा।

दरअसल साहित्य का सृजन और साहित्य की जनता तक पहुँच एक व्यापक परिदृश्य में देखने के लिए आमंत्रित करती है। विभिन्न क्षेत्रों में खड़ी बोली हिंदी के हजारों की तादाद में ऐसे रचनाकार हैं जिनकी रचनाएं भले किताब के रूप में नहीं छपती हैं और न पत्र-पत्रिकाओं में आती हैं लेकिन ये विभिन्न अंचलों में आयोजित साहित्यिक कार्यक्रमों में काव्य-पाठ, गीतों के गायन, कहानी-पाठ या नाटकीय ढंग से कोई वार्तालाप सुनाने की एक नई कला विधा के दारा अपनी रचनात्मकता और जन सरोकार प्रदर्षित करते हैं।