Wednesday, August 13, 2008

तुलसीदास की प्रासंगिकता

जब तक मानव जीवन में रूढ़िवाद बना रहेगा तब तक तुलसीदास प्रासंगिक रहेंगे. तुलसीदास की मुख्य समस्या थी कलियुग, एवं मुख्य विकल्प था रामराज्य. कलियुग अर्थात "कलि बारहि बार दुकाल परै, बिन अन्न दु:खी सब लोक मरै". कलि की पहचान भूख, गरीबी और मृत्यु हो. यह कोई दैवी प्रकोप नहीं है. यह समाज की भौतिक अवस्था है जिसके लिए मुख्यत: सत्ताधिकारी ही जिम्मेदार हैं. "जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी, सो नृप अवस नरक अधिकारी".
तुलसीदास को शुद्रविरोधी और नारीविरोधी भी कहा जाता है, लेकिन इसे स्वीकार करना मुश्किल है. शेक्सपीयर के नाटकों में नारी को डायन कह कर मारा जाता है. वे उसकी भर्त्सना भी करते हैं और कहीं समर्थन भी. तुलसीदास भी नारी वेदना को समझने वाले महान संत थे. "कत विधि सृजि नारि जग माही, पराधीन सपनेहु सुख नाहीं". पातिव्रत धर्म स्त्री की पराधीनता है.जब तक नारी पराधीन रहेंगी तुलसी प्रासंगिक रहेंगे. ऐसा समाज था जहां पुरूषों के लिए बंधन नहीं पर नारी के लिए था. अर्थात संबंधों की विषमता थी. इस विषमता को तुलसी ने रेखांकित किया. समाज के संबंधों में विषमता का अर्थ है दासता. सामाजिक बुराईयां इन्हीं विषमता से पैदा होती है. इस विषमता का जवाब था राम का आचरण. मानव संबंधों में समानता की खोज तुलसीदास रामचरित के रूप में करते हैं. एक पत्नीव्रता रूप. राम के सर्वप्रिय पात्र हैं निषाद और शबरी. निषाद लोक, वेद, शास्त्र और समाज सारे दृष्टि से इतने नीच थे कि जिसकी छाया पर जाए तो आदमी भ्रष्ट हो जाय. वह राम के अनन्य सखा हैं. सामंती समाज में जो सबसे अधिक प्रताड़ित है राम उन सबके निकट हैं. इसलिए तुलसीदास प्रासंगिक हैं. 500 वर्ष पहले जो समस्यायें तुलसीदास के समय थी वह आज भी है. अत: तुलसीदास के संघर्ष से भी हमारा संबंध है.
भक्त कवियों का आत्मानुभव उनके ईश्वर को ढालता है, इसलिए संत कवियों के नायक राजपाट से दूर सामान्य जीवन में साधारण रूप में ही रमते हैं. तुलसी के राम भी राजाओं या सामंतों के रूप में ढले नहीं हैं. राम सारे जीवन मूल्य के एकमात्र प्रतीक हैं जिनकी भक्ति में भक्त का गौरव ऊँचा हो जाता है.
मर्यादा पुरूषोत्तम जगह जगह मर्यादा तोड़ते हैं और नए मर्यादा का सूत्रपात कर उसके पुरूषोत्तम बनते हैं. राम अपने भक्त के लिए अधीर होते हैं. पहली बार ऐसा भगवान दिखाई देता है जो अपने भक्त के लिए अधीर होते हैं. इसी का परिणाम होता है कि भक्त भगवान को अपने वश में कर लेते हैं. हनुमान इसके उदाहरण हैं. भगवान भक्त के वश में आ जाते हैं. इस वश में आने का मुख्य कारण प्रेम है. भक्ति का मतलब ही है प्रेम. यही भक्ति साधारण और हीन मनुष्यों को आत्मगौरव प्रदान करने का माध्यम बनता है. मनुष्य की श्रेष्ठता इस भक्ति का दर्शन है.
तुलसी का आत्मानुभव राम से जुड़ता है. भक्ति इन कवियों के सामाजिक अपमान के भीतर से पैदा हुई शक्ति है. जब सामाजिक उत्पीड़न का विकल्प समाज में न हो तब उसका विकल्प दर्शन या आध्यात्म में होता है. इसलिए इसे आधार बनाकर भक्तों ने अपने अनुभव के सांचे में अपने ईश्वर को ढाला. चूंकि भक्त मनुष्य थे इसलिए उनके मन में कमज़ोरियां भी थी, ईश्वर इन कमजोरियों से दूर थे इसलिए वे उनके आदर्श थे. ईश्वर के रूप में जिस आदर्श की खोज भक्त कवि करते हैं उसी अनुरूप वे संघर्ष करते हैं. अपने माता-पिता के प्रति निंदा का भाव तुलसीदास के मन में है लेकिन राम के मन में नहीं. भक्ति यदि एक सिरे पर सामाजिक विद्रोह है तो दूसरे स्तर पर आत्मसाधना भी. भक्ति सामाजिक भी है और व्यक्तिगत भी. भक्ति एक ऐसी प्रेरणा है जिसने पूरे मनुष्य को उसकी सम्पूर्णता में पाने की कोशिश की. "जो सहजै विषया तजै" यही सहज साधना है कबीर की. सहज होना साधना चीज़ है.
वाल्मीकि की कथा का प्राण था शोक. शोक से श्लोक पैदा होता था. भवभूति की आत्मा करूणा थी, तुलसीदास की आत्मा संघर्ष थी जो राम के पूरे जीवन में व्याप्त है. करूणा, शोक, संघर्ष राम की कथा का सार है. वह भी जीवन व्यापी रूप में किसी ईश्वर में नहीं है. ये तीनों मनुष्य की परिस्थितियां हैं. मानव जीवन है. इसलिए राम का तादात्म्य बैठता है. राम कथा में व्यक्त वेदना मनुष्य के जीवन व संबंधों से पैदा होती है. वेदना अनैतिक आदमी में उत्पन्न नहीं होती.
पहले देवकथा देववाणी में लिखी जाती थी, तुलसी व सभी भक्त कवियों ने बोलचाल की भाषा में ईश की अराधना की. सामाजिक, धार्मिक या आध्यात्मिक के साथ भाषायी रूढ़िवाद से भी भक्तों ने संघर्ष किया. भारत में संस्कृत के वर्चस्व के विरूद्ध धर्म रूप में ही सही बोलचाल की भाषा सामने आई. सांस्कृतिक निरंतरता का प्रतीक राम के रूप में आया, वाल्मीकि, तुलसी, निराला तक. बंगाल के कृत्तिवास, दक्षिण में कंबन, महाराष्ट्र में रामदास और उत्तर में तुलसी ने एक समय में राम की कथा लिखी. राम उस समय के हिन्दुस्तान की राष्ट्रीय एकता के प्रतीक हैं. एटकिन्स नामक पादरी ने 18वीं सदी में रामचरित मानस का अनुवाद किया, रूस के वारानिक्कोव ने 20वीं सदी में रूसी भाषा में मानस का अनुवाद किया. वे नास्तिक थे. भारत की सांस्कृतिक छवि तुलसी के मानस से बनती है. तुलना करने पर मानस लैटिन और यूनानी भाषा के सर्वमान्य ग्रंथों से श्रेष्ठ सिद्ध होता है. भक्ति की अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ स्रोत भी इस युग में जुड़ा है.
सारे भक्त कवि किसान और कारीगर समुदाय के लोग थे. भक्ति नि:स्वार्थ होता है. समाज में नए वर्गों की नये सामाजिक शक्तियों की गतिशीलता से भक्ति पैदा होती है. कारीगरों का उत्थान व्यापार की उन्नति से जुड़ा है. व्यापार एक सामाजिक शक्ति है. पूराने सामंती ढांचे के भीतर व्यापार की शक्तियों के विकास ने गति पैदा की. पूराने सामंती ढांचे को इस गति ने कमजोर किया. इन सभी शक्तियों ने अपने साथ नयी भाषा और नयी संस्कृति पैदा की.
तुलसी शंकर के मायावाद का खंडन करते हैं और जगत का सत्य मानते हैं. क्योंकि राम यदि हैं तो वह इस संसार से परे नहीं हो सकते. तुलसी के अनुसार ब्रह्म रूप में बंधा है और उसके रूप की कोई सीमा नहीं है."हरि व्यापे सर्वत्र समाना, प्रेम से प्रकट होई मैं जाना". प्रत्यक्ष और परोक्ष ब्रह्म दोनों एक हैं. "सगुन अगुन दुई ब्रह्म सरूपा" तुलसी ब्रह्म को प्रणाम करने के लिए ब्रह्म में नहीं संसार में जाते हैं. अतीत की बहुत सी दार्शनिक प्रणालियां और वर्तमान समाज की उपासना पद्धतियां तुलसी में मिल गई थी. अपने विश्वास को कायम रखना समन्वयवाद नहीं है. विचारों और पद्धतियों का प्रभाव समाज में एकता लाने की आवश्यकता के कारण हुआ.