Thursday, July 17, 2008

मैला आंचल : एक निजी प्रतिक्रिया

`मैला आंचल' एक कला-कृति है इसलिए उसके प्रति निजी प्रतिक्रिया का ही महत्त्व हो सकता है. किसी साहित्यिक रचना को हृदयंगम करने का ही मानी है, न कि विभिन्न प्रतिमानों पर उसकी परीक्षा कर उसे ग्रहण करने का. मेरा अनुभव है कि बहुत कम ऐसी आलोचना लिखी गयी है, जो पाठकों के मन में उतरनेवाले किसी रचना के बिंब को निखारती है. उसमें कारगर आलोचना को ही सार्थक कहा जा सकता है, वही सर्जनात्मक आलोचना है, वर्ना शेष आलोचनाएं किसी न किसी अंश में अनिवार्यत: ध्वंसात्मक होती हैं. किसी रचना का मन में उतरनेवाला बिंब अनालोचनात्मक होगा, यह सोचना ग़लत है. यह तो उस ग्रहीता पर निर्भर है कि किसी कृति को ठीक ढंग से ग्रहण करने के लिए उसने अपने को कितना तैयार किया है, यानी कितनी परिपक्वता हासिल की है. तुलसीदास के शब्द लेकर कहें तो अपने `मन-मुकुर' को कितना `सुधारा' है.
`मैला आंचल' की कथात्मक संरचना बहुत नई किस्म की है. उसमें शुरू से अंत तक चलनेवाले अनेक पात्र हैं, अनेकानेक घटनाएं भी घटती हैं, लेकिन उनसे कोई सुसंबद्ध कथा नहीं बनती. `गोदान' की संरचना भी `सेवासदन' जैसे सुगठित उपन्यास से भिन्न है. उसे कहानियों का गुच्छा भी कहा गया है, लेकिन उसमें एक की जगह दो कथाएं हैं, जो प्राय: समानांतर प्रवाहित होती हैं. `मैला आंचल' में न इकहरी कथा है, न दोहरी, इसलिए उसका कोई नायक या मुख्य पात्र नहीं है, न बालदेव, न कालीचरन, न बावनदास और न डाक्टर प्रशांत। इनमें से निश्र्चय ही बावनदास एक ऐसा पात्र है, जो पूरे उपन्यास के विस्मृत हो जाने के बाद भी स्मृति में ठुंका हुआ रह जाता है. वह हिन्दी उपन्यास का एक विलक्षण और अमर पात्र है और असाधारण रूप से सार्थक, लेकिन बावजूद इसके वह `मैला आंचल' का नायक नहीं है. रेणु ने अपने उपन्यास का ऐसा रचना-विधान क्यों रखा है कि उसमें कथानक का विघटन दिखलाई पड़ता है? विद्वानों ने बार-बार कहा है कि उसमें अंचल-विशेष ही नायक है. `आंचलिक उपन्यास' लिखने के लिए यह करना आवश्यक था. वैसा न करने पर पूरा अंचल अपने अंतर्बाह्य जीवन के साथ उपस्थित नहीं हो पाता. इस कथन में सच्चाई है, लेकिन इससे ऐसी प्रतीति होती है कि रेणु ने जान-बूझकर, अपने अंचल को नायकत्व प्रदान करने के लिए, उपन्यास में कोई सुदृढ़ कथानक नहीं रखा. अधिक संगत अनुमान यह है कि नए यथार्थ को चित्रित करने के क्रम में नई संवेदना वाले कथाकार के द्वारा `मैला आंचल' का नया रचना-विधान स्वयं आविष्कृत हो गया है. प्रत्येक मौलिक प्रतिभा अपनी अभिव्यक्ति के लिए नया रास्ता ढूंढती है, या पुराने रास्ते को ही तोड़-फोड़कर नया बना लेती है. ऊपर `नए यथार्थ' इन दो शब्दों का जो प्रयोग किया गया है, उनमें मैं `नए' और `यथार्थ' दोनों शब्दों पर ज़ोर देना चाहूंगा.
रेणु ने जिस अंचल को `मैला आंचल' में नायकत्व प्रदान किया है, वह कैसा अंचल है? यह उपन्यास दो खंडों में विभाजित है. पहले खंड का संबंध आज़ादी के पहले के काल से है और दूसरे का उसके बाद के काल से, लेकिन इसका नाम `मैला आंचल' पूरे उपन्यास के लिए है, जिससे भ्रम होता है कि यह अंचल शुरू से लेकर अंत तक दाग़दार है. जब हम इस उपन्यास के मुख्य पात्रों का `पतन' देखते हैंज्ञ् बालदेव, कालीचरन और डाक्टर प्रशांत का, जो क्रमश: लछमी, मंगला और कमली नामक युवतियों के प्रेमपाश में बंधते चले जाते हैं, तो उक्त भ्रम की पुष्टि होती है. उसे कांग्रेसी और सोशलिस्ट नेताओं और कार्यकर्ताओं का पतन और दृढ़ करता है. उनके साथ कम्युनिस्टों को भी रखा जा सकता है, जो चलित्तर कर्मकार जैसे अपराधकर्मी पर से वारंट हटाने की मांग करते हैं. लेकिन वस्तु-स्थिति यह है कि `मैला आंचल' सर्वथा नकारात्मक अर्थों में प्रयुक्त नाम नहीं है. इसका पता इसके स्रोत से भी चलता है. रेणु ने यह नाम पंतजी की प्रसिद्ध कविता `भारतमाता ग्रामवासिनी' की इन पंक्तियों से लिया है, जिनको हम यथास्थान इस उपन्यास में उद्धृत भी पाते हैं : `खेतों में फैला है श्यामल/ धूल भरा मैला-सा आंचल!' इन दोनों पंक्तियों में से दूसरी पंक्ति पर ही नहीं, पहली पंक्ति पर भी ध्यान देने की ज़रूरत है, जिसका भाष्य रेणु की आगे की पंक्तियों में देखने को मिलता है, जो कवित्व की दृष्टि से बेजोड़ हैं : `मैला आंचल! लेकिन धरती माता अभी स्वर्णांचला है! गेहूं की सुनहली बालियों से भरे हुए खेतों में पुरवैया हवा लहरें पैदा करती है. सारे गांव के लोग खेतों में हैं. मानो सोने की नदी में, कमर भर सुनहले पानी में सारे गांव के लोग क्रीड़ा कर रहे हैं. सुनहली लहरें!' बात खेतों की ही नहीं, मनुष्यों की भी है. संभवत: इसी बात को ध्यान में रखकर रेणु ने `मैला आंचल' की भूमिका में लिखा है कि उसमें शूल भी है और गुलाब भी, कीचड़ भी है और चंदन भी.
`मैला आंचल' की आंचलिकता के केंद्र में वस्तुत: एक ही गांव हैज्ञ् मेरीगंज। निस्संदेह वह बड़ा गांव है, जिसमें `बारहो बरन के लोग रहते हैं', फिर भी वह गांव ही है, राज्य, जिला, सब डिवीजन और थाना क्या, अंचल भी नहीं. इस तरह यह पूरी तरह से `स्थानिक' उपन्यास है, फिर प्रश्न उठता है कि इसमें `सार्वदेशिकता' कैसे संभव है? प्रेमचंद में भी यदि `स्थानिकता' है, तो वह सीमित रूप में है, यानी स्थानीय रंग उनमें कहीं भी इतना प्रगाढ़ नहीं है कि रचना को दूसरे स्थानों की कथा बनने से रोके, लेकिन रेणु की तो पूरी रचना `स्थानिकता' के रंग में इस कदर सराबोर है कि वह स्थानीय पाठकों को कितना भी आनंद क्यों न दे, उसकी संप्रेषणीयता सीमित हो गई है. यही कारण है कि बिहार से धुर दूर पड़ने वाले हिन्दी भाषी क्षेत्रों में उसे पाठ्य पुस्तक बनाया गया, तो उसे लेकर विवाद खड़ा हो गया. इस प्रसंग में भी हमें `मैला आंचल' की भूमिका में कही गई कथाकार की एक बात को स्मरण करना चाहिए. उसने पूर्णिया का जिक्र करते हुए कहा है कि `मैंने इसके एक हिस्से के एक ही गांव को पिछड़े गांवों का प्रतीक मानकर इस उपन्यास-कथा का क्षेत्र बनाया है.' एक ही गांव क्यों? इसलिए कि रक्त की परीक्षा के लिए उसकी एक ही बूंद आवश्यक है, संपूर्ण शरीर का रक्त नहीं. भारत गांवों का देश है, रेणु का विश्वास था कि एक गांव के यथार्थ से पूरे देश के यथार्थ को बेहतर ढंग से जाना जा सकेगा. यदि वे `मैला आंचल' की कथा को मेरीगंज तक ही सीमित न रखते, तो चित्र में व्यापकता तो आती, लेकिन वह दूर से उतारा गया चित्र होता, `क्लोज़-अप' नहीं, जिससे कि चेहरे की एक-एक रेखा को जाना जा सके. कहा गया है कि एक अर्थ में सारे उपन्यास `रिजनल' होते हैं, क्योंकि उनका कोई न कोई कथा-क्षेत्र होता ही है, लेकिन सभी `मैला आंचल' की तरह अपने क्षेत्र को `फ़ोकस' नहीं करते, इसलिए उन्हें `आंचलिक' नहीं कहा जा सकता. यह क्या स्वातंत्र्योत्तर काल में साहित्य में ज़ोर पकड़ते यथार्थवादी रुझान का परिणाम नहीं है?
मेरीगंज वाकई एक बड़ा गांव है, जिसमें ऊंची जातियों के भी टोले हैं और अनेक पिछड़ी जातियों के भी. साथ-साथ संथाल भी हैं. इन सबों की अपनी सामाजिक और आर्थिक स्थिति है, जो इनके आपसी संबंध के साथ परिवर्तनशील है. रामकिरपाल सिंह और शिवशक्कर सिंह राजपूत टोले के मुखिया हैं, तहसीलदार विश्वनाथ प्रसाद कायस्थ टोले के और यादव टोले के खेलावन सिंह यादव. इनमें से तहसीलदार विश्वनाथ प्रसाद को रेणु ने कुछ अधिक अहमियत दी है, क्योंकि वे बाद में कांग्रेस पार्टी के सदस्य भी बनते हैं. इसके अलावा वे कमली के पिता भी हैं. इन चरित्रों के अलावा `मैला आंचल' में बालदेव, कालीचरन और बावन दास जैसे चरित्र हैं, जो राजनीतिक चरित्र हैं. डाक्टर प्रशांत गांव के मलेरिया सेंटर में जन-कल्याण तथा अपने शोध के लिए आया है, जो कमली की चिकित्सा के क्रम में उससे प्रेम करने लगता है और अंत में जिसे पुलिस कम्युनिस्ट होने का झूठा इलज़ाम लगाकर पकड़कर जेल में डाल देती है. मेरीगंज में एक संपन्न कबीरपंथी मठ भी है, जिसके महंत सेवादास, सेवक रामदास, जो बाद में महंत भी बनता है, और कोठारिन लछमी भी इस उपन्यास में कमोबेश जगह घेरते हैं. मुख्यत: इन्हीं चरित्रों से `मैला आंचल' का कथा-पट बुना गया है. सुमरितदास, जोतखीजी, खलासीजी, फुलिया, रमपियरिया आदि इस कथा-पट के रंगीन धागे हैं. इनमें राजपूतों के संरक्षण में पलने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संयोजकजी भी हैं, जो जमींदार-रैयत-संघर्ष में हमेशा जमींदारों का पक्ष लेते हैं और हिन्दू-राज का स्वप्न देखते रहते हैं : `जिस तरह यह तहसीलदारी कायस्तों के हाथ से राजपूतों के हाथ में आई है, उसी तरह सारे आर्यावर्त के राजकाज का भार हिन्दुओं के हाथ में आएगा. और उस दिन आर्यावर्त के कोने-कोने में हिन्दू-राज की पताका लहराएगी.' संयोजक की यह टिप्पणी उस समय की है, जब शिवशक्कर सिंह ने बहुत कोशिश करके और मैनेजर को पूरे चार सौ रुपये देकर तहसीलदारी विश्वनाथ प्रसाद से छीनकर अपने बेटे हरगौरी को दिला दी है. इससे ऊंची जातियों के आपसी संबंध को समझा जा सकता है.

तहसीलदार विश्वनाथ प्रसाद, डाक्टर प्रशांत और लछमी सहित इस उपन्यास के राजनीतिक चरित्रों को थोड़ा नज़दीक से देखना ज़रूरी है, क्योंकि ये चरित्र आज़ादी के संघर्ष के दिनों से लेकर आज़ादी मिलने के बाद तक की राजनीति का चित्र बहुत गहराई और तटस्थता से प्रस्तुत करते हैं. सबसे पहले बालदेव और कालीचरन.
बालदेव निष्ठावान कांग्रेसी कार्यकर्ता हैं. वह महात्मा गांधी से अत्यधिक प्रभावित है और बात-बात में हिंसा का विरोध करता है. लेकिन वह गांधी के अहिंसा-सिद्धांत को नहीं समझता, जैसी कि बाकी कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की भी स्थिति थी. गांधी ने `सत्य' और `अहिंसा' इन दो शब्दों का प्रयोग किया था. सत्य उनका साध्य था और अहिंसा उसे प्राप्त करने का साधन. अहिंसा को सत्य से अलग कर देने का अर्थ होता था उसके क्रांतिकारी अंतर्य से उसे अलग कर निहायत गैर-क्रांतिकारी बना देना बुजदिली का पर्याय। बालदेव की अहिंसा ऐसी ही थी, इसीलिए वह दोनों नाजुक मौकों रामदास की जगह लरसिंघदास को मठ की महंती देना और सहदेव मिसिर को दुराचार के दंड से मुक्त करना पर सत्य का पक्ष लेने वाले कालीचरन का विरोध करता है, क्योंकि वह `हिंसाबादी' है. इतना ही नहीं, अहिंसा के नाम पर वह असत्य का समर्थन करता है, जिसके पीछे उसकी कमज़ोरी भी बोलती है. कांग्रेसी कार्यकर्ता होने के चलते कंट्रोल के ज़माने में उसे कपड़े की पुर्जी बांटने का अधिकार मिलता है, जिसके साथ उसका चारित्रिक पतन शुरू होता है. उसमें माध्यम बनती है लछमी, जिसके शरीर की `सुगंधी' से वह धीरे-धीरे मत्त बनता जाता है और अंतत: वह उसे मठ में वैरागी बनाकर रख लेती है. नए महंत रामदास और उसकी दासिन रमपियरिया के साथ संघर्ष बढ़ने पर लछमी बालदेव को लेकर अलग झोंपड़ी बनाकर रहने लगती है. महंत सेवादास उसे मठ की ज़ायदाद का एक हिस्सा दे गए थे. दोनों उसी पर गुज़र करते हैं. दोनों के बीच पति-पत्नी वाला रिश्ता है. फलस्वरूप बालदेव लछमी को अपनी मिल्कियत समझने लगता है और किसी अन्य पुरुष के संपर्क में आने पर उसके चरित्र पर भी संदेह करता है। काशी के बिदियारथीजी वाले प्रसंग में उसका संदेह उग्र रूप धारण करता है. मतलब यह कि बालदेव वैरागी नहीं, अब पूरा `संसारी' है. उसके पतन का चरम रूप वहां दिखलाई पड़ता है, जहां बावनदास की तरक्की की आशंका से उसके नाम लिखे बापू के पत्रों का पुलिंदा उसके निर्देशानुसार कांग्रेसी नेता गांगुलीजी को न सौंपकर उन्हें मठ की धूनी में जला देने का प्रयास करता है. लेकिन ऐसा लगता है कि भलमनसाहत किसी मात्रा में उसमें शेष थी, जिससे बाद में लछमी के व्यवहार से द्रवित होकर वह अपने किए पर अश्रुपात करता है.
वह एक `टिपिकल' कांग्रेसी चरित्र भी है, इसलिए उसका चरित्र पूरी पार्टी के पतन को प्रतीकित करता है. यह पतन वस्तुत: आज़ादी के पहले विभिन्न प्रांतों में कांग्रेसी मंत्रिमंडल के गठन के साथ ही शुरू हो गया था. १९४७ के कांग्रेसी मंत्रिमंडल के समय पूर्णिया में एक अंग्रेज कलक्टर आया था. उसने ज़मीन पर संथालों का हक दिलाने की दिशा में कुछ प्रयास किया था, जिसका परिणाम यह हुआ कि जिले भर के भूमिहार, जमींदार और घबरा गए. अधिकांश नेता भूमिहार थे. उन्होंने अंग्रेज कलक्टर पर यह इलजाम लगाकर कि वह संथालों को भड़काकर, अशांति फैलाकर, कांग्रेसी मंत्रिमंडल को असफल बनाने का षड्यंत्र कर रहा है, उसकी तुरंत बदली करा दी. `कांग्रेस संदेश' के संपादकीय में संथालों के प्रति थोड़ी सहानुभूति प्रकट की गई थी. जिला मंत्री ने आंखें तरेरकर संपादक विद्यालंकार से कहा था `विद्यापीठ का शास्त्र यहां काम नहीं देगा.' बालदेव को अफसोस है कि वह खेलावन भैया की ज़मीन कायमी बटाईदार कलरू पासवान से छुड़ाकर उन्हें नहीं दिला सकता, क्योंकि कालीचरन के कारण पासवान टोले में अब उसकी पैठ नहीं रही. वह क्षोभ से भरा हुआ है कि चौधरीजी की इतनी सेवा की, लेकिन जिला कमेटी के मेम्बर तहसीलदार साहब हो गए. कपड़े की मेम्बरी भी नहीं रही. नमक कानून के समय जेल जाने का यही इनाम मिला है. इस तरह कांग्रेस में सत्ता लोभ का आरंभ हुआ. उससे भिन्न बावनदास का चरित्र है, जो कांग्रेस के पतन से बेजार है. एक रात वह पिकेटिंग के दिनों को याद करते हुए बालदेव से कहता है, `चानमल मरबाड़ी के बेटा सागरमल ने अपने हाथों सभी भोलटियरों को पीटा था. जेहल में भोलटियरों को रखने के लिए सरकार को खर्चा दिया था. वह सागरमल आज नरपत थाना कांग्रेस का सभापति है. और सुनोगे?... दुलारचंद कापरा को जानते हो न? वही जुआ कंपनी वाला, एक बार नेपाली लड़कियों को भगाकर लाते समय जो जोगबनी में पकड़ा गया था. वह कटहा थाना का सिकरेटरी है.'
पाठकों को निराला की प्रसिद्ध कविता `महंगू महंगा हुआ' याद होगी, जिसमें कांग्रेसियों और मिल मालिकों तथा ज़मीनदारों की मिली भगत का वर्णन है. उसकी कुछ पंक्तियों को यहां उद्धृत करना अप्रासंगिक न होगा. `महगू ने कहा, हां, कंपू में किरिया के/ गोली जो लगी थी/ उसका कारण पंडितजी का शागिर्द है;/ रामदास को कांग्रेस मैन बनाने वाला/ जो मिल का मालिक है/ यहां भी वह ज़मींदार, बाजू से लगा ही है!'
तहसीलदार विश्वनाथ प्रसाद तहसीलदारी छिन जाने के बाद से कांग्रेस के सदस्य हैं, बालदेव के बाद वही कपड़े की पुर्जी बांटते हैं. लेकिन उनका चिंतन यह है कि `बेजमीन लोग अपनी पार्टीबंदी कर रहे हैं, जमीनवालों को भी भेदभाव, लड़ाई-झगड़ों को भूलकर एक हो जाना चाहिए.' जिला कांग्रेस के सभापति का चुनाव होने वाला है. राजपूत और भूमिहार का मुकाबला है. जिले भर के सेठों और ज़मीदारों की गाड़ियां दौड़ रही हैं. कटिहार कॉटन मिल वाले सेठजी भूमिहार पार्टी में है और फारबिसगंज जूट मिल वाले राजपूतों की ओर. पैसे का तमाशा कोई यहां आकर देखे! ज़मींदारी ख़त्म होने की आशंका से कांग्रेसी ज़मींदार शायद अपनी जायदाद मिल खोलने में लगाएं. इसीलिए प्राय: हर छोटे बड़े लीडरों के साथ एक मारवाड़ी घूमता है.
रेणु ने छोटी छोटी बातों से भी कांग्रेस के चारित्रिक पतन को नोट किया है. बावनदास पांच महीने पहले की बात याद करता है, `पुरैनियां टीसन में तीलझाड़ी के शंकर बाबू ने अपने साथ के दस काजकर्ताओं को पूरी मिठाई का जलपान कराया, और पैसा दिया तीलझाड़ी हाट के मारवाड़ी चोखमल जुहारचंद के बेटे ने. आजकल वह अररिया सबडिविजन कांग्रेस का खाजांची है. साठ रुपये जोड़ी की खादी पहनता है. चरखासंघ के बाबू उसकी कितनी खातिर करते हैं! अब कांग्रेसी नेताओं का काम ज़मींदारों को तरह तरह से राहत दिलाना और जनता के सेवकों को पुलिस के हवाले करना है. उनमें से एक छोटन बाबू कहते हैं कि मेरीगंज के डाक्टर (यानी प्रशांत) कम्युनिस्ट था. उसको तो हम्हीं ने एरेस्ट कराया है. कटहा का नया दरोगा हमारा क्लास फ्रेंड है. इस सबकी चरम परिणति इस रूप में होती है कि कटहा थाना कांग्रेस के मंत्री दुलारचंद कापरा की, जो जुआ कंपनी चलाता था और मोरंगिया लड़कियों तथा मोरंगिया दारू गांजा का कारबार करता था, चोरबाजी के कपड़े, चीनी और सीमेन्ट से लदी बैलगाड़ियां, पुलिस के संरक्षण में, उन्हें रोकने के जुर्म में बावनदास को रौंद डालती हैं और वह उसकी क्षत विक्षत लाश को नागर नदी के पार पूर्वी पाकिस्तान में फिंकवा देता है.
बावनदास भी कांग्रेसी कार्यकर्ता ही था. बालदेव `माया' में फंस गया था लेकिन वह महात्मा गांधी में अपनी आस्था अडिग रखे हुए कांग्रेस में बना हुआ था, यद्यपि उसका पतन देखकर भीतर से बहुत बेचैन. आज़ादी की लड़ाई के दौरान कांग्रेसी नेता रामकिसुन बाबू का भाषण और तैवारीजी का देशभक्तिपूर्ण गाना सुनकर वह अपने को रोक नहीं सका था और बालदेव तथा चुन्नी गुसाइं के साथ सुराजियों में अपना नाम लिखा लिया था. अज्ञात कुलशील। जन्मजात साधू, खंजड़ी बजाकर `एक राम नाम धन सांचा जग में कछु न बांचा हो!' गाने और भीख मांगने वाला। डेढ़ हाथ की ऊंचाई. सांवला रंग, मोटे होंठ, विचित्र दाढ़ी और मोटी भोंडी आवाज़. पार्टी में उसके समर्पण भाव से लोग इतने प्रभावित थे कि उसकी पहचान महात्मा गांधी सहित पंडित नेहरू और डा. राजेन्द्र प्रसाद जैसे नेताओं से भी थी. आम धारणा यह है कि गांधी ने राजनीति में धर्म का प्रयोग किया था, लेकिन सच्चाई यह है कि उन्होंने धर्म को युग धर्म अर्थात राजनीति का रूप प्रदान किया था. बावनदास के रूपांतरण से यह अच्छी तरह प्रमाणित है.

मैला आंचल : एक निजी प्रतिक्रिया
बावनदास पर भी दो बार `माया' का हमला हुआ था. एक बार जब वह मुठिया में वसूले गए चावल की बिक्री से दो आने की जलेबियां खा गया था और दूसरी बार जब आश्रम में सोई कांग्रेसी नेत्री तारावती के रूप से कामाविष्ट हो गया था. पहली बार उसने पश्र्चाताप के मारे रोते हुए कंठ में उंगलियां डालकर लगातार कै की थी और दूसरी बार उत्तेजना के चरम क्षणों में गांधी की तस्वीर से लज्जित होकर अपने आवेश को रोकने की कोशिश में चीख़कर धरती पर गिर पड़ा था और छटपटाता रहा था. दोनों पापों का प्रायश्र्चित उसने क्रमश: दो दिनों और सात दिनों का उपवास रखकर किया था. ऐसा जो तपा तपाया चरित्र था उसका कांग्रेस का चारित्रिक विघटन शुरू हुआ तो सिर्फ़ गांधी पर विश्वास रह गया, जिनका दूत वह अंत तक बना रहा. उसकी पीड़ा का बयान ऊपर भी हो चुका है. उसकी बातें बालदेव से होती हैं. बालदेव उससे कहता है कि मालूम होता है, किसी `सोसलिट' ने आपको बहका दिया है. लेकिन उसका मोहभंग सोशलिस्ट पार्टी सहित सभी पार्टियों से हो चुका है, जिनमें सभी मंत्री बनने के लिए मार करते हैं. बालदेव को महात्मा गांधी की चिटि्ठयां सौंपकर वह ट्रेन से खगड़ा स्टेशन उतरकर रात में कलीमुद्दींपुर पहुंचता है, जहां दुलारचंद कापरा की चोरबाज़ारी के सामने से लदी पचासों गाड़ियां नागर नदी के किनारे पहुंचनेवाली हैं, जहां से सामान पाकिस्तान चला जाएगा.
आज महात्मा गांधी के श्राद्ध की तिथि है. बावनदास गाड़ियों के आगे कंधे में झोली लटकाए खड़ा हो जाता है और कापरा से कहता है : `आइए सामने। पास कराइए गाड़ी. आप भी कांगरेस के मेंबर हैं और हम भी. खाता खुला हुआ है; अपना हिसाब-किताब लिखाइए.... आज के इस पवित्तर दिन को हम कलंक नहीं लगने देंगे.' बावनदास की शहादत जैसे `मैला आंचल' का अंतिम परिच्छेद है. इसके बाद भी तीन परिच्छेद हैं, जिनमें कथाकार कथा-सूत्रों को समेटता है, लेकिन बावनदास की कहानी इतनी त्रासद है कि वह उसका पीछा नहीं छोड़ती और डाक्टर प्रशांत-कमली प्रसंग की सुखद समाप्ति के वर्णन के बाद वह इन पंक्तियों के साथ उपन्यास की समाप्ति करता है : `कलीमुद्दींपुर घाट पर चेथरिया-पीर में किसी ने मानत करके एक चीथड़ा और लटका दिय।.' कापरा ने जब बावनदास की लाश नदी पार पाकिस्तान में फिंकवा दी, तो पाकिस्तान की पुलिस ने उसे पहचानकर नदी में प्रवाहित कर दिया और उसकी झोली को इस पार लाकर एक पेड़ से लटका दिया. एक महीने बाद पहचाने जाने के डर से कापरा ने उस झोली को तो टपा दिया, लेकिन उसका फीता डाली से झूलता रहा. उसी से लोगों ने उसे चेथरिया पीर समझकर उस पर चिथड़ा बांधना शुरू कर दिया. उपन्यास की अंतिम पंक्तियां निस्संदेह पूरे उपन्यास को एक त्रासद स्वर प्रदान करती हैं, जो जितना ही मार्मिक है, उतना ही वेधक. उनके द्वारा जैसे उपन्यासकार हमें याद दिलाता है कि यथार्थ प्रशांत-कमली-मिलन भी है, लेकिन असली यथार्थ तो बावनदास की शहादत है, स्वातंत्र्योत्तर भारत का जलता हुआ यथार्थ.
कालीचरन अपने जुझारूपन के चलते सोशलिस्ट पार्टी में चला जाता है और रामदास को महंत बनाने तथा सहदेव मिसर को अपराधी ठहराने के लिए अपने जुझारूपन का परिचय देता है, लेकिन क्रमश: वह भी चरखा सेंटर की मंगला देवी के जाल में फंसता जाता है और संघर्ष से विमुख होता जाता है, जैसे जमींदार के विरुद्ध संथालों की लड़ाई में वह मंगला के कहने पर न केवल यह कि उन्हें कोई मदद नहीं देता, बल्कि बालदेव की तरह ही घटना-स्थल से अनुपस्थित रहता है, अपने कई साथियों के साथ। कहता है, `ठीक ही तो है, जो सरगना मेंबर हैं, वे क्या जाएंगे!' बाद में जब उसे हरखू तेली के घर हुई डकैती के मामले में फंसाकर गिरफ्तार कर लिया जाता है, तो वह जेल से भागकर सोशलिस्ट पार्टी के जिला मंत्री के पास अपने को निर्दोष बतलाने के लिए पहुंचता है. जब वह उनसे कहता है कि उसकी जांघ में गोली लग गई है, तो उनका जवाब होता है : `तुम्हारे कलेजे पर गोली दागी जानी चाहिए. डकैत! बदमाश!' कालीचरन निराश होकर घिसटता हुआ बगल के जंगल में चला जाता है. उस समय उसे खूंखार अपराधकर्मी चलित्तर कर्मकार की बात याद आती है : `गाढ़े बिपद में खबर करना, याद करना!'
रेणु स्वयं सोशलिस्ट विचारधारा को माननेवाले थे. उन्होंने सोशलिस्ट आंदोलन में काम भी किया था, लेकिन `मैला आंचल' में उन्होंने सोशलिस्ट पार्टी के पतन को भी पूरी निर्ममता से चित्रित किया है. यह पार्टी उस समय कांग्रेस के भीतर ही थी, लेकिन कांग्रेस के प्रति उसमें ऐसी शत्रुता पैदा हो गई थी कि पार्टी के जिला मंत्री कालीचरन को समझाते हैं : `तहसीलदार साहब कांग्रेसी हो गए हैं. बस, उन्हीं की ज़मीन पर किसानों द्वारा धावा करवा दीजिए.' दूसरी तरफ जब संघर्ष के मुतल्लिक कालीचरन मंत्री महोदय से जिज्ञासा करता है, तो वे यह कहकर सोशलिस्ट पार्टी की संघर्षशीलता का परिचय देते हैं कि अभी संघर्ष मत छेड़ो. उसके लिए पहले एक इलाके को लेकर `एक्सपेरिमेंट' किया जाएगा, फिर एक महीना पहले लोगों से दरखास्त लेनी होगी, फिर `इनक्वायरी', फिर `एक्जक्यूटिव मीटिंग', तब जाकर राय मिलेगी कि संघर्ष करना चाहिए या नहीं. बासुदेव और सुंदरलाल भी सोशलिस्ट हैं, लेकिन वे डकैतों के गिरोह में शामिल होकर पहले अपनी आर्थिक स्थिति सुधारते हैं, फिर गिरफ्तार होते हैं. उनकी बड़ी इच्छा थी कि नामी डकैत सोमा जट को पार्टी मेम्बरी मिल जाए, क्योंकि `सोमा यदि पाटी में आ जाए तो सारे इलाके के बड़े लोग ठीक हो जाएं.' मार्क्सवाद में सोशलिस्ट पार्टी को टुटपुंजिया वर्ग की पार्टी कहा गया है, जो निम्न-पूंजीवादी क्रांतिकारिता की शिकार होती है. रेणु के वर्णन से यह मान्यता सही मालूम पड़ती है.
तहसीलदार विश्वनाथ प्रसाद नए ज़माने के तहसीलदार हैं. उनके बाप देवनाथ मल्लिक रैयतों को काबू में रखने के लिए अपने सलीमशाही जूतों के तल्ले में कांटियां पूर्णिया से ठुंकवाकर मंगवाते थे और एक गड्ढे में जोंक पालकर रखे हुए थे, जिसमें तहरीर, तलबाना या नजराना देने में जो देर करता था उसे चार घंटे खड़ा कर देते थे. लेकिन विश्वनाथ प्रसाद ज़ोर-जुल्म करने के पक्ष में नहीं थे. हर बार तमादी के पहले जेनरल मैनेजर डफ साहब का खेमा आता था, जो अपने कोड़ों से रैयतों को दुरुस्त कर साल भर के लिए अमन-चैन कायम कर जाते थे. इस तरह नए तहसीलदार का काम चतुराई से चलता था. वे ऊपर से अच्छे बने रहते थे, लेकिन भीतर से पेच लड़ाते रहते थे. उनके संबंध में उनके उत्तराधिकारी हरगौरी की यह समझ बिलकुल सही है कि `काली टोपीवाले नौजवानों की लाठियों से ज़्यादा खतरनाक हथियार है. कानूनी नुक्स। तहसीलदार विश्वनाथ प्रसाद इसके माहिर हैं.' डाक्टर प्रशांत को उनके तीन रूपों का पता है. एक तहसीलदारवाला रूप, जो कि घृणित है, और दूसरा उनका घरेलू रूप, जो बहुत मोहक है. वह उनका एक तीसरा रूप भी देखता है, जो अपनी पुत्री के प्रति अत्यधिक स्नेह होने के कारण करुण है. वे कमली और डाक्टर के बढ़ते हुए संबंध को लेकर चिंतित हैं, लेकिन कुछ कर नहीं सकते. यह विवशता उनकी बहुत बड़ी चारित्रिक विशेषता है, जिसके चलते वे डाक्टर प्रशांत को अपने दामाद के रूप में स्वीकार ही नहीं करते हैं, बिना विवाह के उत्पन्न कमली के पुत्र का जन्मोत्सव भी धूम-धाम से मनाते हैं. उसके पहले कमली के गर्भवती होने का समाचार सुनकर वे अपना संतुलन खो बैठे थे, दारू पीकर चीख़ते-चिल्लाते रहते थे और पत्नी को गर्भपात की दवा लाकर भी दी थी. जब उन्हें नाती होने का समाचार दिया गया था, जो उन्होंने कहा था कि इंतजाम हो रहा है, बच्चा ज़ोर से रोए, तो गला टीप दो. लेकिन ममता के साथ डाक्टर प्रशांत के जेल से छूटकर उनके घर पहुंचते ही उनका हृदय परिवर्तन हो जाता है और वे उसे `मेरा बेटा!' कहते हुए बांहों से जकड़ लेते हैं. नाती के जन्मोत्सव पर वे संथालों को गलत ढंग से हड़पी गई ज़मीन लौटा देते हैं और कहते हैं, यह नया मालिक यानी उनका नाती दे रहा है! एक प्रसिद्ध समाजशास्त्री ने मानव-चरित्र पर समाज को महत्त्व देने के कारण संथालों को ज़मीन लौटानेवाली बात को उपन्यास को कमज़ोर करनेवाली घटना कहा है! जब साहित्य पर सामाजिक दृष्टि हावी हो जाती है, तो ऐसी ही टिप्पणियां की जाती हैं.
डाक्टर प्रशांत का चित्रण भी रेणु ने पूरी तटस्थता से किया है. वह कमली की बीमारी के इलाज के लिए तहसीलदार के यहां पहुंचा था, लेकिन धीरे-धीरे स्वयं उसके इश्क में गिरफ्तार होकर बीमार हो गया. डाक्टर के रोगिणी के साथ ऐसे व्यवहार को उपन्यासकार ने पसंद नहीं किया है, यह उसके रोमांस के वर्णन से स्पष्ट है, जिसमें हल्के-से तंज को कोई भी महसूस करेगा. लेकिन डाक्टर है, जो कहीं कमली को अपने से विमुख करना चाहते हुए भी पूरी गंभीरता से उससे प्रेम करने लगता है. प्रेम का अनुभव जैसे उसके लिए नया था, सो उससे उसका पूरा अस्तित्व प्रकंपित हो उठा है. रेणु के सशक्त शब्दों में, `अब वह यह मानने को तैयार है कि आदमी का दिल होता है, शरीर को चीर-फाड़कर जिसे हम नहीं पा सकते हैं. वह `हार्ट' नहीं, वह अगम अगोचर जैसी चीज़ है, जिसमें दर्द होता है, लेकिन जिसकी दवा `ऐड्रिलिन' नहीं. उस दर्द को मिटा दो, आदमी जानवर हो जाएगा.' वह बिना विवाह के कमली के साथ दैहिक संबंध स्थापित करता है, जिससे वह गर्भवती हो जाती है, लेकिन उसका प्रेम दायित्व शून्य नहीं, जिसका प्रमाण है जेल से छूटकर सीधे तहसीलदार के यहां पहुंचना और उसका चरण स्पर्श करना, जो कमली को पत्नी के रूप में मान देने की सूचना थी. बदले में कमली ने भी प्रशांत के प्रति अपने समर्थन को विपरीत परिस्थितियों में भी कमज़ोर नहीं पड़ने दिया. संभवत: यही सब देखते हुए रेणु ने उसके पुत्र नीलोत्पल का वर्णन जैसे `नए मनुष्य' के आगमन के रूप में किया है.
डाक्टर प्रशांत लोक-सेवक है, राजनीतिक व्यक्ति नहीं, लेकिन वह कालीचरन को इस रूप में संबोधित करता है : `मत समझना कि संथालों की ज़मीन छुड़ाकर ही जमींदार संतोष कर लेगा. अब गांव के किसानों की बारी आयेगी. और तुमको तथा बालदेवजी को ही उन्होंने अपना पहला हथियार बनाकर इस्तेमाल किया है.' वह तहसीलदार की बेटी से प्रेम करता है, उसे अपनी अर्धांगिनी बनाने वाला है, लेकिन उनके अन्याय का समर्थन नहीं करता. इसमें उसे कमली की नाराज़गी की भी परवाह नहीं है. अपनी इसी प्रगतिशीलता के कारण उसे जेल की हवा खानी पड़ती है.
दो शब्द लछमी के बारे में कहना भी ज़रूरी है. वह महंत सेवादास की दासिन थी, लेकिन इसे उसने कभी पसंद नहीं किया. बाद में नए महंत रामदास ने उसे अपनी दासिन बनाना चाहा, तो एक गड्ढे से निकलकर दूसरे गड्ढे में गिरना उसे मंजूर न हुआ और उसने उसका ज़ोरों से विरोध किया, यद्यपि महंती की लड़ाई में उसने बाहर से आए लरसिंघदास की जगह उसी का पक्ष लिया. वह कहीं भीतर से भली स्त्री थी, इसलिए उसमें बालदेव के प्रति सच्चा राग उत्पन्न हुआ, तो उसे वैरागी बनाकर उसके साथ पति-पत्नी की तरह रहने लगी. उसकी तुलना में तो बालदेव का चरित्र ही मानवीय कमज़ोरियों से अधिक ग्रस्त दिखलाई पड़ता है. इसका पहला उदाहरण काशी के बिदियारथीजी के प्रति उसका प्रचंड ईर्ष्या-भाव और दूसरा बावनदास के प्रति उसका द्वेष-भाव है. लछमी के मन में महात्मा गांधी के प्रति वैसी ही निष्ठा है, जैसे कबीर साहेब के प्रति रही होगी. इसका प्रमाण वह उस समय देती है, जब बावनदास के नाम लिखे गए बापू के पत्रों को बालदेव रात में चुपके से एक-एक कर जलाने का प्रयास करता है. लछमी बिछावन पर से ही झपटती है और उसे `पापी' तथा `हत्यारा' कहते हुए उससे चिटि्ठयों का बस्ता छीनने की कोशिश करती है. इसमें उसके कपड़े में आग लग जाती है, लेकिन वह हार नहीं मानती है. कहती है, `लगने दो आग! मुट्ठी खोलिए! बस्ता दीजिए बालदेवजी! मैं जलकर मर जाऊंगी, मगर...!' आगे : `बालदेवजी की कसी हुई मुट्ठी खुल जाती है. लछमी बस्ते को कलेजे से चिपकाकर खड़ी होती है. कमर से लिपटा हुआ कपड़ा ख़ुद-ब-ख़ुद गिर पड़ता है. बालदेवजी कमंडल से पानी लेकर छींटते हैं.
`हे भगवान! सतगुरु हो! जै गांधीजी! ...बाबा ...जै बावनदासजी! ह: ह:!' लछमी रो रही है.
`लछमी के हाथ-पांव जल गए हैं; बड़े-बड़े फफोले निकल आए हैं.'
वही लछमी जब सवेरे सत्संग के लिए जगाते समय मसहरी हटाकर बालदेव के अंगूठों से आंखें लगाती है और कहती है कि `सा हे ब-बंदगी!', तो बालदेव उसके सामने और छोटा हो जाता है, क्योंकि उसके हृदय में सच्चे हृदयों में जन्म लेनेवाली क्षमा का भी वास है, क्योंकि उसे मानवीय कमज़ोरियों का ज्ञान है.

`मैला आंचल' पर हिन्दी में जब चर्चा हुई तो आधुनिकतावादियों ने उसे कथा-तत्त्व के विघटन और `प्रतीक पुरुष की निष्क्रांति' का उदाहरण कहा. उन्होंने यह नहीं देखा कि कथा कई तरह से कही जा सकती है और विरल या सघन रूप में नियोजित कथा के बिना उपन्यास नहीं बन सकता. `मैला आंचल' में सुदृढ़ कथानक नहीं है, लेकिन अनेक घटनाओं और पात्रों से बननेवाली उसमें ऐसी कथा है, जो कथा-रस से लबरेज़ है. समग्र कथा से अलग उसमें बालदेव और लछमी की कथा, कालीचरन की कथा, बावनदास की कथा, खलासीजी और पुलिया की कथा, तहसीलदार विश्वनाथ प्रसाद की कथा तथा डाक्टर प्रशांत और कमली की कथा ऐसी कथाएं हैं कि हम `गोदान' की तरह उसे भी कहानियों का गुच्छ कह सकते हैं. जहां तक प्रतीक-पुरुष की निष्क्रांति अथवा नायकत्व के विघटन की बात है, हम यहां भी नयापन देखते हैं. `मैला आंचल' का नायक पूरा अंचल है, अपनी अच्छाइयों और बुराइयों के साथ, जो मात्र भौगोलिक इकाई न होकर घटनाओं और पात्रों से निर्मित एक सजीव प्राणी है. इस तरह वह नायकविहीन उपन्यास नहीं. आधुनिकतावादियों ने उसमें परंपरागत रूप में नायक की अनुपस्थिति देखकर यह प्रमाणित करना चाहा था कि अब मनुष्य अपने असाधारण गुणों और क्षमताओं से रहित `लघुमानव' हो चुका है. उन्होंने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि अकेले एक बावनदास अपनी ऊंचाई में सौ नायकों से बढ़कर है. उचित ही उसमें महात्मा गांधी की छवि देखी गई है. उसका बलिदान गांधी के साथ हमें ग्रीक पुराण-पुरुष प्रमथ्यु की याद दिलाता है. भूलना नहीं चाहिए कि `मैला आंचल' का रचना-काल गांधी, नेहरू और राजेन्द्र प्रसाद से लेकर जयप्रकाश नारायण के नायकत्व का काल था, फिर उसके स्रष्टा की दृष्टि लघुमानववादी कैसे हो सकती थी. यह ठीक है कि बावनदास `मैला आंचल' का नायक नहीं है, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि अंचल के नायकत्व का वह सबसे उदात्त और ज्वलंत हिस्सा है.
इस उपन्यास को प्रगीतात्मक भी कहा गया है. यदि इससे आशय यह है कि इसमें यथार्थ-चित्रण कमज़ोर है या यह रेणु की एक रोमांटिक कृति है, तो यह बात ग़लत है. प्रगीत में भी यथार्थ ही अभिव्यक्त होता है, यद्यपि भावात्मक और प्राय: अमूर्त रूप में, लेकिन `मैला आंचल' में उसके प्रगीतात्मक होते हुए भी अत्यंत वस्तुपरक रूप में यथार्थ का अंकन हुआ है. रेणु ने अपने अंचल को निश्र्चय ही बहुत ममता से देखा है, लेकिन उसके साथ ही उसका चित्रण भी यथास्थान उतनी ही निर्ममता से किया है. उपन्यास में एक जगह कमली अपनी मां को बंकिम बाबू का एक उपन्यास पढ़कर सुनाती है, तो उससे कहती है, `मां, शकुंतला, सावित्री आदि की कथा पढ़ने में मन लगता है, लेकिन उपन्यास पढ़ते समय ऐसा लगता है कि यह देवी-देवता, ॠषि-मुनि की कहानी नहीं, जैसे यह हमलोगों के गांव-घर की बात हो.' इसे रेणु द्वारा दी गई उपन्यास की परिभाषा समझना चाहिए, जिसे उन्होंने अपने उपन्यास में कसौटी के रूप में व्यवहृत किया है. यह सरल-सी लगनेवाली परिभाषा अपने भीतर सभी बातें छिपाए है. उपन्यास का आधुनिक कथा होना, अपने गांव-घर की कथा होना और उसका वैसा लगना, जो कि यथार्थ के सजीव और वस्तुपरक अंकन के बिना संभव नहीं है.
`मैला आंचल' के प्रगीतात्मक होने का कारण यह भी नहीं है कि उसमें लोकगीतों, आज़ादी की लड़ाई के गानों और लोक प्रचलित कविताओं का बहुश: प्रयोग हुआ है. यह मानने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए कि रेणु ने जान-बूझकर अपने उपन्यास के वातावरण को संगीतात्मक बनाने के लिए ऐसा किया है. इसे अतिरेक से बचाया जा सकता था. उसके दूसरे खंड के चौथे परिच्छेद में आज़ादी का उत्सव मनाने का जो वर्णन है, उसमें गानों की भरमार है और वाद्ययंत्रों की आवाज़ को मूर्त करने के लिए ध्वन्यंकन का इतना ज़्यादा सहारा लिया गया है कि कथा अत्यंत विरल हो गई है और आशंका होती है कि उपन्यास यहां से बिखरने तो नहीं लगेगा. लेकिन उपन्यासकार स्थिति को संभाल लेता है और आगे कथा फिर अपने प्रगाढ़ रूप में चलने लगती है. गाना-बजाना `मैला आंचल' की प्रगीतात्मकता का स्रोत सहज ही प्रतीत हो सकता है, लेकिन यह एक ऊपरी बात है. भीतर की बात यह है कि यह उपन्यास अपनी पूरी बनावट में प्रगीतात्मक है. उसमें घटनेवाली घटनाएं हों, या उसके पात्र, या उनकी भाषा सबमें एक प्रगीतात्मकता है, जिसका अर्थ है एक सांगीतिक तन्मयता। `तन्मयता' वस्तुपरकता का पर्याय है और `सांगीतिक' उपन्यास की प्रत्येक वस्तु को वैसे अनुभूत करने का, जैसे हम गायन या श्रवण के क्षणों में संगीत को करते हैं. इसका एक ही उदाहरण पर्याप्त होगा. बालदेव द्वारा देशभक्ति की अनुभूति : `माएजी का दुख देखकर रामकिसून बाबू का भाखन सुनकर और तैवारीजी का गीत सुनकर वह अपने को रोक नहीं सका था. कौन संभाल सकता था उस टान को! लगता था, कोई खींच रहा हो.' ...`गंगा रे जमुनवा की धार नयनवां से नीर बही. फूटल भारथिया के भाग भारथमाता रोई रही.' ...माएजी के पांव की चमड़ी फट गई थी, भारथमाता रो रही थी. वह उसी समय रामकिसून बाबू पास जाकर बोला थाज्ञ् `मेरा नाम सुराजी में लिख लीजिए.' इस तन्मयता के बिना पाठकों की आत्मा और हृदय को झंकृत करनेवाले इस उपन्यास की रचना नहीं हो सकती थी.
कुछ विद्वानों को `मैला आंचल' से शिकायत रही है कि उसमें ग्रामीण पात्रों का चित्रण उनका उपहास करते हुए किया गया है. निस्संदेह रेणु इस उपन्यास में हंसी की फुलझड़ियां छोड़ते हुए चलते हैं, लेकिन उनकी इस चित्रण-शैली से यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि वे उन पात्रों का या उनके क्रिया-कलापों का उपहास करते हैं. नहीं, वे तो गहरे दर्द को हंसी के पीछे छिपाए हुए कथा कहते हैं, प्रेमचंद के शब्दों में, `गम की दास्तान मज़े लेकर कहना'. उनमें उपहास का भाव वहां देखा जा सकता है, जहां वे जनता को चूसनेवाले, ठगनेवाले, धोखा देनेवाले या भरमानेवाले लोगों का चित्रण करते हैं, वे सोशलिस्ट पार्टी के साप्ताहिक पत्र `लाल पताका' के संपादक श्री चिनगारीजी ही क्यों न हों. रेणु की खूबी यह है कि वे उपहास भी करते हैं, तो अपने को ग्रामीण पात्रों में तब्दील करके. चिनगारीजी का यह वर्णन देखिए : `दुबले-पतले हैं, दिन भर खांसते रहते हैं; आंख पर बिना फ्रेमवाला चश्मा लगाते हैं. दिन भर सिगरेट पीते रहते हैं, शायद इसीलिए चिनगारीजी नाम पड़ा है. डाक्टर ने अंडा खाने के लिए कहा है. बिना अंडा खाए इतना गरम अखबार कोई कैसे निकाल सकता है?'
`मैला आंचल' के वातावरण को कवित्वपूर्ण बनाने का काम इसमें वर्णित लोक-विश्वासों और लोकापवादों ने भी जबर्दस्त ढंग से किया है, जो लोक-मन में रेणु की पैठ का अचूक प्रमाण है. एक-दो प्रसंग : `कुनैन की टिकिया से जब तीसरे दिन भी मेरी का बुखार नहीं उतरा तो मार्टिन ने अपने घोड़े को रौतहट की ओर दौड़ाया. रौतहट स्टेशन पहुंचने पर मालूम हुआ कि पूर्णिया जानेवाली गाड़ी दस मिनट पहले चली गई थी. मार्टिन ने बगैर कुछ सोचे घोड़े को पूर्णिया की ओर मोड़ दिया. रौतहट से पूर्णिया बारह कोस है. मेरीगंज में किसी से पूछिए, वह आपको मार्टिन के पंखराज घोड़े की यह कहानी विस्तारपूर्वक सुना देगा... जिस समय मार्टिन पुरैनिया के सिविलसर्जन के बंगले पर पहुंचा, पुरैनिया टीशन पर गाड़ी पहुंची भी नहीं थी.' इसके साथ, `कोठी के जंगल में तो दिन में भी सियार बोलता है. लोग उसे भुतहा जंगल कहते हैं. ततमाटोले का नंदलाल एक बार इंर्ट लाने गया; इंर्ट में हाथ लगाते ही खत्म हो गया था. जंगल से एक प्रेतनी निकली और नंदलाल को कोड़े से पीटने लगी. सांप के कोड़े से. नंदलाल वहीं ढेर हो गया. बगुले की तरह उजली प्रेतनी!' लोकापवाद का बहुत दिलचस्प उदाहरण हरखू तेली के घर में हुई डकैती के वर्णन के क्रम में देखने को मिलता है. इस तरह का दूसरा प्रसंग है डाक्टर प्रशांत की गिरफ्तारी के बाद ग्रामीणों की प्रतिक्रिया और तीसरा चलित्तर कर्मकार की फरारी से संबंधित कहानियां. इन्हें उपन्यास में ही पढ़कर मज़ा लेना चाहिए, क्योंकि इन्हें संक्षेप में उद्धृत करना संभव नहीं. कुछ विद्वान इसे अंधविश्वास का प्रचार कह सकते हैं, लेकिन पाठकों को इसके पीछे स्थित सर्जनात्मकता तक जाना चाहिए.

__________________________ नंदकिशोर नवल, वागर्थ अंक १२७ से साभार

3 comments

Dr.Firoz

aadab
achha paryas hai

सतीश पंचम August 9, 2008 at 7:25 PM

बहुत अच्छा विश्लेषण। बेहतरीन।

mms in mumbai university December 31, 2008 at 5:07 PM

bahut hi acha alochanatmak
likha hai