Monday, March 2, 2009

*** रघुवीर सहाय : एक दृष्टि

संवेदना की प्रकृति
रघुवीर सहाय की सभी कविताओं में कुछ ऐसी समस्याएँ हैं जो निरंतर आती हैं. जिसमें सबसे प्रमुख है – “हँसी”. यह समस्या उनके लिए इतनी बड़ी है कि उनका एक पूरा का पूरा संग्रह इसी समस्या पर है – “हँसो हँसो जल्दी हँसो”. अन्य समस्याओं में भाषा, स्त्री, राजनीति एवं हिंसात्मक क्रूरता. इन सभी समस्याओं पर रघुवीर सहाय जीवन के हर दौर हर संग्रह में लिखते हैं. यूँ भी हर संग्रह उनके विकास का पड़ाव है.

सन् 90 में रघुवीर सहाय की मृत्यु हुई. 47 से 90 तब लगभग साढ़े चार दशक, यानी आज़ादी के बाद की लगभग आधी शताब्दी के इतिहास को उनकी कविता में, उनकी संवेदनात्मक प्रतिक्रिया के माध्यम से देख सकते हैं. जिस तरह परिस्थितियाँ बदलती हैं उसी तरह उनकी समस्याओं की अंतर्वस्तु भी बदलती है. यह समस्याएँ उनके लिए जैसे प्रत्यय है, जिनसे वे समाज को समझने की कोशिश करते हैं. समस्यओं के बदलते हुए रूप से रचनाकार का दृष्टिकोण भी बदलता है. बदलती हुई समस्याएँ, परिस्थितियाँ और उनके प्रति कवि का दृष्टिकोण, उनके काव्य में मिलता है.

जनता ने संघटित होकर संघर्ष किया, इससे आज़ादी मिली. इसलिए संघर्ष में विश्वास का एक आधार यह है कि आज़ादी जैसी बड़ी उपलब्धि सामने है. रघुवीर सहाय ने लिखा:-
कष्ट दहन करो सहन
ओ रे मन!
जब तक यह बोध न हो
मुझ में भी क्रोध
और लूँगा प्रतिशोध
और जब तक प्रतिशोध न हो.
मनुष्य कष्ट सहता है, जिससे उसमें क्रोध पैदा होता है और उसी का कारण है प्रतिशोध. यहाँ भी संघर्ष की आस्था बनी हुई है. लेकिन आज़ादी के बाद का रास्ता जनता के कष्ट को हल करने का रास्ता नहीं था. औद्योगिक केन्द्रों का विकास हुआ, लेकिन देश पिछड़ा था. राष्ट्र कवि दिनकर ने लिखा :-
दिल्ली में है ज्योति की चहल पहल
पूरा देश भटक रहा है अंधेरे में.
दिनकर जी जिसकी चर्चा करते हैं वह अंतर्विरोध पूरे समाज में व्याप्त था. श्रीकांत वर्मा ने लिखा:-
मगध में विचारों की कमी है.
जिस समय इन्होंने यह कविता लिखी उस समय श्रीकांत वर्मा सांसद थे. सत्ता में रहते हुए उन्होंने सत्ता के विरोध में लिखा. जो सत्ता समाज को यानी बहुसंख्यक जनता को अंधेरे में भटकने के लिए छोड़ देती है वह अविवेक का मूर्त रूप है. अत: सत्ता के विवेक की कसौटी जनता का हित है. यही अनुभव उनकी कविता में मिलता है.

वह एक ऐसा समय था जब पूरा भारतीय समाज यह अनुभव कर रहा था कि क्या हो रहा है? रघुवीर सहाय भी उस आम प्रक्रिया का अंग बनते हैं, उससे स्वायत्त वह नहीं हैं. उनकी कविता में राजनीति की अवधारणा मूर्तिमान अविवेक की अवधारणा है.

1 comments

Udan Tashtari March 2, 2009 at 6:06 PM

आभार रघुवीर सहाय जी पर इस आलेख के लिए.