Tuesday, August 19, 2008

*** नागार्जुन : एक आत्मीय रचनाकार

मैथिल कवि “यात्री” और हिन्दी भाषी जनता के आत्मीय रचनाकार “नागार्जुन” का जन्म दरभंगा (बिहार) में सन 1911 में हुआ था. इनके पिता श्री गोकुल मिश्र तरउनी गांव के एक निर्धन किसान थे और परिवार के भरण-पोषण के लिए खेती के अलावा पुरोहिती आदि के सिलसिले में दूर-पास के इलाकों में आया-जाया करते थे. उनके साथ-साथ नागार्जुन भी बचपन से ही “यात्री” हो गए. पढाई-लिखाई की नियमित व्यवस्था का सवाल न था -घर की दरिद्रता और घुमक्कड़ी की बाध्यता- दोनों की कारणों से. आरंभिक शिक्षा संस्कृत में हुई किन्तु आगे व्यवस्थित रूप में पढ़ने का सिलसिला नहीं रहा.

पिता का दिया हुआ नाम था वैद्यनाथ मिश्र. वैद्यनाथ का नाम नागार्जुन के रूप में आविर्भाव हुआ बौद्ध धर्म की दीक्षा लेने के बाद. महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने “संयुक्त निकाय” का अनुवाद किया था. इस पुस्तक को पढ़कर वैद्यनाथ को इच्छा हुई कि यह ग्रंथ मूल अर्थात पालि में पढ़ा जाए. पालि सीखने का संभव उपाय था लंका जाकर वहां के बौद्धों में रहना. उन दिनों लंका में जातीय समस्या का यह रूप न था जो इन दिनों दिख रहा है. नागार्जुन वहां पालि पढ़ते थे और मठ के “भिक्खुओं” को संस्कृत पढ़ाते थे. इस आदान-प्रदान के सिवा, अपने आर्थिक साधन के बल पर पालि सीखना नागार्जुन के लिए असंभव था. यहां उन्होंने बौद्ध धर्म की दीक्षा किन परिस्थितियों में ली, इसका ब्यौरा खुद नागार्जुन ने इस प्रकार दिया:
मठ में रहना और भिक्खु न होना, इसमें बड़ी झंझटबाजी थी. कायदा यह होता है कि जो भिक्खु बन गया सो उच्चतर आसन का अधिकारी हो गया वस्तुत:. माने, उम्र में छोटा होगा तो भी भिक्खु आपसे ऊँचे आसन पर बैठेगा. मठ में जितने भी शिष्य हमसे संस्कृत सीख रहे थे, सब भिक्खु थे. वे बैठे ऊँची कुर्सी पर, हम बैठे नीची कुर्सी पर. उन्होंने कहा कि गुरूजी यह ठीक नहीं लगता. और भी कई बातों में भिक्खु-गैर-भिक्खु में इतना-इतना फर्क कि क्या बतायें. तो हमने कहा चलो शिष्यों की ही बात मान लो.
---------------------(मनोहरश्याम जोशी से साक्षात्कार, अलोचना- पृ. 56-57)
स्पष्ट ही, ब्राह्मण कुल में जन्म लेने का दंभ नागार्जुन में न था, इसीलिए उन्होंने इतनी आसानी से धर्म-परिवर्तन के लिए शिष्यों की सुझाव मान लिया. बौद्ध बनने के लिए दबाव इसलिए पड़ा कि मठ में भिक्खु-गैर-भिक्खु में जमीन-आसमान का भेद था. नागार्जुन धार्मिक भावना से प्रेरित होकर बौद्ध नहीं हुए थे, मठ में भेद-भाव के कारण होने वाले अपमान से बचने के कारण उन्होंने धर्म ग्रहण किया था. स्वभावत: उनमें मानवीय सम्मान की तीव्र भावना थी. धर्म के भेद-भावपूर्ण आडम्बर देखकर, उनका स्वाभिमान धर्म के प्रति अनुरक्त न हो सकता था. बचपन में पिता के साथ ब्राह्मणों-पुरोहितों की धर्मभावना का मूल कारण देख चुकने के बाद बौद्ध मठ के अनुभव ने नागार्जुन को सिखा दिया कि धर्म और ईश्वर आदि निरर्थक हैं. “भिक्षु जी” कविता में उन्होंने जहां बौद्ध धर्म की व्यर्थता प्रकट की, वहीं “हे हमारी कल्पना के पुत्र, हे भगवान” कहकर उन्होंने दैवी-शक्तियों की वास्तविकता को चुनौती दी. उन्होंने देवी-देवता और धर्म की जकड़ से मनुष्य की चेतना को स्वतंत्र करके एक नए प्रकार के मानववाद का समर्थन किया. इस मानववाद की विशेषता है मनुष्य में आस्था, मनुष्य के कर्म और विवेक में विश्वास.

एक सच्चे मानववादी के रूप में नागार्जुन ने अपने और दूसरे लोगों के जीवन में व्याप्त दरिद्रता, अज्ञान और निष्क्रियता के कारणों को देखा. उन्होंने समाज में व्याप्त अंतर्विरोधों को पहचाना और यह समझा कि समाज में दो तरह के प्राणी हैं, एक वे जो खुद परिश्रम करते हैं और दूसरे वे जो खुद परिश्रम नहीं करते. उन्होंने अपनी बहुत-सी कविताओं में इस अंतर्विरोध पर तीखी चोट की है और भावी समाज में जनता के प्रति न्याय करने के लिए यह आधार सुझाया है कि बड़े-बड़े ज़मींदारों-व्यापारियों और ठेकेदारों की सम्पत्ति जब्त करके सब पर जनता का स्वामित्व लागू किया जाए, मजदूरी करनेवाले को बेकार न रखा जाए, जब प्रकार के भेद-भाव का अन्त किया जाए. जहाँ वे जनता को अपनी दुर्दशा के ख़िलाफ करते देखते हैं वहाँ वे पूरे उत्साह से उसका स्वागत और समर्थन करते हैं और उसे यह राह दिखाते हैं कि वह किस तरह आगे बढ़कर नए इतिहास की रचना कर सकती हैं.

जन संघर्ष में अडिग आस्था, जनता से गहरा लगाव और एक न्यायपूर्ण समाज का सपना, ये तीन गुण नागार्जुन के व्यक्तित्व में ही नहीं, उनके साहित्य में भी घुले-मिले हैं. खुद नागार्जुन ने किसान आंदोलनों में सक्रिय तौर पर भाग लेकर, जेल जाने से लेकर जनसंगठन करने तक, आंदोलन के सभी पक्षों का हिस्सेदार बनकर जो शक्ति और ऊर्जा पाई है, वह आज तक उनकी कविताओं में मौजूद है. उनके बारे में डा. रामविलास शर्मा ने ठीक लिखा है कि :
नागार्जुन जितने क्रांतिकारी सचेत रूप से हैं, उतने ही अचेत रूप में भी हैं.
इस क्रांतिकारिता का आधार है जनता और उसके आंदोलनों के साथ कवि नागार्जुन का अटूट संबंध. इस संबंध ने नागार्जुन को और उनकी कविता को एक विशेष स्वर और चरित्र प्रदान किया. उनकी यह विशेषता सबसे अधिक उनकी व्यंग्य कविताओं में प्रकट होती है, खासकर राजनीतिक व्यंग्य में.

जनता से अटूट संबंध कायम करके नागार्जुन ने जनता की मनोभावनाओं को समझने की अद्भुत शक्ति विकसित की है और भारतीय जनता की सांस्कृतिक परम्पराओं को गहराई से हृदयंगम किया है. यही कारण है अपनी राजनीतिक कविताओं में भी वे पौराणिक प्रतीकों का ऐसा सधा हुआ उपयोग करते हैं कि वे प्रयत्नपूर्वक अलग से लाए हुए नहीं मालूम पड़ते.
मँहगाई की सूपनखा को कैसे पाल रही हो
सत्ता का गोबर जनता के मत्थे डाल रही हो
जैसी पंक्तियाँ इसका उदाहरण हैं.

सांस्कृतिक प्रतीकों के मूल आशय को आज के जीवन की परिस्थितियों में रूपांतरित करने की उनकी अचूक कला ने उनकी कविताओं को सांस्कृतिक गरिमा प्रदान की है. यही कारण है कि अपने राजनीतिक रूझानों में उतार-चढ़ाव के बावजूद नागार्जुन जनता के हितों के विरूद्ध चले जाने वाले असंतुलन या भटकाव का परिचय नहीं देते. जनता से इस घनिष्ट संबंध के कारण निराशावाद नागार्जुन की काव्य चेतना को कमज़ोर नहीं करता.

“यात्री” नागार्जुन को पिता की छत्रछाया में अव्यवस्था ही नहीं, घुमक्कड़ी भी मिली थी. इस घुमक्कड़ी के कारण वे देश-विदेश के विभिन्न भागों का भ्रमण तो करते रहे, परन्तु अपना कोई नियमित स्रोत न बना सके और “सफल” गृहस्थ न बन सके. इस सांसारिक असफलता के साथ-साथ इस घुमक्कड़ी का जो लाभ उनके कवि को मिला उसे हम उनकी कविता में सहज देख सकते हैं. भारत में पूर्व-पश्चिम-उत्तर-दक्खिन सब तरफ की प्रकृति और जनजीवन का जैसा प्रत्यक्ष परिचय नागार्जुन को है, वैसा हिन्दी ही नहीं, अन्य भारतीय भाषाओं में भी शायद ही किसी साहित्यकार का हो. अकारण नहीं है कि नागार्जुन की कविताओं में एक तरफ मिथिला से लेकर बुन्देलखण्ड तक की और अन्य इलाकों की प्रकृति का मनोरम चित्र मिलता है. दूसरी तरफ उनके समकालीन लेखकों, राजनीतिज्ञों एवं साधारण लोगों पर जितनी कविताएँ नागार्जुन ने लिखी हैं, उतनी किसी अन्य कवि ने नहीं. नागार्जुन की कविता किसी एक भू-भाग के लोगों की नहीं, पूरे हिन्दीभाषी क्षेत्र और हिन्दुस्तान की कविता है. नागार्जुन के काव्य के आस्वाद और भाषा में जो विविधता मिलती है वह अनुभव की विविधता का परिणाम है.

नागार्जुन ने अपनी कविता के उदाहरण से यह साबित किया कि जनता से घनिष्ट संबंध जोड़कर कविगण खुद को तरह-तरह की आत्मरति और भावुकता से बचा सकते हैं, तथा अपनी कविता को तरह-तरह के कलावादी-सौन्दर्यवादी रूझानों से मुक्त रख सकते हैं. इन प्रवृत्तियों से बचकर नागार्जुन अपनी कविता को उस मंजिल तक पहुँचा सके हैं जहाँ लोकप्रियता और कलात्मक सौन्दर्य में विरोध नहीं रहता, दोनों में पूर्ण संतुलन या सामन्जस्य स्थापित हो जाता है.
संक्षेप में: नागार्जुन हिन्दी कविता में निराला के बाद सबसे महत्त्वपूर्ण कवियों में एक हैं. उन्हें छोड़कर आधुनिक हिन्दी कविता की कल्पना असंभव है.

-----------------------------प्रो. अजय तिवारी से साभार

1 comments

बालकिशन August 19, 2008 at 3:03 PM

जानकारी के लिए आभार.
पढ़ कर अच्छा लगा.