Saturday, May 23, 2009

रामचंद्र शुक्ल बनाम सुधीश पचौरी

प्रथम दृष्टया प्रतीत होता है कि सुधीश पचौरी का उचित विचार और समीचीन है। रामचन्द्र शुक्ल को इतना भी महत्त्व नहीं दिया जाना चाहिए। किन्तु, रामचन्द्र शुक्ल के दौर में धर्म पर विशद चर्चा हो रही थी। धर्म के इहलौकिक को लेकर ‘पश्चिम’ में भी घमासान मचा हुआ था। प्राथमिक वैज्ञानिक बुद्धि धर्म को वैज्ञानिकता का घोर विरोधी बताती है किन्तु इतने भर से जब धर्म की गहरी व्याप्ति जनमानस के दूर नहीं हो पाती है तो धर्म को मनोवैज्ञानिक उपकरणों से व्याख्यायित करने का यत्न भी होता है। उसी दौर में रामचन्द्र शुक्ल धर्म को, जो सुदूर अतीत से चली आ रही सनातन परिपाटी है, मनोवैज्ञानिक आयाम देने का सफल यत्न करते हैं। ‘धर्म’ तो किसी समग्रता का नाम होगा, जबकि शुक्लजी ने इसे कई छोट-छोटे मनोभावों में बाँटकर फिर उनकी विवेचना करते हैं। ध्यान देना होगा, उनका प्रयास धर्म की पुनर्स्थापना के निमित्त नहीं था, प्रत्युत धर्म के इहलौकिकीकरण के निमित्त था। सुधीशजी किसी शीघ्रता में दिखते रहते हैं, शायद इसलिए शुक्लीय प्रयास को सहानुभूतिपूर्वक नहीं देख पाते हैं और जल्दी से निपटारा करने का उद्यम करते हैं। यह उनकी दिन दोगुनी, रात चैगुनी सफलता का रहस्य है। इसी प्रविधि से वे रामचन्द्र शुक्ल की धर्मभूमि की समीक्षा और विश्लेषण करते हैं, लेकिन इस दरम्यान वे हिन्दू-राजनीति की वास्तविकता नहीं समझना चाहते जिनकी रूचि ‘राम’ में नहीं, राम-मंदिर में है। वह रावण को नहीं ‘गैर हिन्दू’ को खदेड़ना चाहती है। वह ‘राम’ को एजेण्डा बनाती है। शुक्ल राम को नायक बनाते हैं। जिसके लिए ‘राम’ ऐजेण्डा होगा उसके लिए सेक्युलरिज़्म प्रतिपक्ष होगा। किन्तु जिसके लिए ‘राम’ आदर्श होगा, नायक अथवा भगवान होगा वह धार्मिक होगा, धर्म-प्र्रेमी होगा- धर्मवादी या साम्प्रदायिक नहीं। सुधीशजी विश्लेषण ही नहीं, संश्लेषण भी जल्दी में करते हैं। पंथ-निरपेक्षता धर्म के लोप का मशविरा नहीं होता है, सुधीशजी विदित ही होगा। जो आलोचना-वितान इस विखण्डन वाले बहुवचन के समय में भी स्त्रीत्व, दलित आदि को एजेण्डे पर नहीं लेता उसे साम्प्रदायिक ही करार नहीं दिया जा सकता। रास्ते और भी हैं। रामचन्द्र शुक्ल का ‘‘श्रद्धा-भक्ति’’ किसी मनोभाव का विश्लेषण है, देखनेवाले उसमें ‘साम्प्रदायिकता’ पा सकते हैं। चूँकि यह कोई रासायनिक अवयव नहीं जिसकी वस्तुनिष्ठ पहचान भी जा सके कि यह तत्व साम्प्रदायिक है और यह तत्व सेक्युलर। यह प्रयास एक बचकानी हरकत है अथवा सनसनीखेज की व्याकुलता है। किन्तु एक विद्वान, बुद्धिमान और प्रतिष्ठित व्यक्ति से ज़िम्मेदारी की उम्मीद तो की जा सकती है।

ऐसा मानना कि सुधीश पचौरी लोकमानस, समाज मन में उपस्थित धर्म एवं धार्मिकता के प्रभाव से अनभिज्ञ होंगे, उचित न होगा। उन्हें यह भी सुविज्ञात होगा कि धर्म की ज़मीन पर राजनीति की फसल उगानेवाले उसी ‘मानस’ का कर्षण करते हैं और उस कर्षित भूमि से अपना जन-समर्थन तैयार करते हैं। उन्हें यह भी ज्ञात होगा कि रामचन्द्र शुक्ल की बौद्धिक-व्याप्ति के बाहर भी धर्म की ज़मीन है जो धर्म-प्रवण होते हुए भी सामाजिक व्यवहार और राजनैतिक चेतना में पूरी तरह सेक्युलर है। पचैरीजी विखण्डन के तंत्र-मंत्र-यंत्र का गणित अधिक और सूक्ष्म रूप में जानते हैं तो उन्हें यह भी सुविदित होगा कि व्यक्ति-मन, जो लोकतंत्र में ‘मत’ बनता है, कई अवान्तर भेदों में विभक्त होता है। कृष्ण की भंगिमा को देखकर जो ‘सजल नयन पुलकित गात’ हो जाता है वह ‘विधर्मी विरोध’ में तल्लीन नहीं होता अपितु अपने इष्ट के स्मरण में मग्न होता है चाहे वह प्रभु यीशु के क्रूस पर होने की उद्भावना से घण्टों, महीनों आँसू बहाए। निश्चय ही, विधर्मी-विरोध राजनीति है, अपने इष्ट के इर्द-गिर्द होना धर्म है। सुधीशजी यहाँ भी सराहणीय रूप से स्पष्ट है कि ‘‘शुक्लजी से बेहतर कोई नहीं जानता कि साहित्य का मामला धर्म से गहरे जुड़ा है। कहें कि अभिन्न है और जीवन भी धर्म से अभिन्न है। वे समीक्षा के साम्प्रदायिक पाठ के उज्ज्वल उदाहरण कहे जा सकते हैं। इसे धोकर साफ कर देना कमज़ोर सेक्युलरिज़्म है।’’(पृ.295)

सुधीशजी ने दो पदों को गहराई से जकड़ रखा है -धर्म और सेक्युलरिज़्म। दोनों को परस्पर व्याघाती मान लिया। ऐसा मानने के पीछे उनकी निजी ‘मंशा’ है। धर्म, अभी, इन दिनों, विवादित प्रसंग है। सभी बौद्धिक इसका भाष्य अपनी सुविधा से करता है। कोई शंकराचार्य, कोई पंडा, कोई ईमाम-सेक्युलरिज़्म का पक्ष ले सकता है। इससे सेक्युलरिज़्म गंदला नहीं हो जाता। संस्कृत भाषा में रची पोथियों में धर्म पद को बड़ा महत्त्व मिला है। इतने भर से उनको साम्प्रदायिक नहीं मान लिया जाएगा क्योंकि उनका ‘पाठ’ तैयार करने से पहले इस बात पर भी गौर करना पड़ेगा कि उस समय के ‘मेनस्ट्रीम इन्टेलेक्ट्युल डिस्कोर्स’ की भाषा का स्वरूप किस तरह का है? मसलन, उन पोथियों में ‘समाज’ अथवा इसका व्यंजक प्राप्त नहीं होगा तो क्या पाठवादी विमर्शकार मान लेंगे कि वह समय ‘समाज रहित’ है? और यदि उस प्रकरण में सामाजिकता का व्यंजक ढूंढा भी जाएगा तो प्राप्त होगा - धर्म। अब विद्वान सुधीश के कान खड़े हो जाऐंगे - धर्म! यानी साम्प्रदायिकता। किन्तु ‘टेक्स्ट’ के अलावा ‘कॉन्टेक्स्ट’ भी तो कुछ होता है। उन्हें पता चल चुका है -धर्म और साम्प्रदायिकता के विषय में, सो वे श्रद्धा और भक्ति से बात उठाते हैं और क्षात्रधर्म तथा हिन्दूधर्म तक बात को लाते हैं। उन्हें मर्ज़ी का कुछ साबित जो करना है।

उन्हें सिद्ध करना है कि हिन्दी साहित्य के पॉयनीयर, पुरोधा आलोचक एक साम्प्रदायिक (हिन्दूवादी) आलोचक है। इस के लिए वे ‘टेक्स्टुअलिटी’ को समझते हैं, तुलसी, तुलसी के राम, राम के विभक्त रूप, रामचन्द्र शुक्ल की वह तकनीक जिससे मानस और पत्रिका के राम की मिक्सिंग की जाती है -सबको समझते हैं। वे नहीं समझना चाहते तो धर्म और धर्मान्धता का फासला। वे दोनों को ‘एक’ करना चाहते हैं। इससे इनका कोई प्रयोजन सिद्ध हो सकता है। संभव है, किसी से शर्त लगी होगी कि रामचन्द्र शुक्ल ‘साम्प्रदायिक’ सिद्ध किया जा सकता है। हिन्दी-जगत के डरे-सहमें लोगें ने या तो इधर कान नहीं दिया या फिर दम साधे बैठ गए। विवाद उछलेगा, निर्णय जो भी होगा, विपक्ष में जाएगा इसलिए दम साध बैठ गए।

लेकिन इस धर्मभूमि में एक और खेल रचाने की चतुराई पचौरीजी ने की। उनकी आकांक्षा कुछ इस प्रकार है, ‘‘खेद की बात है कि शुक्लजी के योगदान को किसी दैवी वरदान और असंदिग्ध विमर्श की तरह स्वीकार किया जाता है। रामविलास से लेकर मलयज तक यहाँ एक हैं।’’ सुधीशजी इसमें घुसकर ऐक्य का आधार ढूंढ निकालते हैं। ढूंढने की प्रक्रिया का विवरण प्राप्त नहीं है किन्तु परिणाम प्राप्त है जो एक प्रश्न-चिह्न के रूप में है -डर। वे ‘डर’ का एक छाता प्रस्तावित करते हैं और छाते के नीचे सभी को खड़ाकर और अपनी योजना के अनुसार उन्हें बेनकाब कर अट्टहास करना चाहते हैं। उनकी राय में, सभी डरे हुओं में ‘निहित हिन्दू’ प्रश्रय पा रहा है। अर्थात् रामचन्द्र शुक्ल को ‘करेक्ट’ करना हिन्दी-विमर्श ख़त्म करने जैसा है।

सुधीश पचौरी इस महत्त्वाकांक्षी विमर्श में ‘एक परिचय रहित चेहरे’ के साथ अवतरित होते हैं यानी उनका न तो कोई भूगोल है, न इतिहास, और न समाज बल्कि उनकी अपनी भाषा या जाति भी नहीं है। वे एक ‘डिजीटल एनलिस्ट प्रोग्राम’ की तरह एक ग्राफ बनाते हैं जिसके आधार-पट पर रामचन्द्र शुक्ल का शेडो है। उस शेडो के ऊपर कहीं मलयज, कहीं रामविलास, कहीं नामवर की धुंधली तस्वीरें हैं। इस क्रम में वे अपनी पहचान ‘सप्रयत्न’ छिपाते हैं। धर्म, सेक्युलरिज़्म, मार्क्सवाद, विखण्डन इत्यादि कुछ ऐसे प्रकाश-पुंज हैं जिन्हें अपने आस-पास हमेशा चमकाते रहते हैं ताकि कोई पाठ-कर्ता सुधीश पचौरी तक न पहुँच पाए। और यदि पहुँच भी जाए तो उसे लगे कि यह कोई ‘इन्टेलेक्टुअल ट्रेन्ड’ है, फिजिकल या सोश्यल स्पेस घेरने वाला कोई जीवित आदमी नहीं। यह ‘विदेहीकरण’ की राजनीति है, चतुराई है और इसमें वे बहुत हद तक सफल भी हैं। वे जिस ‘फन’ के उस्ताद हैं वहाँ वे अद्वितीय हैं। हिन्दी जगत में चमत्कारों से आविर्भूत होने का संकट अद्यतन बना हुआ है। सुधीश इस नस को पकड़ लेते हैं और इसका उपयोग करते हुए शुक्ल एवं शुक्लीय आलोचना को हिन्दूवादी सिद्ध करते हैं। गौरतलब है, ब्राह्मणवादी सिद्ध करने की ज़हमत नहीं उठाते। और उस बौद्धिक विरासत को हिन्दूवादी बाड़े में धकेलते हुए ‘मिस्टर इंडिया’ की तरह गायब हो जाते हैं यानी विश्व-कल्याण के अन्य कार्यों में लग जाते हैं। अपने महद् उद्देश्य के लिए मुख्य स्रोतास्विनी की प्रणालिका का मुँह बन्द कर देना चाहते है अथवा उसी में ‘उग्र-हिन्दू’ के तत्व होने का प्रमाण ढूंढकर समस्त आलोचना धारा को ही ‘प्रदूषित’ की कोटि में डाल देने की शीघ्रता कर रहे है। ऐसा क्यों है?

अब भारतीय अतीत की पदावली के माध्यम से ‘धर्म तत्व’ ढूँढ लेना उतना मुश्किल नहीं है जितना उत्साह सुधीशजी दिखाते हैं। वहाँ ‘मिक्सिंग’ देखने से बेहतर यह देखना था कि प्यूरीफायर के जंक्शन प्वाइंट पर अशुद्ध और शुद्ध दोनों प्रकार के तत्व होंगे ही। यदि किसी ने अशुद्ध तत्व को देख ही लिया तो इसमें इतना उत्तेजित होने की क्या आवश्यकता है? उस पीढ़ी के लोगों में इस तरह की भारतीयता (जिसका संबंध संस्कृत पदावली से अधिक है) के प्रति रूझान सामान्य है। ध्यान देने की बात है कि भारतीय हिन्दूवादियों का, प्रगतिशीलों का, गैर-हिन्दूवादी प्रगतिशीलों का -सबका अतीत एक ही है। किन्तु इतिहासों और इतिहास दृष्टियों में गहरा भेद है। बहुवचनता से अभिज्ञ व्यक्ति इस तथ्य को हम-जैसों से बेहतर जानते होंगे। सुधीश पचौरी (और कोई वीरभारत तलवार) उन पक्षों को क्यों चुनता है जिनके प्रति सातवें-आठवें दशक के आलोचक मौन है? क्या वे भारतीय अतीत स्पष्ट और परिस्पष्ट देखना चाहते हैं? नहीं। उनकी मंशा गोपनीय है। क्या कोई फिक्स खेल है?

सुधीश पचौरी के लिए रामचन्द्र शुक्ल एक हिन्दू कार्यकर्ता की तरह हैं। अपनी पैनी नज़र का प्रमाण कुछ इस तरह देते हैं, ‘‘मज़ा यह है कि रामविलास से लेकर मलयज तक शुक्लजी की इस विचार-संहिता को नहीं देख पाते...’’ (पृ.290) किन्तु ‘‘शुक्ल हिन्दू जाति में ही अर्थ पाते हैं जिस पर वे शर्मिन्दा नहीं है, जबकि रामविलास, नामवर, मलयज शर्मिन्दा हैं। वे वैसा होना छिपा जाते हैं।’’ (पृ.286)


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