Monday, February 1, 2010

*** आधुनिकता और राष्ट्रवाद


रंपरागत समुदाय अपनी आवश्यकताओं के लिए स्वावलंबी एवं स्वतंत्र थे। उनका आपसी संबंध सीमित था। ये समुदाय छोटे-छोटे समूश्ह में स्वतंत्र थे। जबकि आधुनिक समाज विविध एवं विशिष्ट संस्थाओं से परिचालित होता है। व्यक्ति बड़ी संखया में, अवैयक्तिक समूह में एवं श्रम के जटिल वर्गों में बंधा हुआ है। आधुनिक समाज 'बडे औद्योगिक उत्पादन एवं बाजारोन्मुख कृषि पर आधारित है।'1 परंपरागत समाज का आधुनिक समाज में रूपांतरण कमोवेश कष्टकारी रूपान्तरण रहा है। ए. डी. स्मिथ ने रूपांतरण के तीन परिणामों (और प्रक्रिया भी) का जिक्र किया है :

(क) समाज में विशिष्ट एवं विशेषज्ञ संस्थाओं का जन्म होना

(ख) आधुनिकीकरण ऐसी व्यवस्था का सृजन करता है जो समाज में नए वर्ग पैदा करते हैं,तथा

(ग) नये वर्ग अधिक पारदर्शी होते हैं।2

इस प्रकार लोकतंत्रीय विकास की एक अवस्था में राज्य स्वयं ही राष्ट्र बन जाते हैं। ऐसे राष्ट्रवाद का अर्थ है राज्य के प्रति व्यक्ति की औपचारिक आसक्ति। इस अर्थ में 'राज्य का प्रत्येक नागरिक या प्रजा राष्ट्रीयता की परिधि में आ जाते हैं - चाहे उसकी भाषा कुछ भी हो या उसकी वंश परंपरा का उद्भव कहीं से भी हुआ हो।'3

आधुनिक युग में राजनीतिक संस्थाओं को समाज का केन्द्र-बिन्दु माना जाता है, चाहे वह समाज पहले से विद्यमान हो या अस्तित्व में आने की प्रक्रिया में हो। आधुनिकता ने स्थानीय तथा लोक-संस्कृति के बरक्स एक-केन्द्रीय संस्कृति को जन्म दिया। परिणामतः स्थानिकता - जो कि मानव-समुदाय की पहचान है - उसे नज़रअंदाज कर दिया गया। यह मान लिया गया कि प्रत्येक राष्ट्र (जाति) अपने विकास-क्रम में एक मुखयधारा में शामिल हो जाएंगे। सामाजिक परिवर्तन, विशेषकर आधुनिकीकरण, और राष्ट्रवाद को, एक दूसरे का अविभाज्य अंग मान लिया गया। रूपर्ट एमर्सन ने लिखा हैः 'राष्ट्रवाद जहां कहीं भी उभरता है वहां यह वास्तव में उन शक्तियों की प्रतिक्रिया का परिणाम है जिन्होंने हाल की शताब्दियों में पश्चिम क्रांति पैदा की और विश्व के कोने-कोने में एक के बाद एक लहर के रूप में पहुंच गई।'4 एमर्सन ने जिस क्रांतिकारी शक्ति का उल्लेख किया है वह स्वयं आधुनिकीकरण ही है। आधुनिकीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिससे 'पुरानी सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक मान्यताएं टूटती हैं' और उनकी जगह नयी मान्यताएं जन्म लेती हैं।5 लेकिन परंपरागत समाज बहुत ही स्थानीय सीमाओं में रहते हैं और उन पर परिवर्तन का प्रभाव अलग-अलग ढंग से पड ता है। नए राष्ट्र-राज्य परंपरागत समाज के समूहों से बने हैं। और यदि किसी निश्चित प्रदेश में परंपरागत समाज पर सामाजिक परिवर्तन का प्रभाव पडा है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि ऐसे सभी समाजों पर वैसा ही प्रभाव पडा। 'सामाजिक परिवर्तन', समाज के कुछ ही भागों पर प्रभाव डालता है (ऐसा देखा गया है) और यह प्रभाव अलग-अलग गति और तीव्रता का होता है।'6

पुराना और नया साथ-साथ चलते हैं। 1960 के बाद राष्ट्रवाद का उजागर होना एक महत्वपूर्ण तथ्य है। यह राष्ट्रवाद अपने स्वरूप में 20वीं सदी के शुरूआती राष्ट्रवाद से गुण-धर्म में भिन्न है। कायदे से 1960 के बाद आधुनिक राष्ट्र-राज्य के राष्ट्रीय राज्य में बदल जाना था, परन्तु विकासशील ही नहीं अपितु विकसित राज्यों में भी क्षेत्रवाद और धार्मिक उभार देखने को मिल गया। फ्रांस, कनाडा और संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे विकसित देशों में यह स्थिति देखी जा सकती है। ऐसा लगता है कि 'जातीय राष्ट्रवाद (Ethnic Nationalism) आधुनिकता की प्रक्रिया में प्रायः स्वतंत्र ही रहा और इसने आधुनिक राष्ट्रवाद के समक्ष महत्वपूर्ण समस्याएं खड़ी कर दी हैं।'7 फ्रांस जैसे पूर्ण आधुनिक समाज एवं विकसित तथा केन्द्रीकृत अर्थव्यवस्था वाले राज्य में भी राष्ट्रीय-अस्मिता की अभिव्यक्ति 1950 में यूरोपियन रक्षा समिति में 1960-70 में 'नाटो' एवं अमेरिकी वर्चस्व के विरोध में, 'गैर' में अमेरिकी संस्कृति के विरोध में तथा 1970, 1980 एवं 1990 में 'मुस्लिम' एवं 'एंग्लो-सेक्सन' संस्कृति का विरोध करते हुए देखा जा सकता है।8 आधुनिक युग में इस प्रकार जातीय, धार्मिक राष्ट्रवाद का उभार एक अबूझ पहेली है। जहां आधुनिकतावादी संस्थानों के प्रभाव से क्षेत्रीयता, जातीयता जैसे संकीर्ण मतवादों को खत्म होना चाहिए था वहां ये नये सिरे से उफान पर हैं।

आधुनिकतावाद के दौर में जातीय (Ethnic) राष्ट्रवाद का उभार, आधुनिकता की असफलता का परिणाम माना जा रहा है। इसका मुख्य कारण पहचान के प्रश्नों को सदा के लिए हल हुआ मान लिया गया। मान लिया गया कि एक संविधान के छाते में सब शांति से रह सकते हैं। व्यवस्थाएं दे दी गई हैं। कानून बना दिए हैं। जनतंत्र की नमनीयता उसे और लचकीला बनाकर, अनुकूलित कर सकती है। ये आधुनिक राष्ट्र-राज्य की अमर स्थिर और शाश्वत संरचना है।'9 यहां यह मान लिया गया है कि आधुनिकता और जातीय-सांस्कृतिक पहचान को जोड़ने के बजाय, उसका निषेध कर दिया गया। जातीय तथा सांस्कृतिक पहचान व्यक्ति (या समुदाय) की आंतरिक पहचान है। फलतः राष्ट्रवाद का लोकप्रिय (Popular) आधार स्खलित हो गया। 19वीं-20वीं सदी के 'राष्ट्र-राज्य' एक केन्द्रिक राष्ट्र-राज्य थे। 1960 के बाद (लगभगद) राष्ट्र-राज्यों की यह केन्द्रियता टूटने लगती है। अब उसे किसी खास संस्कृति, परंपरा या वर्ग का संगठन नहीं, बल्कि जन (Mass) का संगठन होना है। ऐसा माना जा रहा है। 'आधुनिक राष्ट्र 'जन-राष्ट्र' (Mass-Nation) हैं। जहां प्रत्येक व्यक्ति नागरिक है और सैद्धांतिक रूप में प्रत्येक नागरिक समान अधिकार रखते हैं। राष्ट्र का कानून सब पर समान रूप से लागू होता है एवं सिद्धांततः नागरिक एवं राष्ट्र के बीच कोई माध्यम स्वीकार नहीं किया जाता।'10 राष्ट्र-राज्यों के निर्माण की प्रक्रिया को देखते हुए कहा जा सकता है कि 'हर राष्ट्र कुछ खास वर्गों, कुछ भाषाई-इलाकाई-सांस्कृतिक समुदायों के हित में बनता है, और कुछ की ही मांगों को पूरा करने की मुहिम-सा बनकर रह जाता है। राष्ट्र अगर कई तरह के तत्वों, श्रेणियों और पुरूषों के लिए नए रास्ते खोलता है तो औरों के लिए कुछ रास्ते बन्द भी कर देता है।'11 इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि आधुनिकीकरण परंपरागत देश को विकास के जरिये 'नष्ट-भ्रष्ट' करता है। वह देश से हमारे सहजात संबंधों को स्पर्धा-निर्भर, साधन-निर्भर और कौशल-निर्भर संबंधों में बदल जाता है।

आधुनिकतावादी चिंतन एवं व्यवस्था को इस प्रकार प्रश्नांकित किया जा रहा है। इसे प्रश्नांकित करने वाले चिंतक उत्तर आधुनिकता की एक नई सैद्धांतिकी प्रस्तावित करते हैं। ऐसा कहा जा रहा है (माना भी जा रहा है) कि विकास के एक खास चरण में राष्ट्र-राज्य बदलते हैं। मार्क्स ने आधुनिकता के तर्क को उत्पादकता के तर्क से जोड़ा। मेक्स बेवर ने पाया कि सिर्फ उत्पादकता मनुष्य के व्यवहार के तमाम पहलुओं को समझने का साधन नहीं बन सकती, इसलिए उन्होंने औद्योगीकरण, शहरीकरण, नौकरशाही, आधुनिक प्रशासन, परंपरा के साथ संस्कृति की धर्मनिरपेक्षता आदि में आधुनिकता का तर्क देखा। मार्क्स का मानना था कि पूंजीपति वर्ग अपने तेज विकास में तमाम पुराने संबंधों को खत्म कर चलेगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। 'विकास के लाभ एक हद तक पहुंचने के बाद अचानक हम पाते हैं कि पहचान के प्रश्न उठ खडे होते हैं। जातीय, सांस्कृतिक और धार्मिक, नैतिक पहचान के प्रश्न गरीबी और पामाली के प्रश्न नहीं हैं। जहां भयावह गरीबी है वहां रोटी के प्रश्न प्राथमिक होते हैं। जब पेट भर जाता है तब पहचान के सवाल सूझते हैं। आधुनिकीकरण और विकास के बिना पहचान के प्रश्न नहीं उठते।'12

__________________________________________________________
1. Theories of Nationalism - P-42
2. वही, 43
3. मानविकी परिभाषिक कोश
4. फ्रॉम एम्पायर टु नेशन - 188
5. सोशल मोबिलाइजेशन ऐंड पॉलिटिकल डेवेलपमेंट, अमेरिकन पॉलिटिकल सामंस रिव्यू, LV 3, - 494
6. कास्ट, टाइव ऐंड नेशन, में इसका विवेचन
7. नेशन ऐंड नेशनलिज्म इन ग्लोबस ऐरा - 42-43
8. वही - 43
9. उत्तर आधुनिक परिदृश्य - 122
10. नेशन ऐंड नेशनलिज्म इन ग्लोबल एरा - 54
11. हंस, अक्टू० - 1997
12. उत्तर आधुनिक परिदृश्य – 119
______________________________________________________

डॉ. अनिल कुमार से साभार

पीछे राष्ट्रवाद की अवधारणा

अगले अंक में देखिए भूमंडलीकरण और राष्ट्रवाद

1 comments

Fauziya Reyaz February 9, 2010 at 7:26 PM

ye lekh padh kar bahut kuch jaanne ko mila....shukriya