Friday, October 11, 2013

*** युद्ध के दिनों में प्रेम : उसने कहा था



लेरी जी ने कुल तीन कहानियां लिखीं और तीनो हीं प्रथम प्रेम की कहानियां हैं। 'सुखमय जीवन और 'बुद्धू का कांटा' की मनोभूमि चञ्चल और उत्फुल्ल है जबकि 'उसने कहा था' एक त्रासदी। इनमें तीसरी 'उसने कहा था' असंदिग्ध रूप से भाषा और विषयवस्तु के साथ व्यवहार, संरचना और गठन आदि को देखते हुए हिंदी की पहली प्रौढ़ और प्राञ्जल कहानी है। इसकी कथा के गठन के विस्मयजनक चमत्कार, बहुपरतीय अर्थवत्ता, और भाव गहनता पर इतना कुछ कहा जा चुका है कि शायद अब अलग से कोई टिप्पणी भी फ़ालतू जान पड़े। लेकिन फिर भी, हर बार पढ़ने के बाद इसकी ताजग़ी पुनर्जीवित हो उठती है और कुछ कहने को शेष रह गया सा प्रतीत होता है। 'उसने कहा था' के बहाने यह भी एक उत्तेजक और रोचक परीक्षा संभव है कि पाठकों की अलग अलग पीढ़ियां और अलग अलग दृष्टियां व रुचियां एक ही रचना के लिये अलग अलग प्रतिक्रियाएं कैसे करती हैं, न केवल पीढ़ीगत बल्कि व्यक्तिगत भी। 

नयी कहानी के दौर में 'उसने कहा था' में चित्रित प्रेम के सत्य और विश्वसनीयता को लेकर एक रोचक बहस चली थी। उस बहस में उठाये गये प्रश्नों के सिरे से देखा जाय तो पूरी कहानी को एक भावुक अतिरंजना में पगा हुआ पाया गया था जिसे कथानक के संरचना–कौशल ने धारासार अश्रुप्रवाह में बह जाने से बचा लिया है। बहस साप्ताहिक हिन्दुस्तान मेँ छपी थी।

बहस में एक संभाव्य पाठ (शायद हरिवंशराय बच्चन का) यह भी सुझाया गया था कि जिसे हम लहनासिंह की आत्मबलि मानते हैं वह वस्तुतः युद्धक्षेत्र की 'कमराडरी' अथवा साथीपन और बंधुता का भाव है। इसके कारण सभी सैनिक एक दूसरे के लिये अपनी जान दे देने को उद्यत रहते हैं क्योंकि घर परिवार की सुरक्षा से दूर, प्रतिक्षण मृत्यु का सामना करते हुए वे ही कठिनतम क्षणों में एक दूसरे के निकटतम संगी होते हैं, एक की बजाय दूसरे का मारा जाना या कि बचा रह जाना केवल संयोगवश हो लेता है और एक संभाव्य समान नियति की यह साझेदारी उन्हें एक दूसरे के साथ एक अप्रतिम, अनन्य मैत्री और बंधुता के बंधन में बांधती है। और सूबेदारनी के प्रति लहनासिंह का उत्तरदायित्त्व भी वस्तुतः प्रेम नहीं बल्कि सामंतयुगीन 'शिवैलरी' का गौरवपूर्ण भावात्मक अवशेष है। 'शिवैलरी' यूरोपीय सांस्कृतिक संदर्भेां से उठाया गया शब्द है जिसका समानार्थक सा भारतीय भाव दुर्बल, असहाय, शरणागत की रक्षा में सन्नद्ध क्षात्रधर्मिता को समझा जा सकता है।इस संदर्भ में स्त्री विशेष रूप से रक्षणीया है।

ये व्याख्याएं कहानी में चित्रित 'अविश्वसनीय, वायवीय और काल्पनिक आदर्शवादी प्रेम' को 'शिवैलरी' के अपेक्षाकृत संभाव्य और विश्वसनीय भाव से प्रतिरोपित करने के लिये कुछ विवरणों को अनदेखा करती हैं। लेकिन कथानक की अपनी मंशा यह प्रतीत नहीं होती। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कहानी की निव्र्याज प्रशंसा में कहा था,"इसमें पक्के यथार्थवाद के भीतर, सुरुचि की चरम मर्यादा के भीतर, भावुकता का चरम उत्कर्ष अत्यंत निपुणता के साथ संपुटित है। घटना इसकी ऐसी है जैसी बराबर हुआ करती है पर उसके भीतर से प्रेम का एक स्वर्गीय रूप झांक रहा हैकेवल झांक रहा है,निर्लज्जता से पुकार या कराह नहीं रहा। कहानी भर में कहीं प्रेम की निर्लज्ज प्रगल्भता, वेदना की वीभत्स विवृत्ति नहीं है। सुरुचि के सुकुमार से सुकुमार स्वरूप पर कहीं आघात नहीं पहुंचता। इसकी घटनाएं ही बोल रही हैं, पात्रों के बोलने की अपेक्षा नहीं." 

इतना लंबा उद्धरण यहां इस बात को रेखांकित करने की इच्छा से दिया जा रहा है कि सन् 1929–30 के आसपास आचार्य शुक्ल को वही घटना इतनी स्वाभाविक प्रतीत हो रही थी जैसी 'बराबर हुआ करती है' जिसे 1950–60 के नये कहानीकारों ने अविश्वसनीय और काल्पनिक पाया था। वस्तुतः इन वर्षों के बीच मध्यवर्गीय भारतीय समाज में स्त्री की स्थिति में इतनी खासी उथल पुथल और फेरबदल हो चुकी थी कि उसे नये कहानीकारों के अभिप्रेत विश्वसनीय और वास्तविक किस्म के प्रेम का पात्र बनाया जा सकता था लेकिन आचार्य शुक्ल के लिये निश्चय ही ऐसी कल्पना असंभव रही होगी। सात परदों में छिपी नायिका की अचानक एक झलक को आजीवन हृदय के सात परदों में छिपाये रखने वाले और उसका नाम भी ज़बान पर न लाने वाले, ज़रूरत पड़ने पर आह तक भरे बिना जीवन होम कर देने वाले नायकों की कहानियां तब तक केवल कहानियां ही नहीं रही होंगी।

'सुरुचि के सुकुमार से सकुमार स्वरूप' का अस्तित्व सांस्कृतिक है और संस्कृति संदर्भगत होती है। आचार्य शुक्ल को 'उसने कहा था' में प्रेम के एक स्वर्गीय रूप का केवल 'झांकना' मुग्ध करता है। इसके पीछे हिंदीभाषी पूर्वीप्रदेश में बंगाल की भावुकता का साहित्यिक संस्कार कहा जा सकता है। अनुभूति की मौन गंभीरता जो घुल घुल कर घुटने को आचरण की धीरता का आदर्श बना लेती है, प्रेम की निर्लज्ज प्रगल्भता और वेदना की विवृत्ति को वीभत्स पाती है। चुपचाप सहने में अभिमान है और कुछ भी न कहने में स्वाभिमान। आचार्य शुक्ल की सुरुचि का सुकुमार आदर्श भी कुछ उसी छवि से प्रतिबिंबित है। उनके इस पाठ को चाहें तो विनोदवश कहानी का बंगाली पाठ कह लें। इस पाठ में युद्ध की कोई चर्चा नहीं मानो कहानी में युद्ध का उद्देश्य लहनासिंह के लिये मर जाने का एक बहाना भर जुटाने का सामान हो जबकि वास्तव में युद्ध का अस्तित्व ही कहानी में सबसे ज़्यादा वास्तविक और निश्चित है। लेखक ने बहुत रम कर उसका वर्णन किया है और वह कथानक और घटनाक्रम में सबसे ज़्यादा जगह भी घेरता है। लेकिन आचार्य शुक्ल ने इसे प्रेमकहानी के रूप में ही देखा है और इसके नतीजे में उसका पठन–पाठन प्रेमकथा के अर्थ–अर्थांतरों तक ही सीमित रहता आया है।

सूबेदारनी के लिये लहनासिंह का मनोभाव वस्तुतः है क्या ? स्वयं कहानी के अनुसार,"पच्चीस वर्ष बीत गये। अब लहनासिंह नं .77 रैफ़ल्स में जमादार हो गया है। उस आठ वर्ष की कन्या का ध्यान ही न रहा। न मालूम वह कभी मिली थी या नहीं। "लेकिन पच्चीस वर्ष के अंतराल में भूली बिसरी अचानक मिल कर वह पति पुत्र की जीवनरक्षा के लिये आंचल पसारती है। क्या यह प्रेम है ? क्या यह घटना ऐसी है जिसे आचार्य शुक्ल "जैसी बराबर हुआ करती है" के खाते में रख सकें ? लड़ाई के मैदान में लहना सूबेदारनी के पति–पुत्र की देखभाल कुछ विशेष जतन से करता है, अपने कम्बल कोट ज्वरग्रस्त बोधा को ओढ़ा कर स्वयं सिगड़ी के सहारे गुजारा करता है, धावे के लिये तैयार होते हुए बोधा को जाने नहीं देता और बाद में लपटन साहब बन कर आये हुए जर्मन अफ़सर की गोली से जांघ में एक घाव खाता है और हमलावर जर्मन सिपाहियों के साथ मुकाबिले के दौरान अपनी पसली मे दूसरा। दूसरा घाव गहरा है। इस सारे आचरण में ऐसा क्या है जिसे हम युद्धकालीन 'कमराडरी' और 'शिवैलरी' की शब्दावली में न समझ सकें ? बीमारों को ढोने के लिये आयी गाड़ियों में लहानासिंह सवार नहीं होता। क्या इसलिये कि अब उसके पास ज़िंदा रहने का कोई कारण नहीं बचा और वह मरने के लिये पीछे छूट जाना चाहता है ? याकि इसलिये कि दूसरा जो गहरा घाव उसे लगा है उसके कारण प्राण तो जायेंगे ही अतः चौकी की रखवाली के लिये पीछे रुक जाने वालों में वही शामिल रहे, बाकी सारे सुरक्षित निकल जायें। दूसरे भारी घाव की मरहमपट्टी भी उसने नहीं करवाई। मर जाने की इच्छा से या इस चिंता से कि उसके घाव की दशा देख कर सूबेदार कहीं जाने से इंकार न करने लगें ? क्या इस व्यवहार को युद्धकालीन 'कमराडरी' नहीं समझा जा सकता ?

ये सभी संभाव्य व्याख्याएं 'कमराडरी' और 'शिवैलरी' के वैकल्पिक पाठ को खोजने के लिये और इस सदिच्छा से प्रेरित होकर की जा रही हैं कि 'उसने कहा था' की संवेदना को "अविश्वसनीय" और "हवाई" के आरोप से बरी किया जा सके। लेकिन युद्धक्षेत्र में लहनासिंह के आचरण को भले ही इन व्याख्याओं के ज़रिये स्वाभाविक ठहराया जा सके, कहानी की अपनी मंशा इसे प्रेम के प्रमाण की तरह चित्रित करने की ही है। इसीलिये कहानी का आरंभ 'कुड़माई' 'धत्' वाले प्रसिद्ध संवाद प्रसंग से होता है और लहनासिंह की मृत्यु के समय के स्मृतिचित्रों में 'देखते नहीं, यह रेशम के फूलों वाला सालू' प्रसंग के साथ यह प्रतिक्रिया भी जोड़ दी गयी है, "सुनते ही लहनासिंह को दुख हुआ , क्रोध हुआ " और यह प्रश्न भी पूछ लिया गया है,"क्यों हुआ ? " यानी लेखक चाहता यही है कि अगर पाठक की पकड़ से यह बात छूटी जा रही हो तो वह ठहर कर एक बार सोचे और समझ ले क्योंकि यह प्रेम था।' लरिकाई को प्रेम सच है कि 'पच्चीस वर्ष बीत गये।अब लहनासिंह नं .77 में जमादार हो गया।उस आठ वर्ष की कन्या का ध्यान ही न रहा। न मालूम वह कभी मिली थी या नहीं।' लेकिन सच यह भी है कि मरते समय भी वह बार बार कहता है ," वजीरा पानी " और वह सब याद करता है जो "उसने कहा था।" प्रेम की दृष्टि से देखते हुए व्यंजना मानो यही है कि वह बच सकता था लेकिन मर गया क्योंकि उसने कहा था। सूबेदार और बोधा को बचाया क्योंकि उसने कहा था, खुद को मर जाने दिया क्योंकि उसने यह तो नहीं ही कहा था कि तुम भी बच कर लौटना। क्या इस मृत्यु में एक प्रेमी का अभिमान और हताशा है ? क्या यह एक सैंतीस अड़तीस वर्ष के पके प्रौढ़ व्यक्ति का अविश्वसनीय सा आचरण नहीं है ? क्या यह घटना भी ऐसी है जैसी 'बराबर हुआ करती है ?'


प्रेम वस्तुतः क्या है ? कोई ऐसी चीज़ तो नहीं जिसे लंबाई, चौड़ाई और वज़न के नाप से तोल कर घोषित किया जा सके कि वह यही है, और इसके सिवा और कुछ नहीं है और इससे माशा–रत्ती भी इधर उधर हुआ तो अतिशय, अतिरेक और अविश्वसनीय होगा या फिर प्रेम ही नहीं होगा।हर युग के पास प्रेम की अपनी पहचान, अपना प्रत्यय हुआ करता है। नये कहानीकारों के पास यह दो व्यक्तियों, दो अहंकारों की टकराहट और परस्पर अनुकूलन की प्रक्रिया में तोड़ने और टूटने के अनुभव का नाम है। प्रायः वह प्रेम नहीं दाम्पत्य है। और प्रेम का तो वहाँ अस्तित्व ही संदिग्ध है। गुलेरी जी और शुक्ल जी के पास वह प्रतिदान की आकांक्षा से रहित समर्पण और अहं के प्रत्याशाविहीन विसर्जन का नाम है। वह लगभग भक्ति का लौकिक रूपांतर है इसलिये बहुत स्वाभाविक है कि नये कहानीकार इसे सर्वथा अविश्वसनीय पायें और सहानुभूतिपूर्वक विचार करने वाले लोग यह कोशिश करें कि इसकी संवेदना को 'प्रेम नहीं,कुछ और' के रूप में पहचान लें जबकि शुक्ल जी को ऐसा प्रतीत हो कि "घटना इसकी ऐसी है जैसी बराबर हुआ करती है।"

लेकिन यह पाठ कहानी के आधे चेहरे को ही पढ़ता है, शेष आधा चेहरा युद्ध अनदेखा ही छूट जाता है। इस पाठ ने 'उसने कहा था' के अर्थ को प्रेमकथा के दायरे में रूढ़ कर दिया है और प्रेम को भी पाठ की एक विशेष रुचि तक सीमित कर दिया है। जहां तक प्रेम की प्रगल्भता का प्रश्न है, उनकी शेष दोनो कहानियों के साक्ष्य पर कहा जा सकता है स्वयं गुलेरी को उससे कोई आपत्ति नही दिखती, विशेषकर 'बुद्धू का कांटा' नामक कहानी की वन्य प्रकृति सी उद्दाम नायिका को याद करें जो नायक को छेड़ते हुए यहां तक कह डालती है,"कौन ऐसे बुद्धू के आगे लंहगा पसारेगी ? " प्रेम का सुकुमार सुरुचिपूर्ण चित्रण गुलेरी जी के लिये कोई नैतिक विवशता नहीं थी। उनके लिये इस कहानी में प्रेम प्रमुख नहीं, पृष्ठभूमि का विषय है। न केवल इतना कि प्रेम यहां सिर्फ़ संकेतित है, बल्कि यह भी कि कहानी के समूचे विस्तार में उसे जगह भी बहुत थोड़ी दी गयी है। इसलिये माना जा सकता है कि गुलेरी जी इस कहानी में प्रेम के अलावा और भी कुछ चित्रित करना चाहते थे, और वह 'कुछ' इतना महत्त्वपूर्ण तो था ही कि प्रेम उसके सामने पृष्ठभूमि में चला जाय।


विस्तार से जो चित्रित किया गया है वह युद्ध है। प्रेम के इंद्रजाल के आगे हम इस विस्तार को, प्रत्यक्ष–उपस्थित तक को भी अनदेखा कर जाते हैं, शब्दों के बीच के मौन को सुन पाने की तो बात ही क्या कहानी में प्रथम विश्वयुद्ध को चित्रित किया गया है। कहानी का रचनाकाल भी यही है।यह एक विकट समसामयिक यथार्थ पर रचनात्मक दृष्टिपात है, हिंदी कहानी में संभवतः अकेला। मुकुटधर पाण्डेय ने इस कहानी पर अपनी टिप्पणी में याद किया है,"लड़ाई यूरोप की भूमि पर लड़ी जा रही थी पर यहां भारत में पल पल युद्ध वार्ता की प्रतीक्षा रहा करती थी । भारतीय सैनिक हज़ारों की संख्या में फ्रांस और बेल्जियम की भूमि पर लड़ रहे थे। हम लोग नक्शा निकाल कर युद्धस्थलों का पता लगाते थे।" मानो एक समसामयिक सरोकार और संबद्धता के इसी भाव के अनुगमन में गुलेरी जी ने बहुत रमकर युद्ध प्रसंग को रचा है।


युद्ध को केंद्र में रख कर कहानी की तरफ़ देखें तो यहां पंजाब का उच्छल जीवन धड़कता दिखायी देता है। कहानी के आरंभ में ही अमृतसर की तंग चक्करदार गलियों में बम्बूकार्टवालों की बोलियों में उमगती, छलकती जीवन की कामना कहानी के अंतिम दृश्य तक फैलती चली जाती है लहनासिंह की मृत्युपूर्व स्मृतिश्रंखला तक युद्धक्षेत्र में भी, खाई में बैठे बैठे ऊबते थकते उनके हास परिहास में, गानेबजाने में पंजाब के लोकजीवन की झलकियां गूंजती हैं।


बाद में, द्वितीय विश्वयुद्ध की तुलना में तो यूरोप में भी प्रथम विश्वयुद्ध और तब तक के गौरवान्वित शौर्य को बच्चों का खेल माना गया और मृत्यु की विभीषिका के साथ वास्तविक परिचय के बाद वहां के युद्ध संबंधी साहित्य में यह अभिप्राय बड़ी विकल व्यंजना के साथ बार बार दोहराया भी गया है लेकिन हिंदी में संभवतः यह पहला और शायद उस समय का एकमात्र उल्लेख है जिसमें विज्ञान की मदद से विनाश के तकनीकी साधनों के सामने मानवीय शौर्य की अपर्याप्तता, विवशता और कुछ कुछ मूर्खतावाची भोलेपन की ओर संकेत किया गया है। लेकिन यह केवल संकेत है "ग़नीम कहीं दिखता नहीं, घंटे दो घंटे पर कान के पर्दे फाड़ने वाले धमाके के साथ सारी खंदक हिल जाती है और सौ–सौ गज़ धरती उछल पड़ती है . . .जो कहीं खंदक से बाहर साफ़ा या कुहनी निकल गई तो चटाक से गोली लगती है। न मालूम बेईमान मिट्टी में लेटे हुए या घास की पत्तियों में छिपे रहते हैं।" यह अलग बात है कि युद्धक्षेत्र में, मौत के आमने सामने खड़े होकर यहां इस कहानी में इसी शौर्य को विजयी और महिमामण्डित दिखाया गया है। नं . 77 रैफ़ल्स के 'दाढ़ियों वाले घरबारी' सिख एक भोला निश्छल शौर्य लेकर लड़ाई में शामिल होने फ्रांस और बेल्ज़ियम गये हैं। लेकिन वहां युद्धक्षेत्र में असलियत यह है कि युद्ध से अधिक युद्ध की प्रतीक्षा का आलम है, " दिन रात खंदकों में बैठे हड्डियां अकड़ गयी हैं।" युद्ध के सारे कौशल और विधियां बदल चुकी हैं। लेकिन हमारे कथापात्र सिख सैनिकों के लिये लड़ने का हौसला और मरने मारने का जज़्बा कुछ कुछ इतना प्रबल है कि युद्ध मानो मौत के साथ सचमुच का मुकाबिला नहीं, केवल खेल खेल में मरने का बहाना हो" बिना फेरे घोड़ा बिगड़ता है और बिना लड़े सिपाही। मुझे तो संगीन चढ़ा कर मार्च का हुक्म मिल जाय। फिर सात जर्मनों को अकेला मार कर न लौटूं तो मुझे दरबार साहब की देहली पर मत्था टेकना न नसीब हो।" 

शायद अपनी तकनीकी श्रेष्ठता पर गर्व के कारण लापरवाह होकर शत्रुपक्ष इन सिपाहियों की बुद्धिमत्ता को कम करके आंकने की ग़लती कर बैठा है और एक अप्रत्याशित प्रतिक्रिया का सामना करने की तैयारी न होने के कारण बेहतर हथियारों और चतुर रणनीति के बावजूद इसी शौर्य के हाथो पराजित होता है। कहानी में इन कथापात्रों को सिख कहा गया है, साफ़ साफ़ ज़िक्र तो कहीं नहीं लेकिन चरित्र चित्रण से उनके जाट सिख होने का अनुमान लगाया जा सकता है। कम से कम लहनासिंह के विषय में दी गयी सूचनाएं तो इस अनुमान को सच साबित कर सकती हैं। लड़ने मरने का उतावलापन ज़ाहिर करने वाले संवाद उसी को दिये गये हैं। खाई पर जब सत्तर जर्मन हमला करते हैं तो आठ सिखों की बंदूके उनके पहले और दूसरे धावे को रोकती हैं। तब भी लहनासिंह के बारे में यह विवरण दर्ज है कि 'लहनासिंह तक–तक कर मार रहा था वह खड़ा था, और लेटे हुए थे।' यह ऊर्जा और ताप के अतिरेक से छलकता हुआ, बिना किसी हिचक या हीले हवाले के दौड़ कर मौत को खुद गले लगा लेने वाला या दूसरे को मौत के घाट उतार देने वाला जाट सिख चरित्र है। इसकी निडरता के अनेक रंग भोले आत्मबलिदान से लेकर कातिलाना खूंख्वार अपराधकर्म तक 17वीं , 18वीं शताब्दी के मुगल ऐतिहासिक दस्तावेज़ों से लेकर अंग्रेज़ गैज़ेटियरों तक में अंकित हैं। ज़मीन के साथ उनका लगाव किंवदंती की हद तक मशहूर कहा जा सकता है।


पराई ज़मीन पर एक पराई लड़ाई में प्राण दे देने को तत्पर इन सैनिकों के मन में पुरस्कार और समृद्धि की आशा है। लहनासिंह को समझाते हुए सूबेदार कहता है, "कहीं तुम न मांदे पड़ जाना। जाड़ा क्या है, मौत है और निमोनिया से मरनेवालों को मुरब्बे नहीं मिला करते।" सूबेदारनी भी युद्ध के उपहार में प्राप्त संपन्नता का ज़िक्र करती है "मेरे तो भाग फूट गये। सरकार ने बहादुरी का ख़िताब दिया है, लायलपुर में ज़मीन दी है, आज नमकहलाली का मौका आया है। पर सरकार ने हम तीमियों की एक घघरिया पलटन क्यों न बना दी जो मैं भी सूबेदार जी के साथ चली जाती।"


पुरस्कार में ज़मीन की आशा और नमकहलाली को प्रमाणित करने की ज़रूरत के अलावा स्वयं अपने शौर्य और वीरता का प्रमाण देने का उत्साह भी इन सैनिकों के लिये मरने मारने की एक प्रेरणाशक्ति है। 1916 में, जब यह कहानी प्रकाशित हुई तब स्वाधीनता संग्राम भी अपनी उग्रता के प्रथम दौर की ओर बढ़ रहा था। लेकिन सेना के लिये नमकहलाली का सवाल सरकार के साथ ही जुड़ा हो सकता था। प्रथम विश्वयुद्ध में नमकहलाली का पुरस्कार पंजाब को तरह तरह से दिया भी गया। वैसे, हमारे अपने स्वाधीनता संग्राम का तत्कालीन राजनीतिक निर्णय भी अपने साम्राज्यवादी शासकों की पक्षधरता का ही था और विशाल भारतीय सेना उनकी विजय का प्रमुख घटक भी रही थी।

पक्षधरता की ही कथात्मक अभिव्यक्ति का एक रूप नकली लपटन साहब बन कर आये हुए जर्मन अफ़सर को कैरिकेचर की तरह प्रस्तुत करने में दिखायी देता है। अंग्रेज़ी शासन की पक्षधरता के अतिरिक्त यह जर्मनी का विपक्ष भी है। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद से ही लेकर अब तक चली आती अंग्रेज़ी के कौमिक और किशोर साहित्य की युद्ध कथाओं में जर्मन सिपाही कुछ ऐसी ही अवहेलनापूर्ण दृष्टि के साथ हास्यास्पद तस्वीरों में सजीव किये गये हैं।


खाई में बैठे बैठे 'ऐक्शन' की प्रतीक्षा में जड़ होते हुए सिपाहियों की शिकायत है कि "ग़नीम कहीं दिखता ही नहीं।" वे वीरता से लड़ते हैं और उनका ग़नीम हथियारों से – "पाजी कहीं के, कलों के घोड़े संगीन देखते ही मुंह फाड़ देते हैं और पैर पकड़ने लगते हैं। यों अंधेरे में तीस तीस मन का गोला फेंकते हैं।" आमने सामने की लड़ाई का मौका आता है तो सत्तर के मुकाबिले आठ की बहादुरी तुल जाती है और ठीक वक्त पर सूबेदार हज़ारासिंह के लौट आने के कारण आगे पीछे संगीनों की बाढ़ से फ़तह भी मिल जाती है। पंद्रह सिखों के प्राण जाते हैं और तिरेसठ जर्मनों के।


लेकिन इस सजग तरफ़दारी , नमकहलाली और शौर्य के महिमामंडन के बावजूद कहानी युद्ध के विपक्ष में है । इस रक्तपात और हिंसा की मानवीय विनाशगाथा की ओर से उदासीन और निष्करुण प्रकृति अपने ही छंद के अनुगमन में व्यस्त मानो इस छंदभंग पर मौन किंतु असहमत है "लड़ाई के समय चांद निकल आया था, ऐसा चांद, जिसके प्रकाश से संस्कृत कवियों का दिया हुआ 'क्षयी' नाम सार्थक होता है। और हवा ऐसी चल रही थी जैसी कि बाणभट्ट की भाषा में 'दंतवीणोपदेशाचार्य' कहलाती। वज़ीरासिंह कह रहा था कि कैसे मन–मन–भर फ्रांस की भूमि मेरे बूटों से चिपक रही थी, जब मैं दौड़ा दौड़ा सूबेदार के पीछे गया था।" चांद, हवा और भूमि के विषय में ये तीनो ही बड़े सजग और विलक्षण से प्रयोग हैं। इनके द्वारा लड़ाई के युद्ध के क्षण में मानवीय नाटक और प्रकृति के अभिनेता एक दूसरे से जुड़ कर एक ही दृश्य में अपनी अपनी भूमिकाएं ग्रहण कर लेते हैं। प्रकृति मौन, असहमत साक्षी, मनुष्य विनाशलीला और रक्तव्यापार में व्यस्त। उसे चाहे वह शौर्य कहे या चातुर्य, असलियत यही है।


लहनासिंह का स्वप्न था, "मैं तो बुलेल की खड्ड के किनारे मरूंगा। भाई कीरतसिंह की गोदी पर मेरा सिर होगा और मेरे हाथ के लगाये हुए आंगन के पेड़ की छाया होगी।" लेकिन इतना छोटा और मामूली सपना उसके लिये असाध्य है।" कुछ दिन पीछे लोगों ने अखबारों में पढ़ा फ्रांस और बेल्ज़ियम '' 68वीं सूची मैदान में घावों से मरा :नं .77 सिख राइफल्स जमादार लहनासिंह।"

जिन्होंने अखबार में यह पढा. उन्होंने लहनासिंह के बारे में क्या जाना ? युद्ध में मरनेवाले सिपाही के बारे में प्रायः हम क्या जान पाते हैं ? शायद रेजीमेंट के नाम और सूची के नम्बर के साथ सिर्फ़ एक पद और एक संज्ञा। मृत्युसूचना के द्वारा कहानी का यह अंत केवल करुणा के अतिरेक की सृष्टि के उद्देश्य से नियोजित नहीं है बल्कि उसके 'प्लान ऑफ़ ऐक्शन' का हिस्सा है। आरंभ में अमृतसर के बाज़ार का कोलाहल है, जीवन की हलचल और हुड़दंग जिसके बीच से उठ कर दो अपरिचित अनाम चेहरे फ़ोकस में आते हैं, एक दूसरे से परिचित होते हैं और कहानी के अंत में पाठक को अपनी पहचान जताने के लिये वापस लौटते हैं। यहां पाठक का जाना पहचाना एक आदमी अखबारों में छपी एक सूची के नम्बर और पल्टन के नाम में बदल कर अखबार पढ़ने वाले लोगों के लिये परिचयविहीन हो चुका है। लेकिन मृत्युपूर्व स्मृतिचित्रों की श्रंखला में जिन दो की शिनाख्त होती है, और बाकी जो संकेत मिलते हैं उन्हें जोड़ कर कहानी का पाठक जानता है कि मरनेवाला सिर्फ़ एक नाम नहीं, खुद उसके अपने आप जैसा एक जीता जागता हाड़ मांस का आदमी था। बुलेल की खड्ड के किनारे उसका एक घर था, घर में एक आंगन था, आंगन में उसके अपने हाथो से लगाया हुआ आम का एक पेड़ था। एक भाई था। एक बेटा भी था। यानी एक परिवार जिसके लिये अपने दायित्वों को वह निभाना चाहता था। और जिसके अचेतन में, कहीं बहुत गहराई में, उसके अनजानते ही,परदों के पीछे, विस्मृति की तहों में लपेटी हुई एक स्मृति भी रखी हुई है जो अचानक परतें खोल चेतन में उठ आई है और युद्धक्षेत्र में अपने दो साथी सैनिकों के लिये आत्मीयता का अतिरिक्त आवेग और अलग सी सोद्देश्यता दे देती है। उसका युद्ध और उसका प्रेम उस एक ही चरित्र की दो परिणतियां थी जिसमे जीवन का अतिरेक मरने की उतावली का पर्याय बन जाता है।



डॉ. अर्चना वर्मा
(साभार)

0 comments